World Day of Social Justice: जब तक अंतिम व्यक्ति सुरक्षित नहीं, अधूरा है विकास

By योगेश कुमार गोयल | Feb 20, 2026

किसी भी समाज की सच्ची प्रगति उसकी ऊंची इमारतों या तेज आर्थिक वृद्धि से नहीं बल्कि इस बात से मापी जानी चाहिए कि वह अपने सबसे कमजोर, वंचित और हाशिए पर खड़े नागरिकों को कितना न्यायपूर्ण, सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन प्रदान करता है। 20 फरवरी को मनाया जाने वाला सामाजिक न्याय का विश्व दिवस मानव सभ्यता की उस मूल चेतना का प्रतीक है, जिसके बिना न तो शांति संभव है और न ही टिकाऊ विकास। इस दिवस की स्थापना इसलिए की गई थी ताकि गरीबी, बेरोजगारी, सामाजिक बहिष्कार, असमानता और भेदभाव जैसी जटिल वैश्विक समस्याओं के समाधान के लिए देशों के बीच साझा प्रतिबद्धता को मजबूती मिल सके। यह एक चेतावनी भी है कि बढ़ती असमानताएं समाज की नींव को भीतर से कमजोर कर रही हैं और साथ ही एक अवसर भी है कि समय रहते ठोस नीतियों, संवेदनशील शासन और सामूहिक प्रयासों से इस प्रवृत्ति को बदला जा सकता है।


वर्ष 2026 में सामाजिक न्याय का विश्व दिवस की थीम है ‘समावेशन को सशक्त बनाना: सामाजिक न्याय के लिए अंतर को पाटना’। यह थीम स्पष्ट करती है कि असमानताओं को कम करने के लिए केवल आर्थिक विकास पर्याप्त नहीं है। जरूरी यह है कि विकास की प्रक्रिया में समाज के हर वर्ग की वास्तविक भागीदारी सुनिश्चित हो। समावेशन का अर्थ केवल योजनाओं का लाभ पहुंचाना नहीं बल्कि निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया में उन लोगों की आवाज को स्थान देना है, जो अब तक हाशिए पर रहे हैं। जब तक नीतियां केवल केंद्रों में बनती रहेंगी और उनका प्रभाव जमीनी स्तर तक नहीं पहुंचेगा, तब तक सामाजिक न्याय एक अधूरा लक्ष्य बना रहेगा।

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यह दिवस विशेष प्रासंगिकता रखता है क्योंकि आज की दुनिया एक गहरे संक्रमणकाल से गुजर रही है। वैश्वीकरण, तकनीकी प्रगति, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जलवायु परिवर्तन और भू-राजनीतिक तनावों ने आर्थिक व सामाजिक ढ़ांचों को तेजी से बदला है। इन बदलावों का लाभ जहां कुछ सीमित वर्गों तक सिमट गया है, वहीं बड़ी आबादी, विशेषकर गरीब, असंगठित क्षेत्र के श्रमिक, महिलाएं, प्रवासी, दिव्यांगजन और अल्पसंख्यक समुदाय, और अधिक असुरक्षित होती जा रही है। ऐसे समय में सामाजिक न्याय केवल नैतिक आदर्श नहीं, नीति और शासन की अनिवार्य प्राथमिकता बन चुका है।


सामाजिक न्याय की अवधारणा अवसरों, संसाधनों और अधिकारों के निष्पक्ष वितरण से जुड़ी है। इसका मतलब यह नहीं कि सभी को समान परिणाम मिलें बल्कि यह है कि सभी को समान अवसर उपलब्ध हों। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, आवास और कानूनी सुरक्षा तक समान पहुंच इसके मूल स्तंभ हैं। जब किसी व्यक्ति का भविष्य उसकी जाति, लिंग, धर्म, जन्मस्थान या आर्थिक स्थिति से तय होने लगे, तब यह स्पष्ट संकेत होता है कि समाज में न्याय का संतुलन बिगड़ चुका है। आज वैश्विक स्तर पर असमानताओं की खाई लगातार चौड़ी हो रही है। एक ओर अत्यधिक संपन्न वर्ग है, जिसके पास संसाधनों और अवसरों की प्रचुरता है, वहीं दूसरी ओर करोड़ों लोग बुनियादी आवश्यकताओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। बेरोजगारी, असुरक्षित रोजगार और कम वेतन ने विशेष रूप से युवाओं के सामने गंभीर संकट खड़े कर दिए हैं। इसी संदर्भ में सम्मानजनक कार्य और मजबूत सामाजिक सुरक्षा तंत्र की आवश्यकता सामने आती है। पेंशन, स्वास्थ्य बीमा, बेरोजगारी सहायता और खाद्य सुरक्षा जैसी व्यवस्थाएं केवल कल्याणकारी योजनाएं नहीं बल्कि सामाजिक स्थिरता और भरोसे की आधारशिला हैं।

भारत में सामाजिक न्याय का विचार गहरे संवैधानिक मूल्यों से जुड़ा है। संविधान की प्रस्तावना सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय की गारंटी देती है जबकि मौलिक अधिकार और राज्य नीति के निदेशक सिद्धांत असमानताओं को कम करने और कल्याणकारी राज्य की दिशा में मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। स्वतंत्रता के बाद से आरक्षण नीति, सामाजिक कल्याण योजनाएं, शिक्षा और स्वास्थ्य में सार्वजनिक निवेश तथा कौशल विकास और सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों के माध्यम से महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। बावजूद इसके, क्षेत्रीय असमानताएं, शहरी-ग्रामीण विभाजन, डिजिटल डिवाइड और लैंगिक विषमता जैसी चुनौतियां आज भी बनी हुई हैं।


सामाजिक न्याय का विश्व दिवस हमें आत्ममंथन का अवसर देता है कि क्या हमारी नीतियां अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक पहुंच रही हैं, क्या शिक्षा और रोजगार के अवसर वास्तव में समान हैं, और क्या विकास का लाभ संतुलित रूप से बंट रहा है? यह दिवस यह भी याद दिलाता है कि सामाजिक न्याय की लड़ाई किसी एक देश या सरकार की नहीं बल्कि वैश्विक सहयोग और सामूहिक प्रयास की मांग करती है। सामाजिक न्याय का विश्व दिवस 2026 इस सत्य को दोहराता है कि सच्ची प्रगति तभी संभव है, जब कोई भी पीछे न छूटे। समावेशन और सशक्तिकरण केवल शब्द नहीं बल्कि रोजमर्रा के निर्णयों, नीतियों और सामाजिक व्यवहारों में उतारने योग्य जिम्मेदारी हैं। जब हर व्यक्ति को समान गरिमा, अवसर और सुरक्षा मिलती है, तभी न्याय कागजों से निकलकर जीवन की वास्तविकता बनता है और एक अधिक मानवीय, समावेशी तथा न्यायपूर्ण विश्व का निर्माण संभव हो पाता है।


- योगेश कुमार गोयल

(लेखक साढ़े तीन दशक से पत्रकारिता में निरंतर सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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