By अभिनय आकाश | May 29, 2026
साल 1971 के युद्ध में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में अपना एक हिस्सा गंवाने के बाद सत्ता संभालने वाले पाकिस्तान के वजीर-ए-आला जुल्फिकार अली भुट्टो ने एक वक्त में ये ऐलान किया था कि भारत से 100 साल जंग लड़ेंगे। इसके साथ ही उन्होंने कहा था कि घास फूस खाकर भी भारत के खिलाफ पाकिस्तान परमाणु बम जरूर बनाएगा। भुट्टो ने कहा था कि पहले से ही एक ईसाई बम है, एक यहूदी बम है और अब एक हिंदू बम भी है। उन्होंने सवाल किया, तो फिर एक इस्लामिक बम क्यों नहीं? एक दशक से भी कम समय बाद, 1980 के दशक की शुरुआत में, उन्हीं शब्दों और उनके निहितार्थों के परिणामस्वरूप इज़राइल और भारत ने हाथ मिलाया, हालांकि उस समय दोनों देशों के बीच पूर्ण राजनयिक संबंध नहीं थे। आखिरकार, दोनों ही पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान के दो कट्टर रणनीतिक शत्रु थे और आज भी हैं। भारत-इज़राइल के औपचारिक राजनयिक संबंध एक दशक बाद, 1992 में प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव के नेतृत्व में स्थापित हुए। भारत, इज़राइल और पाकिस्तान सभी परमाणु शक्तियां हैं। लेकिन एक वक्त ऐसा भी था जब तीनों कोवर्ट ऑपरेशन में उलझ गए थे। इज़राइल को डर था कि पाकिस्तान इस्लामिक बम हासिल करने के बेहद करीब है। बम को लेकर इज़राइल का डर इतना गहरा था कि उसने भारत के साथ मिलकर एक संयुक्त गुप्त हमले की योजना बना डाली थी।
1980-81 के आसपास भारत को यह खबर मिली कि पाकिस्तान परमाणु परीक्षण करने वाला है। और फिर कहूटा एक जगह है पाकिस्तान में जहां ये सारा कुछ अरेंजमेंट किया जा रहा था। कहूटा नामक जगह पाकिस्तान में वहीं पर ये किया जाना था। रॉ के एजेंट्स को लगाया गया कि पहले सच्चाई कंफर्म करो कि सही बात है या नहीं है। बहुत प्रयासों के बाद भी रॉ के एजेंट्स नहीं पहुंच सके वहां तक। लेकिन 1981 में एक छोटी सी सफलता मिली। सफलता ये कि कि कुछ लोग थे जो कि काहूटा के रहने वाले नहीं थे। लेकिन एक बार्बर के यहां वो बाल कटवाने आते थे। रॉ के एजेंट्स ने उस बार्बर के यहां जो कतरने होती थी, उन बालों के सैंपल ले लिए और उस सैंपल को दिल्ली भेजा। दिल्ली में जब उन बालों के सैंपल को टेस्ट किया गया तो उन बालों में यूरेनियम की मात्रा मिली। यानी बाल कटवाने आए लोग यूरेनियम इनरचमेंट से जुड़ा कोई काम कर रहे थे। यह इस बात का कंफर्मेशन था कि काहूटा में गुपचुप तरीके से यूरेनियम इनरचमेंट कर रहा है। ये जब पूरी खबर पक्की हो गई तो भारत तो कंफर्म हो गया। लेकिन इस बीच मोसाद अपना अलग ऑपरेशन चल रहा था, चला रहा था। ये पता करने के लिए कि सचमुच पाकिस्तान परमाणु बम बना रहा है या नहीं। मोसाद के पास हमसे ज्यादा पुख्ता जानकारी थी कि पाकिस्तान अपने परमाणु कार्यक्रम को लीबिया को ट्रांसफर कर रहा है। लीबिया की राजधानी त्रिपोली है। त्रिपोली में आईएसआई के एजेंट्स और लीबिया के शासक उस वक्त शायद मोहम्मद गद्दाफी थे। बाद में मोसाद ने यह खबर भारत के साथ शेयर की और कहा कि अगर पाकिस्तान परमाणु बम बनाता है या फिर लीबिया जैसे तानाशाही देश को अगर यह परमाणु बम देता है तो ये पूरे इलाके के लिए खतरा होगा तो अभी इसे समाप्त किया जाना चाहिए और फिर तब यह ऑपरेशन की रूपरेखा बनाई गई।
भारत इजराइल के लोगों ने मिलकर ये बनाया था सब कुछ तैयारी हो गई थी। उससे पहले इजराइल ने एक और कारनामा किया था। 1981 में इराक में एक जगह है ओशरक में बमबारी करके इराक के परमाणु कार्यक्रम को नष्ट कर दिया था तो इनके पास वो एक्सपर्टीज थी। प्लान के अनुसार भारत के दो एयर बेसेस जामगर और उधमपुर का इस्तेमाल होगा। ये जॉइंट ऑपरेशन था। भारत का जगुआर उसमें शामिल होगा और इजराइल का F15 और F16 लड़ाकू विमान उस वक्त उनके पास था। तो ये सब उड़ान भरेंगे और कोहूटा जो न्यूक्लियर बेस है उस पे बमबारी करके उसको बर्बाद करके और चले आएंगे। सारा रिस्क इजराइल लेने के लिए तैयार था। लेकिन दावा ये किया जाता है कि इंदिरा गांधी ने ग्रीन सिग्नल दिया और जब सारी तैयारियां हो गई कुल 16 लड़ाकू विमान तैयार किए गए। लेकिन, फिर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अंतिम चरणों में इस अभियान को रद्द कर दिया। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी धमकियों के आगे इंदिरा घबरा गईं। आखिरकार पाकिस्तान ने 1998 में परमाणु बम हासिल कर लिया। और, इसने दक्षिण एशिया को पूरी तरह बदल दिया और अब इसका साया मध्य पूर्व पर भी मंडरा रहा है। पाकिस्तान परमाणु हथियारों से लैस एकमात्र इस्लामिक देश है। दशकों बाद, जिस परमाणु कार्यक्रम को इज़राइल और भारत रोकना चाहते थे, वह यहूदी राष्ट्र (इज़राइल) की चौखट के और करीब आ गया, जब पाकिस्तान और सऊदी अरब ने 2025 में 'सामरिक पारस्परिक रक्षा समझौते' (स्ट्रैटेजिक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट) पर हस्ताक्षर किए, जो इस्लामाबाद के परमाणु सुरक्षा कव का विस्तार रियाद तक करता है।
अब 2026 में कहूटा की वह कहानी फिर से प्रासंगिक हो गई है क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पाकिस्तान पर 'अब्राहम समझौते' पर हस्ताक्षर करने और इज़राइल को औपचारिक रूप से मान्यता देने का दबाव बना रहे हैं। यह समझौता, जिसने मध्य पूर्व (पश्चिम एशिया) के कई मुस्लिम-बहुल देशों और इज़राइल के बीच संबंधों को सामान्य बनाया था, पाकिस्तान में लंबे समय से राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील और विवादास्पद (रहा है। इस्लामाबाद के लिए, इज़राइल को मान्यता देना हमेशा से फिलिस्तीन के मुद्दे से जुड़ा रहा है। वहीं इज़राइल के लिए, पाकिस्तान परमाणु हथियारों से लैस एक ऐसा इस्लामिक देश है जो उसे मान्यता नहीं देता। इसलिए, इन दोनों देशों को हाथ मिलाने के लिए मजबूर करना, दशकों के संदेह, वैचारिक मतभेदों और गुप्त दुश्मनी को भुलाकर एक नई वास्तविकता को स्वीकार करने के लिए कहने जैसा है। और, 1980 के दशक की शुरुआत की 'कहूटा की कहानी' से बेहतर कोई दूसरा वाकया पाकिस्तान और इज़राइल के बीच की इस दुश्मनी को बयां नहीं करता।