By अभिनय आकाश | Jul 22, 2026
13 जुलाई 2026 को एक हवाई जहाज तेहरान से उड़ान भरकर यमन की तरफ बढ़ रहा था। उस हवाई जहाज में इंसार अल्लाह यानी हूती विद्रोहियों के अधिकारी सवार थे। ये अधिकारी ईरान में अयातुल्लाह अली खामनेई के जनाजे से लौट रहे थे। 13 जुलाई की शाम को जब प्लेन सना इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर उतरने ही वाला था कि तभी रनवे पर धड़ाधड़ कई मिसाइलें दागी गई। पूरा रनवे तबाह हो गया। ऐसे रनवे पर प्लेन का लैंड होना मुमकिन नहीं था। इसलिए आनन-फानन में प्लेन की डायरेक्शन मोड़ी गई और उसे सना की बजाए यमन के एक अन्य हवाई अड्डे हुदैदा में उतारा गया। हूती अधिकारी सुरक्षित अपने देश पहुंच चुके थे। लेकिन इस घटना ने ये सवाल खड़ा कर दिया था कि आखिर प्लेन की लैंडिंग के कुछ देर पहले किसने रनवे में हमला करवाया होगा। इसके पीछे क्या वजह रही होगी। हूतियों ने इसकी जांच की तो पता चला की इसके पीछे सऊदी अरब का हाथ है। ये पता चलने के फौरन बाद हूतियों ने सऊदी अरब पर हमला बोल दिया। सऊदी अरब के अभा एयरपोर्ट को निशाना बनाया गया। सऊदी अरब ने इस हमले की निंदा करते हुए बदला लेने की बात कही। लेकिन फिर कोई हमला सऊदी की तरफ से नहीं किया गया। हूती विद्रोहियों की तरफ से कहा गया कि अगर सऊदी ने कोई हमला किया तो उसके तेल भंडार और बंदरगाहों को तबाह कर दिया जाएगा। कई दिनों तक सऊदी और हूती एक दूसरे को धमका रहे थे। लेकिन 20 जुलाई को हूतियों ने ऐसा ऐलान कर दिया है, जिसने मोहम्मद बिन सलमान की नींद जरूर उड़ा दी होगी।
ईरान युद्ध के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य में रुकावटों के बाद, सऊदी अरब ने अपने कच्चे तेल के निर्यात का ज़्यादातर हिस्सा फारस की खाड़ी से हटाकर लाल सागर की ओर मोड़ दिया। अब सऊदी अरामको के कच्चे तेल के निर्यात का 70 प्रतिशत से अधिक हिस्सा देश के भीतर 746 मील लंबी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन के ज़रिए पहुँचाया जाता है। यह पाइपलाइन तेल उत्पादन वाले अबकैक और घावर जैसे पूर्वी क्षेत्रों को यानबू में स्थित लाल सागर के निर्यात टर्मिनल से जोड़ती है। इस बदलाव ने यानबू को सऊदी अरब का मुख्य एक्सपोर्ट हब बना दिया है। हाल के शिपिंग डेटा से पता चलता है कि यानबू से एक्सपोर्ट हाल के हफ़्तों में औसतन लगभग 4 मिलियन बैरल प्रति दिन रहा है, जबकि एक साल पहले यह लगभग 973,000 बैरल प्रति दिन था। जून तक, कुछ अनुमानों के अनुसार यानबू से कच्चे तेल का एक्सपोर्ट रिकॉर्ड 4.77 मिलियन बैरल प्रति दिन तक पहुँच गया। यूरोप जाने वाले सऊदी टैंकर स्वेज नहर से होते हुए उत्तर की ओर जाते हैं, जबकि एशियाई बाज़ारों के लिए जाने वाले कार्गो बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य से होते हुए दक्षिण की ओर जाते हैं। होर्मुज़ जलडमरूमध्य में पहले से ही रुकावटें होने के कारण, रेड सी दुनिया भर में तेल की सप्लाई बनाए रखने के लिए सऊदी अरब का मुख्य वैकल्पिक रास्ता बन गया है। खबर है कि सऊदी अरब इस वैकल्पिक एक्सपोर्ट कॉरिडोर को मज़बूत करने के लिए रेड सी तट तक अपने पाइपलाइन नेटवर्क का विस्तार करने पर भी विचार कर रहा है।
इस रास्ते का महत्व आज का नहीं है। करीब 3000 साल पहले भी मिस्र, अरब, भारत और पूर्वी अफ्रीका के बीच जो मसालों, सोना, लोबान और रेशम का जो व्यापार था इसी समंदर के रास्ते से होता था। बाद में रोमन साम्राज्य, अरब व्यापारियों, उस्मानी साम्राज्य और फिर यूरोपीय औपनिवेशिक शक्तियों ने भी इसी रास्ते का इस्तेमाल किया था। लेकिन जब 1869 में स्वेज नहर खुली तब बाबल मंदब की जो भूमिका थी वो और बढ़ गई। इसकी अहमियत और बढ़ गई और फिर इसे समुद्री बहुत इंपॉर्टेंट महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में दुनिया के गिना जाने लगा। इसकी ये वजह थी क्योंकि अब जहाजों को अफ्रीका का चक्कर लगा के नहीं जाना पड़ता था और एशिया से यूरोप की जो दूरी थी वो हजारों किलोमीटर कम हो गई थी। आज इसी रास्ते से दुनिया का लगभग 10 से 12% समुद्री व्यापार गुजरता है। ओआरएफ की रिपोर्ट में जिक्र मिलता है कि हर साल यहां से एक ट्रिलियन डॉलर का सामान गुजरता है। भारतीय रुपयों में यह रकम करीब ₹87 लाख करोड़ की होती है। अगर तेल और गैस को भी इसमें जोड़ दिया जाए तो यह रकम और ज्यादा हो जाएगी। सामान्य परिस्थितियों में जैसे 2023 में हम देखते हैं गजा वॉर के पहले यहां से लगभग 93 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल और पेट्रोलियम के जो प्रोडक्ट्स थे वो इसी रास्ते से गुजरते थे। लेकिन हूती विद्रोहियों ने गजा में इसराइली हमलों के विरोध में यहां से गुजरने वाले जहाजों पर हमला शुरू कर दिया।
