शानदार कॅरियर वाया गर्भ संस्कार (व्यंग्य)

By पीयूष पांडे | Jan 25, 2020

नर्सरी में एडमिशन से लेकर 10वीं की बोर्ड परीक्षाओं तक और 12वीं के बाद अच्छे कॉलेज में दाखिले से लेकर अच्छी नौकरी पाने तक मां-बाप बच्चों को लेकर आजकल इतने ज्यादा चिंतित रहते हैं कि चिंता को भी कभी कभार चिंता होती होगी कि कहीं लोग चिंता के शॉर्टकट से चिता तक ना पहुंच जाएं। एक ज़माने में मध्यमवर्गीय परिवार के लिए जितना मुश्किल एक अदद घर बनाना हुआ करता था, आजकल बच्चों का कॅरियर बनाना हो गया है। बच्चों को जीवन में क्या करना चाहिए और कैसे करना चाहिए, इसके लिए महंगी करियर काउंसलिंग होती है। पहले के ज़माने में ज्यादातर मां-बाप अव्वल को कॅरियर-वरियर के बारे में सोचते नहीं थे और जो सोचते थे वो बच्चे की कुटाई-पिटाई कर उसे अपनी पसंद की राह पर ढकेल देते थे। फिर वो इसे ही बच्चे का 'सैटल' होना मानते थे।

आजकल मां-बाप उदारता में राजा हरीशचंद से लोहा लेते दिखते हैं। बच्चों का कॅरियर बन जाए इस चक्कर में जितने जतन हो सकते हैं, करते हैं।

कई मां-बाप बच्चे के पैदा होते ही उसका कॅरियर प्लान बनाने लगते हैं। दूसरी तरफ, बच्चे 'थ्री इडियट' जैसी फिल्में देख देखकर सयाने हो गए हैं। वो आईआईटी में पढ़ने के बावजूद लेखक बनने निकल पड़ रहे हैं। डॉक्टरी की पढ़ाई के बाद कार्टून बनाने लगते हैं। कहने का मतलब यह कि आजकल बच्चे करियर के मामले में नितांत फ्रॉड टाइप व्यवहार करते हैं। बच्चे जो पढ़ेंगे,वही करेंगे, इसकी अब कोई गारंटी नहीं। इस चक्कर में मां-बाप अपने सिर पर हमेशा 10 किलो टेंशन लिए घूमते हैं और बच्चों के कॅरियर के चक्कर में उनकी उम्र की ट्रेन कब जवानी के स्टेशन पर रुके बगैर बुढ़ापे के जंक्शन पर रुकती है, उन्हें पता ही नहीं चलता।    

कितना अच्छा हो कि बच्चे बड़े होकर वही बन जाएं,जो मां-बाप चाहते हैं? सारे झंझट खत्म। अवध विश्वविद्यालय अब इसी परियोजना पर काम कर रहा है।

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अवध विश्वविद्यालय गर्भ संस्कार का पाठ्यक्रम आरंभ करने जा रहा है। इस पाठ्यक्रम का मकसद है कि माता-पिता के मन मुताबिक संतान को संस्कार दिए जा सकें। मसलन-मां बाप अगर धार्मिक किस्म की संतान चाहते हैं तो दंपति को धार्मिक ग्रंथों का पाठ, धार्मिक कहानियां वगैरह सुनाई जाएंगी। यदि मां बाप को वैज्ञानिक बच्चे की कामना हो तो मां को गर्भ धारण करने के बाद वैज्ञानिक माहौल, वैज्ञानिकों की जीवनियां, प्रयोग करने के दौरान के उनके अनुभव सुनाए जाएंगे। युद्ध कला में बहादुर बच्चे की चाह रखने वाली मां को वीर रस से जुड़े साहित्य और कथाओं से गर्भस्थ शिशु को शिक्षित और दीक्षित किया जाएगा।

अभिमन्यु अगर गर्भ में चक्रव्यूह में घुसने का भेद समझ सकता है तो अवध विश्वविद्यालय की परियोजना पर उंगली उठाने वाला मैं कौन होता हूं ? अपना सुझाव बस यह है कि गर्भ संस्कार में व्यवहारिकता का ध्यान रखा जाए। संस्कार ऐसे दिए जाएं कि मां-बाप को बच्चों के कॅरियर को लेकर कभी चिंतित ही ना होना पड़े। बच्चों को गर्भ में ही राजनेता, ठेकेदार, नगर निगम का चेयरमैन और अलग अलग विकास प्राधिकरणों वगैरह का प्रमुख बनाने के संस्कार दिए जा सकें तो निश्चित रुप से कई पीढ़ियों की बात बन सकती है। 

पीयूष पांडे

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