By अंकित सिंह | Oct 08, 2026
वोटर लिस्ट में बदलाव के दौरान कथित गड़बड़ियों को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग करते हुए विपक्ष ने अपना विरोध तेज़ कर दिया है। इसी बीच, 42 पूर्व जजों और संवैधानिक पदों पर रह चुके लोगों का एक समूह चुनाव आयोग और अन्य संवैधानिक संस्थाओं के बचाव में सामने आया है। 7 अक्टूबर को लिखे एक खुले पत्र में, इन पूर्व जजों ने संवैधानिक संस्थाओं पर हो रहे लगातार हमलों के ख़तरे के बारे में चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि बिना सबूत के चुनावी गड़बड़ी के बार-बार लगाए जाने वाले आरोप लोकतंत्र में जनता के भरोसे को कमज़ोर कर सकते हैं।
हालांकि, पूर्व जजों ने संस्थानों की जायज़ आलोचना और उन पर हमलों के बीच फ़र्क बताया। उन्होंने कहा कि संस्थानों की आलोचना करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन उन्हें नीचा दिखाना या बदनाम करना नहीं। पत्र में कहा गया है कि चुनाव आयोग समेत संवैधानिक संस्थाओं को लगातार "चोर", "कठपुतली" और "समझौता करने वाली" संस्थाएं बताया जा रहा है, साथ ही यह आरोप भी लगाया गया है कि चुनाव अधिकारियों के नाम सार्वजनिक किए जा रहे हैं और उन्हें बदले की कार्रवाई की चेतावनी दी जा रही है। इसमें यह भी कहा गया कि किसी भी अदालत ने इन आरोपों को सही नहीं पाया है।
हस्ताक्षर करने वालों ने विपक्षी दलों द्वारा लगाए जा रहे "वोट की चोरी" के आरोपों पर भी सवाल उठाए और कहा कि ऐसे दावे ज़्यादातर प्रेस कॉन्फ्रेंस में किए गए हैं, न कि कानूनी कार्यवाही के ज़रिए। पत्र में कहा गया, "जब आयोग शपथ-पत्र मांगता है, तो कोई शपथ-पत्र दाखिल नहीं किया जाता।" साथ ही, इस बात पर भी सवाल उठाया गया कि चुनाव में हारने के बाद इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (EVM) को दोषी क्यों ठहराया जाता है, जबकि उन्हीं मशीनों से मिली जीत को चुनौती नहीं दी जाती।