चीन इस रास्ते का सबसे ज्यादा इस्तेमाल करता है। चीन से यूरोप जाने वाले इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल फोन, कंप्यूटर, सोलर पैनल, मशीनें, खिलौने सब यहीं से जाते हैं। यूरोप भी एशियाई देशों को यहीं से सामान बेचता है। महंगी महंगी यूरोपियन कंपनी की जो कारें हैं, विमान के पुरजे हैं, मशीनें हैं, लग्जरी सामान हैं वो सब यहीं से होकर गुजरता है। सोचिए इतना जरूरी रास्ता है यह। और इसी रास्ते पर अब सऊदी अरब के जहाजों को उड़ाने की धमकी मिल रही है। अगर एक भी सऊदी अरब के जहाज को होती सक्सेसफुली टारगेट कर लेते हैं तो दूसरे जहाज भी यहां से गुजरने से डरेंगे और करोड़ों डॉलर का व्यापार ठप्प पड़ सकता है। इस इस वजह से सऊदी अरब औरतियों के बीच पिछले 4 साल से एक सीज फायर चल रहा था।
हालांकि हूथियों ने यह साफ़ नहीं किया है कि वे अपनी समुद्री नाकेबंदी को असल में कैसे लागू करेंगे, लेकिन इस घोषणा से यह डर बढ़ गया है कि लाल सागर से गुज़रने वाले कमर्शियल जहाज़ एक बार फिर हमले का निशाना बन सकते हैं। बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य लाल सागर का दक्षिणी प्रवेश द्वार है और यह दुनिया के सबसे अहम समुद्री 'चोकपॉइंट' (संकरे और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण समुद्री रास्ते) में से एक है। अगर इसे बंद किया जाता है या इसमें लंबे समय तक रुकावट आती है, तो एक अभूतपूर्व स्थिति पैदा हो जाएगी जिसमें होर्मुज जलडमरूमध्य और बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य, दोनों पर एक साथ पाबंदियां लग जाएंगी। यानबू से एशिया तक कच्चा तेल ले जाने वाले टैंकरों के लिए बाब अल-मंदेब से गुज़रना ज़रूरी है। इस रास्ते पर होदेइदाह और अदन की खाड़ी के पास काम कर रही हूथी एंटी-शिप मिसाइलों, बैलिस्टिक मिसाइलों, ड्रोन और बिना चालक वाले समुद्री जहाजों से खतरा हो सकता है। यहाँ तक कि स्वेज नहर के ज़रिए यानबू से उत्तर की ओर यूरोप जाने वाले जहाजों को भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जा सकता, क्योंकि लाल सागर के अंदर शिपिंग लेन या तेल से जुड़े बुनियादी ढांचे पर संभावित हमलों की चिंता बनी हुई है। एक और चिंता यानबू शहर के सुरक्षित न होने की है। यह बंदरगाह हूथी-कब्जे वाले उत्तरी यमन से लगभग 800 मील उत्तर-पश्चिम में स्थित है और 2022 के समझौते से पहले हूथी हमलों का शिकार हो चुका है। जानकारों का कहना है कि अगर स्टोरेज टैंक, लोडिंग टर्मिनल या पंपिंग स्टेशन पर लंबी दूरी के ड्रोन या मिसाइल से सफल हमले होते हैं, तो सऊदी के एक्सपोर्ट के काम पर सीधा असर पड़ सकता है। अगर इंश्योरेंस प्रीमियम बढ़ते रहे या इंश्योरेंस कंपनियां युद्ध के जोखिम का कवरेज पूरी तरह से बंद कर दें, तो शिपिंग कंपनियां ज़्यादा जोखिम वाले इलाकों में अपने जहाज़ भेजने से हिचकिचा सकती हैं। ऐसी स्थिति में कई जहाज़ों को रेड सी के बजाय केप ऑफ़ गुड होप होते हुए अफ्रीका का चक्कर लगाकर जाना पड़ सकता है।
हूतियों से अकेले उलझना सऊदी अरब के लिए इस बार मुश्किल होगा। ऊपर से इस बात में भी संशय बना हुआ है कि क्या मुसीबत की घड़ी में अमेरिका उसे बचाने आएगा? सऊदी अरब को बचाने आएगा? क्योंकि हॉर्मूस खोलने की मुहिम में तो सऊदी अरब ने अमेरिका को ऐन वक्त में धोखा दे दिया था। उसे अपने एयरबेस का इस्तेमाल नहीं करने दिया था। जिसकी वजह से अमेरिका का पूरा का पूरा ऑपरेशन ही फेल हो गया था। ऐसे में देखना होगा कि सऊदी अरब इस समस्या को कैसे सुलझाता है।