सैटिंग, बैटिंग और रेटिंग (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Oct 24, 2026

हज़ारों साल से पूरी दुनिया जानती है कि हम अपना सभी आकार और प्रकार का कामकाज अपनी पसंद की शैली में करते हैं। माहौल खुश रहे इसलिए हम अपनी सैटिंग, बैटिंग और रेटिंग भी खुद किया करते हैं। दूसरा रेटिंग करने वाला चाहे कितना शानदार, जानदार और ईनामदार हो हम रेटिंग स्वीकार नहीं करते। रेटिंग एजेंसी अंतर्राष्ट्रीय हो, उसका नाम कितना भी आकर्षक हो। हम मानते हैं इन संस्थाओं द्वारा रेटिंग अपनी सुविधा के लिए की जाती है और हमारे लिए दुविधा खड़ी हो जाती है।

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उनकी दी हुई रेटिंग भुलाकर हम यह ध्यान रखते हैं कि हमारी सारी वोटें सलामत रहें, जातीय समीकरण बिगड़ें नहीं। उदाहरणतया पारदर्शिता के अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों ने गुरुओं को ईमानदारी के पैमाने पर मनमाने अंक दिए हैं। हम क्यूं खाएं उनका बेस्वाद आकलन। उन्हें पता होना चाहिए कि हमें पसंद नहीं आएगा, स्वीकारेंगे नहीं तो ऐसा आकलन किया ही क्यूं। ज्ञानी हैं हम, इस बारे हम दो क्या तीन राय भी नहीं रखते। इस बारे दिलचस्प परिचर्चा हो सकती है कि नैतिक मूल्य सिखाए जा सकते हैं या नहीं। हमारे यहां नैतिकता एक पवित्र संस्था के रूप में स्थापित है इसलिए नैतिकता क्या किसी भी किस्म के मूल्य सिखाए जा सकते हैं। पेट से तो कोई भी सीख कर नहीं आता।

हमारी सैटिंग, बैटिंग और रेटिंग इतनी अनुभवी होती है कि हमने कूड़ा कचरा प्रबंधन बेहतर तरीके से सीखने के लिए, दर्जनों लोगों की टीम को हज़ारों किलोमीटर दूर भेजा अब यह तो बदतमीज़ कूड़ा कचरा शातिर है कि काबू में नहीं आता। वर्तमान युग के परिवेश में भ्रष्टाचार, बेईमानी, दुष्टता व धूर्तता के कारण थोड़ी बहुत परेशानी तो है लेकिन हमारी सैटिंग कहीं कोई फर्क पड़ने नहीं देती, हम मानकर चलते हैं कि बैटिंग ठीक चल रही है इसलिए कोई दूसरा हमारे कामकाज की रेटिंग क्यूं करे।

वैसे वास्तव में हम हमेशा चाहते हैं कि हमारी रेटिंग कोई  ज़रूर करे लेकिन आंख मींच कर सौ में से दो सौ नंबर दे। यहां यह सवाल प्रवेश करता है क्या त्रेतायुग में रावण नहीं था। क्या वे अपने बारे में किसी भी तरह की रेटिंग की परवाह करते थे। हर युग का कठोर सत्य यही है इसलिए अपनी सैटिंग बैटिंग रेटिंग का प्रबंधन खुद करते रहना चाहिए करिए यही सुखी रहने का सूत्र है।

- संतोष उत्सुक

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