बैंगन का भर्ता (व्यंग्य)

Baingan
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संतोष उत्सुक । Oct 13 2026 6:27PM

पति ने कल्पना की कि पत्नी यह भी कह सकती है कि पता नहीं बैंगन कितने पुराने पौधे में लटके होंगे । उस पौधे को लगाने वाला व्यक्ति कैसा होगा जिसकी वजह से बैंगनों का ऐसा भर्ता बना। लेकिन पत्नी ने ठोक बजाकर कहा, इन बैंगनों का रंग भी कुछ उड़ा उड़ा सा था। कई टेढ़ी मेढ़ी लकीरें भी इन पर थी।

बाज़ार से गोभी, गाजर और बैंगन आए। उन्हें बिना काटे नहाए फ्रिज में प्रवेश दिया गया ताकि पारिवारिक परम्परा का उचित सम्मान जारी रहे। इस प्रथा के अंतर्गत आधा दर्जन सब्जियां कई दिनों तक अडोस पड़ोस में रह सकती हैं लेकिन समझा नहीं जाता कि आज रात को कौन सी सब्जी खाएं । बनने, खाने और बचने के बाद सब्ज़ी फ्रिज में ठंडी रहती है और चर्चा गर्म कि दोपहर में क्या बनेगा। यह व्यव्हारिक समस्या राष्ट्रीय है। लाखों कुक खाना पकाते हुए रीलें पका रहे हैं, अखबार और पत्रिकाएं सिखा रही हैं लेकिन यह मसला फ्रिज का स्थाई वासी है। खैर, बात बैंगन की है जो बाज़ार से आकर, ठंड में इंतज़ार कर रहे हैं कि कब उनका भर्ता बनेगा।  

बैंगन उदास और उपेक्षित सही लेकिन चर्चा में रहते हैं। थाली के बैंगन हमेशा अपना रुतबा कायम रखते हैं और असामाजिक आलुओं को रिझाते रहते हैं। लीजिए, कई दिन बाद वह शुभ समय आया जब रात के खाने में बैंगन का भर्ता बनना सुनिश्चित हुआ। उस दिन कुछ साधारण खाना  बनना था। भर्ता बनने की प्रक्रिया के दौरान जब हवा में भूने गए बैंगनों को आपस में मिलाने लगे तो उनके नाराज़ हिस्सों ने मिलने जुलने में हिचकिचाहट बरती।   

पत्नी ने घोषणा की, आज भर्ता ठीक से नहीं बन रहा है। बैंगन अच्छी तरह से फ्राय नहीं हुए, कहीं कहीं से कच्चे रह गए। मिक्स नहीं हो रहे। जब वह बैंगन के हिस्सों को आपस में मिला रही थी तब उसके चेहरे को भी अच्छा नहीं लग रहा था। सब्जी का रंग गहरा भूरा हो गया था। वह बोली, यह बैंगन तो अच्छे नहीं निकले। आज भर्ता अच्छा नहीं बनने वाला क्यूंकि इनमें बीज भी बहुत निकले, लगता है यह बैंगन पुराने होंगे।

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पति ने कल्पना की कि पत्नी यह भी कह सकती है कि पता नहीं बैंगन कितने पुराने पौधे में लटके होंगे । उस पौधे को लगाने वाला व्यक्ति कैसा होगा जिसकी वजह से बैंगनों का ऐसा भर्ता बना। लेकिन पत्नी ने ठोक बजाकर कहा, इन बैंगनों का रंग भी कुछ उड़ा उड़ा सा था। कई टेढ़ी मेढ़ी लकीरें भी इन पर थी। जब मैनें इन्हें दबाकर देखा ठीक से दब भी नहीं रहे थे। हालांकि इन्हें मैंने अपनी पसंद के चाकू से ही काटा लेकिन अन्दर से इनका टेक्सचर भी कुछ जांच नहीं रहा था। इनके तो बीज भी अजीब से लगे। मैंने आज तक बैंगन में ऐसे बीज नहीं देखे तभी शायद इनका भर्ता  ठीक नहीं बना। अगर बैंगन के साथ एक दो पत्ते भी होते तो स्वाद कुछ और ही होता। यदि इनका रंग लाल होता तो भर्ता स्वादिष्ट बनता।

पति ने कहा, आपने पिछली बार ऐसे ही बैंगनों से स्वादिष्ट भर्ता बनाया था। पत्नी बोली, वो बैंगन ऐसे नहीं थे। पहली बार लगा..... क्या ऐसे भी बैंगन होते हैं। ये बैंगन तो बेगुण ही थे। इन बैंगनों में कोई विटामिन भी नहीं होगा। इन बैंगनों की तो शक्ल ही अजीब थी जिससे लगता था कि यह वज़न भी नहीं घटा सकते। पाचन सुधार नहीं सकते, दिल की सेहत बना नहीं सकते तभी इनका भर्ता ठीक नहीं बना। इनसे अच्छा भर्ता तो आलुओं का बन जाता।

पत्नी द्वारा, कई हज़ार लाइक्स वाली रील में बताए, सुगम तरीके से पकाए भर्ते की, पति ने परम्परा अनुसार तारीफ की। बैंगन का भेजा फ्राय करने के लिए नए उपकरण का उद्घाटन पत्नी द्वारा किया गया। इस दौरान पति को याद आया कि इन बैंगनों ने नौ दिन पहले फ्रिज में प्रवेश किया था लेकिन उन्हें भर्ता होने का अवसर नहीं मिल रहा था। वे फ्रिज में पसरे हुए परेशान हो चुके थे तभी उनका भर्ता वैसा नहीं बना, जैसा बन सकता था। एक वजह यह भी रही कि पत्नी को बैंगन ज्यादा पसंद नहीं।

- संतोष उत्सुक

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