साक्षात्कारः किसान नेता वीएम सिंह ने कहा- खेती विहीन हो जाएगा अन्नदाता

By डॉ. रमेश ठाकुर | Sep 28, 2020

कृषि सुधार विधेयकों के विरोध में किसान कई राज्यों में प्रर्दशन कर रहे हैं। हरियाणा, पंजाब व पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ज्यादा जोर है। संसद में पारित दो विधेयकों को लेकर पक्ष-विपक्ष में तकरार जैसी स्थिति है। विधेयकों को सरकार जहां किसानों के हितों में बता रही है, वहीं किसान नेताओं का तर्क है कि इस नई व्यवस्था से सरकार बड़ी चालाकी से परंपरागत खेती को खत्म करके कॉपोरेट खेती को ओर पहला कदम बढ़ा रही है। इसी बात का विरोध किसान के तमाम संगठन कर रहे हैं। उनकी अगुआई अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष वीएम सिंह कर रहे हैं। उनसे डॉ. रमेश ठाकुर ने विस्तृत बातचीत की। पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश। 

उत्तर- कोई एक खामी हो तो आपको बताऊँ, ख़ामियाँ ही ख़ामियाँ हैं। मंडियों को खत्म करने का केंद्र सरकार का सोचा समझा प्लान है। खेती में कॉपोरेट का आगमन होने वाला है। निजी कंपनियों को बढ़ावा देने की कोशिशें की जा रही हैं। अगर ऐसा हुआ तो किसान खेती बाड़ी से पैदल हो जाएगा और उनको फसल का उचित मूल्य भी नहीं मिलेगा। पहला कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य विधेयक-2020 है जिसमें पारंपरिक खेती के खत्म होने के संकेत हैं। वहीं, दूसरा कृषि कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक-2020 है, इसमें फसल मूल्यों की गारंटी कहां है। दोनों से अन्नदाताओं को जरा भी फायदा होने वाला नहीं, सिवाए नुकसान के। 

प्रश्न- सरकार का तर्क है विधेयकों से खेती में नई क्रांति आएगी।

उत्तर- हमारा विरोध इसी बात को लेकर ही तो है। हम यही मांग कर रहे हैं। दोनों विधेयकों से फायदे की एबीसीडी कोई बताए तो भला। प्रधानमंत्री आएं और सार्वजनिक रूप से हमें बताएं और तसल्ली दें। विधेयकों के लागू होने से किसान कैसे लाभान्वित होंगे, उसका मसौदा बताया जाए। अगर नहीं बताते हैं तो हम उन्हें ये जरूर बताएंगे कि इन विधेयकों से नुकसान किस तरह का होगा। कुल मिलाकर बात सिर्फ इतनी-सी है, प्रधानमंत्री हिंदुस्तान की समूची खेती को अंबानी-अड़ानी को सौंपना चाहते हैं। दोनों को फायदा दिलवाने के लिए वह कोई भी नुकसान उठा सकते हैं।

प्रश्न- ऐसे तो किसानों का खेती से मोह भंग हो जाएगा?

उत्तर- मोह भंग होगा हो गया है। देखिए, खेती लगातार घाटे का सौदा बनती जा रही है, इसलिए अब कोई खेती बाड़ी करना नहीं चाहता। सरकार ऐसा चाहती है। किसानों का मोह भंग हो और सरकार खेती पर कब्ज़ा करके उसका तुरंत कॉरपोरेटकरण करे। ऐसे माहौल में वित्तमंत्री जीरो बजट खेती की बात करती हैं, उनसे कोई पूछे क्या उस लायक जमीनें बची हैं? जीरो बजट खेती के तहत खेती के लिए जरूरी बीज, खाद-पानी आदि का इंतजाम प्राकृतिक रूप से ही किया जाता है। इसके लिए मेहनत जरूर अधिक लगती है, लेकिन खेती की लागत बहुत कम आती है और कीमत अधिक मिलती है। जीरो बजट खेती में लागत बहुत कम हो जाती है, इसलिए किसानों को फसल को उगाने के लिए कर्ज लेने की जरूरत नहीं होगी और किसान कर्ज के जाल में नहीं आएंगे।

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प्रश्न- आपको ऐसा क्यों लगता है कि सरकारें किसानी को गंभीरता से नहीं लेती?

उत्तर- गंभीरता से लेतीं, तो आज ऐसी नौबत नहीं आती। पिछले तीन दशकों से केंद्र में आनी वाली सभी सरकारें कुम्भकर्ण की तनिद्रा में लीन रही हैं। उन्हें जगाने के लिए हमने पिछले साल किसान यात्रा के रूप में पूरे देश में भ्रमण किया। हमसे वायदे किए गए, लेकिन समय के साथ भुला दिए गए। तब हमारी यात्रा करीब बीस प्रांतों से होकर दिल्ली पहुंची थी। मुहिम में देश के कोने-कोने से आए किसानों ने सरकार को ललकारा था। अल्टीमेटम दिया था कि अभी भी वक्त है सुधर जाओ। देश का अन्नदाता इस वक्त सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है। पर किसी को कोई परवाह नहीं? आंदोलन के जरिए पूरे भारत के किसानों को एक संदेश देना था कि मौजूदा केंद्र सरकार पूँजीपतियों की है, न कि किसानों और ग़रीबों की? 

प्रश्न- केंद्र सरकार किसान नेताओं पर आरोप लगा रही है कि वह किसानों को गुमराह कर रहे हैं?

उत्तर- किसानों और किसान नेताओं के बीच संबंध खराब करने की सरकार की ये सुनियोजित साजिश मात्र है। उनको पता है जब किसानों के पक्ष में आवाज़ उठाने वाले कोई नहीं होगा, तो वह अपनी मनमानी पर उतर आएंगे। लेकिन हम ऐसा होने नहीं देंगे। देश का किसान किस कदर हताश-परेशान है, इसका अंदाजा भी नरेंद्र मोदी नहीं लगा सकते हैं। जिस देश की जनसंख्या का सत्तर फीसदी हिस्सा किसान आबादी से लबरेज हो और वही परेशान हो, इससे बड़ी विडंबना भला क्या होगी। मोदी ने किसानों से लच्छेदार बातें और लालच के बल पर बेवकूफ़ बनाकर दोबारा से सत्ता हासिल की है। 

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प्रश्न- केंद्र सरकार का दावा है कि किसानों के लिए अप्रत्याशित कदम उठाए जा रहे हैं।

उत्तर- बातें करने में ये लोग माहिर खिलाड़ी हैं। सुशासन एक लोकप्रवर्तित अवधारणा है और समुचित न्याय जनता को मिले इसकी उम्मीद सरकारों से होती है। पर, इस मोर्चे पर सरकारें पूरी तरह विफल रही हैं। किसानों-ग़रीबों की बुनियादी आवश्यकताओं से सरकारों ने किनारा किया हुआ है। आर्थिक आयामों के आधार पर युक्त व्यवस्थाओं को समुचित रूप देना हो या सुशासनिक माहौल, सभी क्षेत्रों में इस सरकार ने गलत कृत्य किया है। नोटबंदी और जीएसटी की आड़ में देश के किसान लुट चुके हैं। सदियों से भारत का आर्थिक जीवन मूल्य किसानी पर निर्भर रहा है उसकी रीढ़ किसान रहे हैं। लेकिन अब उनकी कमर टूट चुकी है।

-डॉ. रमेश ठाकुर

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