नौकरी के लिए न्यूनतम अंक भी प्राप्त नहीं होना अध्ययन गुणवत्ता पर उठाते सवाल

By डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा | Apr 04, 2026

अभी मेडिकल पीजी में 0 पर्सेंटाइल पर प्रवेश का मुद्दा पुराना भी नहीं हुआ है कि राजस्थान लोक सेवा आयोग द्वारा स्कूल लेक्चरर के लिए आयोजित प्रतियोगिता परीक्षा के परिणाम ने देश की शिक्षा के हालातों के पोल खोलकर ही रख दी है। शिक्षा के मंदिर में बच्चों को पढ़ाने के लिए लेक्चरर के पद पर नियुक्ति के लिए आयोजित प्रतियोगिता परीक्षा में पोलिटिकल साइंस के लेक्चरर के पद के लिए हजारों युवाओं ने परीक्षा दी और 225 पद होने के बावजूद केवल 6 परीक्षार्थी चयन के योग्य पाये गये। मजे की बात है कि परीक्षा देने वाले हजारों युवाओं में मात्र 219 युवा भी न्यूनतम प्राप्तांक 40 प्रतिशत अंक भी प्राप्त नहीं कर पायें। हालात की गंभीरता को इसी से समझा जा सकता है कि फिजिकल एजुकेशन के 37 पदों के लिए एक भी नहीं और होमसाइंस जैसे विषय के लेक्चरर के पद के लिए केवल एक परीक्षार्थी ही सफल हो सका। अब एक और देश में प्रतिपक्ष बेरोजगारी की समस्या को गंभीरता से उठा रहे हैं तो दूसरी और भर्ती वाले पदों के लिए न्यूनतम अर्हता अंक प्राप्त करने में भी आज के युवा सफल नहीं हो पा रहे हैं। यह कोई राजस्थान की ही बात नहीं है अपितु यह समूचे देश की शिक्षा के स्तर की बानगी है। क्योंकि निश्चित रुप से राजस्थान लोक सेवा आयोग की परीक्षा में अन्य प्रदेशों के युवा भी परीक्षार्थी रहे होंगे। बेरोजगारी की समस्या अपनी जगह पर है पर दूसरी और स्नातक, स्नातकोत्तर और तकनीकी शिक्षा प्राप्त युवाओं के ज्ञान के स्तर को इससे आंका जा सकता है।

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जहां तक मेडिकल पीजी में जीरो पर्सेंटाइल पर प्रवेश के निर्णय पर यह अवश्य संतोष की बात है कि फैडरेशन ऑफ ऑल इंडिया मेडिकल एसोसिएशन ने सरकार के इस निर्णय की खिलाफत करने की हिम्मत दिखाई है। इसमें कोई दो राय नहीं कि देष में षिक्षण संस्थाओं का जाल बिछा कर सबके लिए शिक्षा की सुविधा उपलब्ध हो सकी। अब तो डीम्ड यूनिवर्सिटी सहित यूनिवर्सिटी नित नई खुलती जा रही है। इसे अच्छा भी माना जा सकता है पर सौ टके का सवाल यह है कि क्या शिक्षण संस्थान केवल डिग्री देने के माध्यम ही बन कर रह गए हैं। 

पोलिटिकल साइंस स्कूल लेक्चरर या अन्य पदों के लिए न्यूनतम योग्यता प्राप्त करने वाली युवाओं की पीढ़ी तैयार हो रही है तो इसके लिए सबसे अधिक शर्म की बात इन शिक्षण संस्थानों के लिए होनी चाहिए। पोलिटिकल साइंस तो उदाहरण मात्र है, सवाल यह है कि परीक्षा देने वाले हजारों प्रतियोगी किसी एक संस्थान से तो डिग्री प्राप्त नहीं होंगे। मजे और शर्म की बात यह है कि इन हजारों प्रतियोगी छात्रों में से कई युवा तो स्तरीयता का दावा करने वाले संस्थान के शिक्षार्थी रहे होंगे, उसके बाद नौकरी के लिए परीक्षा में न्यूनतम 40 प्रतिशत अंक भी प्राप्त नहीं कर पाते हैं तो इससे अधिक बुरी बात क्या होगी? आखिर हम जा कहां रहे हैं। शिक्षण संस्थानों की स्तरीयता पर ही सवाल खड़े हो जाते हैं। इसके अलावा जिस तरह से कोचिंग संस्थानों और लाइब्रेरियों की बाढ़ आई हुई है उसके परिणाम भी इन परिणामों में कहीं दूर दूर तक लक्षित नहीं हो रहे। 

सरकार और तकनीकी शिक्षण संस्थानों को कम से कम अपने स्तर का तो ध्यान रखना ही होगा। शिक्षा की गुणवत्ता और तकनीकी अध्ययन की वैश्विक पहचान बनाना सरकार और अध्ययन केन्द्रों की पहली और अंतिम प्राथमिकता होनी चाहिए, पर यहां तो स्थानीय स्तर पर ही खरे नहीं उतर पा रहे हैं। कल्पना कीजिए कि जीरो पर्सेंटाइल वालों को विशेषज्ञ बनाकर ईलाज का लाइसेंस देंगे तो यह आमनागरिकों की जिंदगी से खिलवाड़ और शिक्षा पद्धति को मजाक बनाना ही है। सरकार और आयोग को समय रहते शिक्षा के स्तर को बनाए रखने की पहल करनी होगी। इसी से देश की शिक्षा की गुणवत्ता देश दुनिया में बनी रह सकेगी। सरकारी और गैरसरकारी संस्थाओं को खासतौर से आगे आना होगा। हालात शिक्षण संस्थानों को शर्मिंदा करने के लिए काफी होने चाहिए। परिणाम एक बार युवाओं को तैयार कर रही इन संस्थानों के लिए भी आत्मचिंतन के होने चाहिए। परिणाम साफतौर पर इन संस्थानों को चेहरा दिखाते नजर आ रहे हैं।

- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

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