सियासी पहाड़े से अध्यात्म के अखाड़े तक, देवभूमि उत्तराखंड में धर्म और राजनीति का रहा है खास कनेक्शन

By अभिनय आकाश | Jan 11, 2022

उत्तर प्रदेश, पंजाब समेत पांच राज्यों के चुनाव की तारीखों का ऐलान हो गया है। उत्तराखंड की 70 विधानसभा सीटों पर 14 फरवरी को मतदान किया जाएगा। 10 मार्च को पांचों राज्यों के वोटों की काउंटिंग की जाएगी। धार्मिक क्षेत्र होने और चुनावी माहौल के चलते उत्तराखंड में माहौल गर्म है। तीर्थ नगरी हरिद्वार में 17-19 दिसंबर को धर्म संसद के नाम पर खुद को धर्म गुरु कहने वाले लोगों की बयानबाजी ने इस माहौल में आग में घी का काम किया है। 2022 के विधानसभा चुनाव में उत्तराखंड में हिंदुत्व बड़ा मुद्दा है। आम आदमी पार्टी ने सबसे पहले उत्तराखंड को आध्यात्मिक राजधानी बनाने का ऐलान किया तो हिंदुत्व के मुद्दे पर भाजपा, कांग्रेस भी कूद गई।  

चुनावी बिगुल बजते ही उत्तराखंड में साधु-संतों की घंटी की गूंज सरकार के कानों तक पहुंच चुकी है। क्योंकि सरकार अपने दो साल पुराने फैसले को पलटने को मजबूर हो गई है। चुनाव से पहले देवस्थानम बोर्ड चुनावी मुद्दा बनता जा रहा था और साधु संतों के भारी विरोध के बाद धामी सरकार ने चुनाव के ऐलान से पहले ही देवस्थानम बोर्ड को भंग करने का ऐलान किया। चुनावी समय में साधु-संतों की नाराजगी विरोधी दलों के लिए वोट वाला आशीर्वाद न बन जाए इसलिए बीजेपी की धामी सरकार ने देवस्थानम बोर्ड को ठंडे बस्ते में डालने का निर्णय लिया। वहीं कांग्रेस  तो पहले से ही इस बोर्ड का विरोध करती रही है। 

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हरिद्वार धर्म संसद के मुद्दे ने गर्मायी सियासत

पिछले महीने हरिद्वार में आयोजित इस कार्यक्रम में कुछ हिंदू धर्मगुरुओं द्वारा लोगों से मुसलमानों के खिलाफ हथियार उठाने और नरसंहार का आह्वान किया गया था। जिस पर विवाद गरमा गया था। हरिद्वार में यह विवादित कार्यक्रम तीन दिनों तक चला था। मामला प्रकाश में तब आया जब इससे जुड़े वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने लगे। इन भाषणों की भाषा पर तमाम लोगों द्वारा आपत्ति जताई गई साथ ही सरकार से कार्रवाई की मांग भी की गई। हरिद्वार में आयोजित ‘धर्म संसद’ के दौरान दिए गए कथित नफरती भाषण का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। याचिका में मुस्लिमों के खिलाफ नफरती भाषण की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की मांग की गई है। हरिद्वार राजनीति का केंद्र बिंदु रहा 

ह​रिद्वार धर्म की नगरी, तीर्थ नगरी कही जाती है। जो कि पहाड़ और तराई के सेतु का काम भी करता है। यहां से तराई क्षेत्र शुरू हो जाता है। इस तरह हरिद्वार पर साधु संतों के अलावा किसानों का भी अच्छा प्रभाव है। उसके अलावा हरिद्वार का कुछ क्षेत्र मुस्लिम बाहुल्य वाले क्षेत्रों से भी लगा है। इस तरह से हरिद्वार राजनीति का केन्द्र बिंदु रहा है। 

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