250 सुखोई फाइटर जेट्स पर भारत का बड़ा फैसला, चीन के उड़ जाएंगे होश!

जैमिंग एक ऐसी प्रक्रिया होती है जिसमें दुश्मन भारी मात्रा में रेडियो इंटरफेस पैदा करता है ताकि आपके विमान को मिलने वाले जीपीएस सिग्नल रुक जाए। वहीं इस प्रूफिंग इससे भी अधिक घातक है जिसमें दुश्मन आपके सिस्टम को फर्जी सिग्नल भेजकर गुमराह करता है।
भारतीय वायुसेना की भविष्य की युद्ध क्षमताओं को पूरी तरह से बदलने का एक मास्टर स्ट्रोक चल दिया गया है। भारत का सबसे भरोसेमंद शिकारी सुखोई 30 एमKI की जो अब एक ऐसे डिजिटल कवच से लैस होने जा रहा है जिसे भेद पाना दुश्मन के लिए नामुमकिन हो जाएगा। दरअसल इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर आधुनिक युद्ध अब केवल उन मिसाइलों और बमों के बारे में नहीं रह गया है जिन्हें हम देख सकते हैं। आज के समय में यह एक अदृश्य जंग लड़ी जा रही है जिसे हम इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर कहते हैं। उसका नाम भी है। अब इस युद्ध में दुश्मन का सबसे बड़ा हथियार मिसाइल नहीं होता है बल्कि रेडियो तरंगे होती हैं। अगर दुश्मन आपके फाइटर जेट के संचार और नेविगेशन सिस्टम को जाम कर दे, जाम कर दे तो करोड़ों का विमान आसमान में एक अंधे पक्षी की तरह ब्लास्ट हो जाएगा, तबाह हो जाएगा।
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जैमिंग एक ऐसी प्रक्रिया होती है जिसमें दुश्मन भारी मात्रा में रेडियो इंटरफेस पैदा करता है ताकि आपके विमान को मिलने वाले जीपीएस सिग्नल रुक जाए। वहीं इस प्रूफिंग इससे भी अधिक घातक है जिसमें दुश्मन आपके सिस्टम को फर्जी सिग्नल भेजकर गुमराह करता है। अब कल्पना कीजिए जरा आपकी पायलट को लग रहा है कि वो अपनी सीमा में है लेकिन इस प्रूफिंग के कारण वो अनजाने में दुश्मन के एयर डिफेंस जाल में फंस सकता है। अब इसी बड़े खतरे को देखते हुए रक्षा मंत्रालय ने सुखोई 30 एमटीआई के लिए एक क्रांतिकारी रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल यानी कि आरएफपी जारी कर दिया है। सुखोई 30 एमKI को भारतीय वायुसेना की रीड माना जाता है। भारत के पास इस समय लगभग 258 ऐसे विमान हैं जो लद्दाख की चोटियों से लेकर हिंद महासागर की लहरों तक भारत की रक्षा करते हैं। लेकिन बदलते समय के साथ इन विमानों को सुपर सुखोई में बदलना बहुत जरूरी और बहुत अनिवार्य हो गया था। इस आधुनिकीकरण कार्यक्रम का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है वो नया स्टेट ऑफ द आर्ट एंटीना जिसे अब इन विमानों में लेस कर दिया जाएगा लगा दिया जाएगा। यह एंटीना एंटी जैमिंग और एंटी स्प्रूफिंग क्षमताओं से लेस होगा जो यह सुनिश्चित करेगा कि युद्ध के सबसे कठिन समय में भी सुखोई का नेविगेशन सिस्टम कभी फेल ना हो। यह अपग्रेड केवल एक छोटा सुधार नहीं है बल्कि यह सुखोई को एक नए पीढ़ी के लड़ाकू विमान में तब्दील करने की दिशा में एक बहुत बड़ी छलांग है।
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मल्टी कॉनस्टेलेशन का जादू और एनएवीआईसी का उदय इस नए सिस्टम की सबसे बड़ी विशेषता है और इसका मल्टीकस्टेलेशन होना इसकी सबसे बड़ी जीत है। इसको सरल शब्दों में समझा जाए तो सुखोई को यह नया एंटीना केवल एक देश के सेटेलाइट सिस्टम पर निर्भर नहीं करेगा। यह एक साथ भारत के अपने स्वदेशी नेविक सिस्टम, अमेरिका के जीपीएस और रूस के सिस्टम और चीन के बाय डू और यूरोप के गैलीलियो सिस्टम से सिग्नल प्राप्त करने में सक्षम हो जाएगा। अब यहां महत्वपूर्ण भूमिका हमारे अपने नैविक यानी कि नेविगेशन विद इंडियन कॉनस्टिलेशन की है। भारत ने कारगिल युद्ध के कड़वे अनुभव से सीखा था कि संकट के समय विदेशी प्रणालियों पर भरोसा नहीं किया जा सकता था। अब जब हमारे सुखोई भारत की अपनी सेटेलाइट प्रणाली यानी नैविक का उपयोग करेंगे तो किसी भी विदेशी शक्ति के पास हमारे विमानों के सिग्नल को बंद करने की ताकत ही नहीं हो पाएगी। खासकर चीन के पास यह आत्मनिर्भर भारत की रक्षा क्षेत्र में एक बहुत बड़ी जीत है।
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