पश्चिम उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह और अजित चौधरी के बिना बिछ रही सियासी बिसात, क्या मतदाताओं को लुभा पाएगी भाजपा और रालोद

By अनुराग गुप्ता | Jan 12, 2022

लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी कमर कस ली है। इस बार बड़े-बड़े दिग्गजों के बिना पार्टियां अपनी रणनीति तैयार कर रही हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की बात की जाए तो इस बार का चुनाव अजीत सिंह और पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के बिना लड़ा जाना है। ऐसे में राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) की चुनावी रणनीति का सारा दारोमदार जयंत चौधरी के कंधों पर है। जबकि पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के बेटे राजवीर सिंह पर कमल खिलवाने की जिम्मेदारी है। 

रालोद ने साल 2002 में भाजपा के साथ गठबंधन में चुनावी मैदान में प्रवेश किया था। इस चुनाव में रालोद ने 14 सीटें जीती थीं। जबकि 2007 में पार्टी अकेले चुनावी मैदान में उतरी थी। इस चुनाव में पार्टी को 10 सीटों से ही संतोष करना पड़ा था। हालांकि उनका वोट प्रतिशत बढ़कर 4 फीसदी हो गया। 2012 के चुनावों में रालोद ने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया और 9 सीटें (2 प्रतिशत वोट) जीतीं। वहीं 2017 में रालोद ने अकेले चुनाव लड़ा था और एक विधायक को जीत मिली थी, जो चुनाव बाद भाजपा में शामिल हो गया।

ऐसे में जयंत चौधरी के कंधों पर रालोद की नईयां पार लगाने की जिम्मेदारी है। जिसको ध्यान में रखते हुए जयंत चौधरी ने पहले ही समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव के साथ हाथ मिला लिया है। हालांकि अभी तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि पार्टी कितनी सीटों पर चुनाव लड़ेगी। लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रालोद की पकड़ अच्छी खासी मानी जाती है। 

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पूर्व सीएम की गैरमौजूदगी में भाजपा लड़ रही चुनाव

भाजपा अपने कद्दावर नेता कल्याण सिंह की गैरमौजूदगी में चुनाव लड़ रही है। आपको बता दें कि कल्याण सिंह का पिछले साल अगस्त माह में निधन हो गया था। ऐसे में कल्याण सिंह के बेटे राजवीर सिंह और पौत्र मंत्री संदीप सिंह पर भाजपा की जिम्मेदारी रहने वाली है। इतिहास के पन्नों को पलटे तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा अभी तक कल्याण सिंह के पसंद के लोगों को ही टिकट देती आई है। हालांकि इस बार पार्टी का रुख क्या होगा, उस पर तो कुछ कहा नहीं जा सकता है लेकिन नयी दिल्ली स्थित भाजपा मुख्यालय में टिकट बंटवारे को लेकर मंथन हो चुका है।

भाजपा की राह आसान नहीं

कृषि आंदोलन के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा की राह आसान नहीं होने वाली है। हालांकि केंद्र सरकार ने तीनों विवादास्पद कृषि कानूनों को वापस लेकर किसानों की नाराजगी को थोड़ा कम करने की कोशिश तो की है। लेकिन क्या चुनाव में उसका परिणाम देखने को मिलेगा, इस पर अभी कुछ भी कहना सही नहीं होगा।

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