Prabhasakshi NewsRoom: Modi किसानों को कितने भी फायदे पहुँचाते रहें, राजनीति कर रहे किसान संगठन सरकार के विरोध में भ्रम फैलाते रहेंगे

By नीरज कुमार दुबे | Sep 03, 2024

केंद्र सरकार किसानों की समस्याओं को सुलझाने और उन्हें हर तरह से राहत पहुँचाने वाले फैसले लगातार कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने तीसरे कार्यकाल की शुरुआत ही किसान कल्याण सम्मान निधि की किश्त जारी करके की थी। कृषि क्षेत्र की किस्मत संवारने और किसान कल्याण की दिशा में तमाम कदम उठाने का जहां आम किसान स्वागत कर रहे हैं वहीं किसान हित का नाम लेकर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने वाले कुछ किसान संगठन यह मानने को तैयार ही नहीं हैं कि मोदी सरकार किसानों के लिए कुछ कर रही है। जनता ने मोदी सरकार को तीसरी बार शासन करने का जनादेश दिया मगर अपने को किसान संगठनों का प्रतिनिधि बताने वाले कुछ लोगों को यह बात पच नहीं रही है। किसानों के नाम पर आंदोलन करने को सदैव आतुर रहने वाले यह आंदोलनजीवी अब राज्य विधानसभा चुनावों में भाजपा को हराने का आह्वान कर रहे हैं। इसलिए सरकार से लगातार सवाल पूछने वाले किसान संगठनों से ही आज हम कुछ सवाल कर रहे हैं।

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किसान संगठनों से दूसरा सवाल यह है कि केंद्र सरकार ने अक्टूबर से शुरू होने वाले विपणन वर्ष 2024-25 के लिए खरीफ चावल खरीद का लक्ष्य पांच प्रतिशत बढ़ाकर 485 लाख टन तय किया है और राज्यों से मोटे अनाज की खरीद बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करने को कहा है। क्या इससे किसानों का भला नहीं होगा? हम आपको बता दें कि चालू विपणन वर्ष 2023-24 (अक्टूबर-सितंबर) में सरकार ने 463 लाख टन खरीफ चावल की खरीद की है। यहां यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि केंद्र सरकार ने खरीफ विपणन सत्र 2024-25 के दौरान 19 लाख टन खरीफ मोटे अनाज (श्री अन्न) की खरीद का लक्ष्य भी रखा है। यह लक्ष्य खरीफ विपणन सत्र 2022-23 (खरीफ फसल) के दौरान 6.6 लाख टन की खरीद की तुलना में काफी अधिक है।

किसान संगठनों से तीसरा सवाल यह है कि केंद्रीय कृषि मंत्रालय लगभग एक एकड़ भूमि पर ‘मातृ वन’ तैयार करेगा ताकि पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों को बढ़ावा मिले। क्या यह कदम सबके हित में नहीं है? 

किसान संगठनों से चौथा सवाल यह है कि जब आंकड़े दर्शा रहे हैं कि कृषि और ग्रामीण श्रमिकों के लिए खुदरा मुद्रास्फीति घट गयी है तो क्या यह सब बिना सरकार के कोई कदम उठाये ही हो गया? हम आपको बता दें कि कृषि श्रमिकों के लिए मुद्रास्फीति जुलाई में घटकर 6.17 प्रतिशत और ग्रामीण श्रमिकों के लिए 6.20 प्रतिशत पर रही। इस वर्ष जून में कृषि और ग्रामीण श्रमिकों के लिए खुदरा मुद्रास्फीति दर क्रमशः 7.02 प्रतिशत और 7.04 प्रतिशत थी।

किसान संगठनों से पांचवां सवाल यह है कि मोदी सरकार ने एक लाख करोड़ रुपये की कृषि अवसंरचना कोष (एआईएफ) योजना का जो दायरा बढ़ाया है क्या वह किसान हित में नहीं है? क्या इससे कृषि क्षेत्र में रोजगार के अवसर नहीं बढ़ेंगे? हम आपको बता दें कि सरकार ने यह कदम देश में कृषि संबंधी अवसंरचना सुविधाओं को मजबूत करने के उद्देश्य से उठाया गया है। सरकार ने देश में कृषि बुनियादी ढांचे को बढ़ाने और मजबूत करने तथा कृषक समुदाय को समर्थन देने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में एआईएफ योजना के दायरे का विस्तार करने के लिए कई उपायों की घोषणा की है। 

जहां तक किसान संगठनों की ओर से की जा रही राजनीति की बात है तो आपको बता दें कि संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) ने कहा है कि हरियाणा और जम्मू-कश्मीर के विधानसभा चुनावों में भाजपा की हार यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) सहित किसानों की अन्य मांगें पूरी हों। एसकेएम ने एक बयान में कहा है कि हरियाणा और जम्मू-कश्मीर के किसान विधानसभा चुनावों में भाजपा को ‘‘बेनकाब करने, उसका विरोध करने और उसे दंडित’’ करने के लिए बड़े पैमाने पर लोगों को लामबंद करेंगे।

किसान आंदोलन की अगुवाई करने वाले एसकेएम ने कहा कि भाजपा को हालिया लोकसभा चुनाव में ‘‘भारी झटका’’ लगा है, और उसके नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) को 159 ग्रामीण निर्वाचन क्षेत्रों में हार का सामना करना पड़ा है। एसकेएम ने कहा है कि इन विधानसभा चुनावों में भाजपा का हारना किसानों के नजरिये से अहम होगा, जिससे उन्हें कृषि को कॉरपोरेट के हाथों सौंपने के खिलाफ तथा अपनी आजीविका की रक्षा के लिए पूरे भारत में चल रहे आंदोलन में अपनी जीत सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी। एसकेएम ने कहा कि वह और केंद्रीय मजदूर संघों के संयुक्त मंच की हरियाणा राज्य समन्वय समितियां सात सितंबर को हिसार में ‘किसान और श्रमिक पंचायत’ आयोजित करेंगी।

बहरहाल, इसमें कोई दो राय नहीं कि कृषि और किसान कल्याण मोदी सरकार की प्राथमिकता है। अपने तीसरे कार्यकाल में मोदी सरकार ने अब तक जितने भी बड़े फैसले किये हैं उनमें सर्वाधिक कृषि और किसान कल्याण से ही जुड़े हैं। इसलिए किसान संगठनों को चाहिए कि वह भ्रम फैलाने की बजाय इस बात पर निगरानी रखें कि सरकार की ओर से जो फैसले किये गये हैं उसका लाभ हर किसान को मिले और इन योजनाओं का क्रियान्वयन में कहीं कोई गड़बड़ी नहीं होने पाये। किसान संगठन के जो प्रतिनिधि खुलेआम किसी खास दल को हराने का आह्वान कर रहे हैं उन्हें किसानों के मंच से ऐसा ऐलान करने की बजाय चुनाव में अपना पर्चा दाखिल करने के बाद अपनी चुनावी सभा से ऐसे बयान देने चाहिए।

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