By अभिनय आकाश | Jul 27, 2026
दिल्ली हाई कोर्ट ने सोमवार को ब्रिगेडियर रोहित मेहता की अवमानना याचिका पर नोटिस जारी किया। याचिका में आरोप लगाया गया है कि केंद्र और सेना के वरिष्ठ अधिकारियों ने आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल (AFT) के उन दो आदेशों का जानबूझकर पालन नहीं किया, जिनमें उन्हें मेजर जनरल के पद पर पदोन्नति (प्रमोशन) के मामले पर फिर से विचार करने का निर्देश दिया गया था। जस्टिस मिनी पुष्करणा ने प्रतिवादियों से जवाब मांगा और मामले की अगली सुनवाई के लिए 19 अगस्त, 2026 की तारीख तय की। यह याचिका भारत सरकार, सेना प्रमुख और मिलिट्री सेक्रेटरी के खिलाफ 'कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट्स एक्ट' (न्यायालय की अवमानना अधिनियम) के तहत दायर की गई है। इसमें आरोप लगाया गया है कि AFT के 2 अप्रैल और 15 मई, 2026 के आदेशों की जानबूझकर अनदेखी की गई।
प्रतिवादियों के वकील ने अवमानना याचिका का विरोध करते हुए कहा कि एएफटी के आदेश को चुनौती देने वाली अपील पहले ही दायर की जा चुकी है और "एक-दो दिन" के भीतर सूचीबद्ध होने की संभावना है। प्रतिवादियों के वकील ने कहा कि वे कार्यवाही से "पीछे नहीं हट रहे हैं" बल्कि अपीलीय मंच के समक्ष न्यायाधिकरण के फैसले को चुनौती देने के अपने कानूनी अधिकार का प्रयोग कर रहे हैं। याचिका के अनुसार, AFT ने 2 अप्रैल, 2026 को ब्रिगेडियर मेहता की ओरिजिनल एप्लीकेशन पर फ़ैसला सुनाते हुए उनकी एक कॉन्फ़िडेंशियल रिपोर्ट (CR-5) में दखल देने से इनकार कर दिया, लेकिन यह माना कि करियर में निष्पक्ष और समान तरक्की के हित में, उन्हें अपने मूल 1992 बैच के साथ मेजर जनरल के पद पर प्रमोशन के लिए 'नंबर 1 सिलेक्शन बोर्ड' द्वारा 'स्पेशल रिव्यू (फ्रेश)' पर विचार करने का मौका दिया जाना चाहिए। ट्रिब्यूनल ने निर्देश दिया कि यह प्रक्रिया तीन महीने के भीतर पूरी की जाए।
याचिका में कहा गया है कि निर्देशों को लागू करने के बजाय, प्रतिवादियों ने AFT के सामने एक रिव्यू एप्लीकेशन दायर की। रिव्यू याचिका 15 मई, 2026 को खारिज कर दी गई और ट्रिब्यूनल ने एक महीने के भीतर आदेश का पालन करने का निर्देश दिया।
ब्रिगेडियर मेहता का आरोप है कि उस समय-सीमा के खत्म होने के बाद भी, अधिकारियों ने न तो सिलेक्शन बोर्ड की बैठक बुलाई और न ही उनके प्रमोशन के बारे में कोई फ़ैसला बताया। याचिका में आगे कहा गया है कि ब्रिगेडियर मेहता 31 अक्टूबर, 2026 को रिटायर होने वाले हैं। उनका तर्क है कि और देरी होने पर ट्रिब्यूनल से मिली राहत बेअसर हो जाएगी, क्योंकि प्रमोशन मिलने पर उन्हें दो और साल तक सेवा में बने रहने का अधिकार मिल जाएगा। इसमें यह भी आरोप लगाया गया है कि प्रतिवादियों की लगातार निष्क्रियता ट्रिब्यूनल के बाध्यकारी निर्देशों की जानबूझकर की गई अवहेलना है।