By दीपक गिरकर | Oct 01, 2021
बैंकों के सामने अपने अस्तित्व को बचाने की बहुत बड़ी चुनौती दिख रही है। बैंकों के पास नकदी की कमी नहीं है, लेकिन अच्छी कंपनियां बैंकों की जगह बाजार से पैसा जुटा रही हैं। अच्छी कंपनियां बैंकों का ऋण चुका रही हैं और बैंकों से नया ऋण भी नहीं ले रही हैं। वे कॉरपोरेट बॉन्ड और शेयर बाजार से पैसा जुटा रही हैं। बैंकों का ऋण जमा अनुपात निरंतर कम होता जा रहा है। अगस्त 2020 में ऋण जमा अनुपात 82.06 था वह अगस्त 2021 में घटकर 69.92 हो गया। पिछले वित्तीय वर्ष में ऋण 6.1 फीसदी की दर से बढ़ा था, जबकि वित्तीय वर्ष 2018-19 में यह दर 13.3 फीसदी रही थी। एक ओर घटते मार्जिन की वजह से और दूसरी ओर एनपीए में वृद्धि से बैंकों की लाभप्रदता कम होती जा रही है।
बैंकों की नई चुनौतियों से निपटने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में शीर्ष अधिकारियों की नियुक्ति और चयन व्यवस्था में बदलाव किये जाने की आवश्यकता है। इसके अंतर्गत कार्यकारी निदेशकों, बोर्ड के सदस्यों से लेकर अध्यक्ष तक सबके संदर्भ में बदलाव किये जाने की आवश्यकता है। वरिष्ठ बैंक कर्मचारियों के लिये मूल्यांकन परियोजना के तहत, आवश्यक प्रशिक्षण सुनिश्चित किया जाना चाहिये। नियमित बैंकिंग परिचालन की अपेक्षा वित्तीय परियोजनाओं में विभिन्न तरह के कौशल की आवश्यकता होती है। सतर्कता विभागों को सुदृढ़ किया जाना चाहिए। बैंकिंग सतर्कता आयोग के गठन पर देश के नीति-निर्माताओं को विचार करना चाहिए। वर्तमान समय में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में कोई प्रभावी सतर्कता तंत्र मौजूद नहीं है। बैंकों को सारी चुनौतियों से निपटने के लिए एक स्वस्थ बैंकर-ऋणी संबंध विकसित करना होगा। बैंकों को ऋणी के उद्यमी कौशल विकास में सहायता करनी होगी।
नियामक के रूप में भारतीय रिजर्व बैंक को महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी। बैंकों में फंसे कर्ज की समस्या को दूर करने के लिए वित्त मंत्रालय और भारतीय रिजर्व बैंक के बीच निरंतर संवाद ज़रूरी है। सिर्फ कुछ घोषणाएं करने या समिति का गठन करने से रिजर्व बैंक अपनी नियामक जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता है। एनपीए की समस्या से निपटने के लिए रिजर्व बैंक हमेशा नई-नई योजनाएं ले आता है, लेकिन उन योजनाओं के नतीजों का कभी भी विश्लेषण नहीं किया जाता है। अग्रिमों की निगरानी के लिए केंद्रीय स्तर पर एक विशेष मजबूत निगरानी तंत्र विकसित करने की जरूरत है। जब तक सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक प्रबंधन राजनेताओं और नौकरशाहों के प्रति निष्ठावान रहेंगे, तब तक बैंकों की व्यावसायिकता में कमी बनी रहेगी, इसलिये संपूर्ण बैंकिंग व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन की आवश्यकता है। बैंकिंग उद्योग में शीर्ष स्तर पर पेशेवरों की ही नियुक्ति होनी चाहिए। सरकार के पास अर्थशास्त्रियों और आर्थिक पेशेवरों की संख्या लगभग नहीं के बराबर है। सरकार को देश में अर्थशास्त्रियों और आर्थिक, बैंकिंग पेशेवरों की फौज तैयार करनी होगी।
-दीपक गिरकर
लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं