By प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क | May 10, 2026
पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के पहले मुख्यमंत्री के रूप में शुभेंदु अधिकारी के शपथ लेने के कुछ ही घंटों बाद शनिवार शाम को राज्यभर के कई तृणमूल कांग्रेस कार्यालयों में अविश्वास और बेचैनी का माहौल दिखायी दिया। दक्षिण बंगाल के एक पार्टी कार्यालय में कार्यकर्ता चुपचाप टीवी स्क्रीन पर भाजपा के जश्न के दृश्य देखते रहे। चाय के कप वैसे ही पड़े रहे और बातचीत में बार-बार एक ही सवाल उठ रहा था : ममता बनर्जी ने पिछले 28 वर्षों में जो राजनीतिक संगठन खड़ा किया था, उसका अब क्या होगा है?
उन्होंने कहा कि गुटबाजी के कारण शासन और विकास परियोजनाएं ठप हो गईं। वहीं वरिष्ठ सांसद कल्याण बनर्जी ने राजनीतिक सलाहकार संस्था आई-पैक को दोषी ठहराते हुए संगठन के भीतर ‘‘तोड़फोड़’’ की बात कही। विरोध अभी खुलकर सामने नहीं आया है, लेकिन बंगाल का राजनीतिक इतिहास बताता है कि ऐसे क्षण अक्सर बड़े बदलाव की शुरुआत का संकेत होते हैं। चार बार के सांसद कल्याण बनर्जी ने कहा, ‘‘कोई भी राजनीतिक ताकत हमेशा अपने चरम पर नहीं रह सकती। जब उभार चरम तक पहुंच जाता है, तो पतन भीतर से शुरू होता है। तृणमूल को तृणमूल ने ही हराया है।’’
उन्होंने टिकट वितरण और आई-पैक आधारित चुनावी रणनीति को भी हार का कारण बताया। उनके अनुसार, ‘‘हर ग्राम पंचायत सदस्य खुद को टिकट का हकदार मान रहा था। अंदरूनी दरारों ने हमारी हार में बड़ी भूमिका निभाई।’’ तृणमूल एक पारंपरिक राजनीतिक दल से ज्यादा एक केंद्रीकृत राजनीतिक व्यवस्था की तरह काम करती रही, जिसका केंद्र ममता बनर्जी थीं। उम्मीदवार चयन, कल्याणकारी योजनाओं का प्रचार और संगठनात्मक नियंत्रण सब कुछ ऊपर से तय होता था, जहां निष्ठा को संस्थागत स्वायत्तता से अधिक महत्व दिया जाता था। यही मॉडल वर्षों तक पार्टी को चुनावी सफलता दिलाता रहा। इसी के सहारे ममता बनर्जी ने 2011 में 34 साल पुराने वाम मोर्चा शासन को समाप्त किया और सत्ता विरोधी माहौल के बावजूद लगातार टिके रहीं लेकिन अब यही केंद्रीकरण पार्टी की सबसे बड़ी कमजोरी बन गया है।
राजनीतिक विश्लेषक बिस्वनाथ चक्रवर्ती ने कहा, ‘‘पार्टी की संरचना सत्ता तक लगातार पहुंच पर निर्भर थी। जैसे ही वह कड़ी कमजोर होती है, विखंडन शुरू होना तय हो जाता है।’’ 71 वर्षीय ममता बनर्जी आज भी तृणमूल की सबसे बड़ी नेता हैं, लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं। सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलनों के दौर में वह सड़कों पर उतरकर संघर्ष कर रही थीं, जबकि अब उनके सामने 15 वर्षों की सत्ता का बोझ है जिसमें भर्ती घोटाले, भ्रष्टाचार के आरोप, प्रशासनिक थकान, गुटबाजी और स्थानीय नेताओं के प्रति जनता की नाराजगी शामिल हैं। चुनावी नतीजों ने 2011 से तृणमूल के चारों ओर बने ‘‘अजेय’’ होने के आभामंडल को भी तोड़ दिया है। पार्टी नेताओं को डर है कि आने वाले महीनों में नगरपालिकाओं और पंचायतों में दल-बदल शुरू हो सकता है।
विडंबना यह है कि जो पार्टी कभी विरोधियों में टूट करवाकर स्थानीय निकायों पर कब्जा करती थी, अब उसी रणनीति के अपने खिलाफ इस्तेमाल होने की आशंका जता रही है। हार के बाद अब तृणमूल महासचिव अभिषेक बनर्जी भी सवालों के घेरे में हैं। पिछले कुछ वर्षों में ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक पार्टी के मुख्य रणनीतिकार और दूसरे सबसे प्रभावशाली नेता बनकर उभरे थे। उम्मीदवार चयन से लेकर बूथ प्रबंधन तक 2026 की चुनावी रणनीति पर उनकी स्पष्ट छाप थी। लेकिन हार का बड़ा अंतर होने पर पार्टी के भीतर कई नेता उनकी कार्यशैली, आक्रामक संगठनात्मक बदलावों और सलाहकारों पर अत्यधिक निर्भरता पर सवाल उठा रहे हैं। कई नेताओं का मानना है कि बड़े पैमाने पर उम्मीदवार बदलने से स्थानीय समीकरण बिगड़ गए और संगठन कमजोर हुआ। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ममता बनर्जी को पूरी तरह खत्म मानना अभी जल्दबाजी होगी।
2004 में तृणमूल लोकसभा में केवल एक सीट पर सिमट गई थी और 2006 विधानसभा चुनाव में महज 30 सीटें मिली थीं, लेकिन सिंगूर-नंदीग्राम आंदोलनों के बाद पार्टी ने शानदार वापसी करते हुए 2011 में सत्ता हासिल की थी। हालांकि इस बार चुनौती अलग है। उम्र, संगठनात्मक थकान और भाजपा की मजबूत होती मौजूदगी ने बंगाल की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया है। तृणमूल के सामने अब चुनौती सिर्फ सत्ता में वापसी की नहीं, बल्कि उस राजनीतिक संगठन को बिखरने से बचाने की है, जो कभी बंगाल का सबसे मजबूत राजनीतिक तंत्र माना जाता था।