By अनन्या मिश्रा | Aug 06, 2026
काशी को मोक्षदायिनी कहा जाता है। कहा जाता है कि अगर अपने जीवनकाल में एक बार भी काशी नगरी के दर्शन हो जाएं, तो जातक को मोक्ष की प्राप्ति होती है। लेकिन यह मोक्ष इतनी आसानी से कहां मिलता है। स्कंद पुराण के 'काशी खंड' का पहला श्लोक है- 'विश्वेशं माधवं धुण्डिं दण्डपाणिं च भैरवम्। वन्दे काशीं गुहां गङ्गां भवानीं मणिकर्णिकाम॥'' जिसका अर्थ है कि सिर्फ विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग के दर्शन मात्र से ही काशी धाम की यात्रा पूरी नहीं होती है।
काशी के कोतवाल काल भैरव हैं। काशी में घुसते ही सबसे पहले इनके दरबार में हाजिर होना जरूरी है। बिना काल भैरव के अनुमति के काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग के दर्शन संभव नहीं है।
ज्योतिर्लिंग के दर्शन के बाद मां अन्नपूर्णा के दर्शन जरूरी है। यह काशी की अन्न की देवी हैं। पुराणों में उल्लेख मिलता है कि जो भी व्यक्ति यहां आता है, उसको जीवन में कभी भी अन्न की कमी नहीं होती है।
काशी विश्वनाथ मंदिर के प्रवेश द्वार पर ही आपको गणेश जी का प्राचीन मंदिर मिल जाएगा। इनके दर्शन के बिना ज्योतिर्लिंग के दर्शन अधूरे हैं। धुंडीराज के दर्शन के बाद आपको भगवान शिव के दर्शन होते हैं।
बिंदु माधव मंदिर वाराणसी के पंचगंगा घाट पर स्थित है। यहां पर भगवान श्रीहरि विष्णु विराजमान हैं। धार्मिक मान्यता है कि यह वही स्थान है, जहां पर भगवान विष्णु ने महादेव की तपस्या की थी। इनके दर्शन के बिना भी काशी की यात्रा अधूरी मानी जाती है।
51 शक्तिपीठों में से एक विशालक्षी मंदिर भी इस यात्रा का अहम हिस्सा है। यह मंदिर मणिकर्णिका घाट पर है। यहां पर मां सती के दाहिने कान का कुंडल गिरा था। इसलिए जरूरी है कि आप इस मंदिर आकर देवी के दर्शन जरूर करें।
दंडपाणि मंदिर काशी के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक है। यहां के दर्शन करना भी जरूरी है। यहां की विशेषता यह है कि यहां काशी का न्यायाधीश कहे जाने हरिकेश देव की पूजा होती है। यह हाथ में छड़ी लिए हुए हैं। कहा जाता है कि काशी में किसी भी गलत व्यक्ति को नहीं रहने देते हैं।
ऐसे में अगर आप काशी यात्रा पर जा रहे हैं, तो आपको भी एक बार इन मंदिरों के दर्शन जरूर करने चाहिए।