By अभिनय आकाश | Aug 04, 2026
बिहार में जिस सीट पर प्रशांत किशोर की जीत हुई है, यह वो सीट है जिसको लेकर दबी जुबान में अक्सर बीजेपी वाले कहते थे कि यहां कुत्ता बिल्ली भी चुनाव लड़ा देंगे तो वो जीत जाएगा। और वो गलत नहीं कहते थे। हां, क्योंकि यह बांकीपुर था। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन का अपना घर जिस सीट से वह एक दो बार नहीं लगातार पांच बार जीते थे और यहीं से जीतकर वह दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी के अध्यक्ष बन गए। 15 साल से यहां कमल का बटन लगातार दब रहा था और नतीजा पहले से ही लिखा था और ताना उस आदमी को मारा जा रहा था जिसने 243 सीटों पर लड़कर शून्य जीता था। जिसको लेकर बिहार में मीम भी वायरल हुए थे। प्रशांत तब खुलकर कहते थे कि मैं मरा नहीं हूं अभी अभी जिंदा हूं। अभी मैं मरा नहीं हूं। अभी नहीं मरा हूं। जब मर जाऊंगा तो फिर लिखना अभी मरा नहीं हूं। अब इस लाइन का मतलब समझ में आ रहा है। पटना के गिनती वाले हॉल में राउंड द राउंड वही मजाक भारी पड़ता गया जैसे पंचायत में आपको याद होगा। विधायक जी हार गए थे और सामने वाली पार्टी जीत गई थी। प्रशांत किशोर के समर्थक भी वैसे ही डांस कर रहे हैं। कह रहे हैं कि आज सावन के सोमवार के दिन बाबा का आशीर्वाद मिल गया। पीके ने केवल एक सीट का चुनाव नहीं जीता है। बांकीपुर बीजेपी की प्रतिष्ठा से जुड़ी सी और 1995 से ये सीट बीजेपी के पास रही थी। पहले पटना वेस्ट और फिर 2008 के परिसीमन के बाद बांकीपुर से पांच बार नितिन और उससे पहले उनके पिता नवीन प्रसाद सिन्हा तीन बार इस सीट से विधायक रहे। प्रशांत किशोर ने इस सिलसिले को तोड़ दिया है। बिहार के बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर की जीत ने देश की राजनीति में एक नए ट्रेंड को रेखांकित किया है। भले ही प्रशांत किशोर, चंद्रशेखर आजाद (आजाद समाज पार्टी), असदुद्दीन ओवैसी (AIMIM) और जयराम महतो (JLKM) जैसे नेता अपनी-अपनी पार्टियों के अकेले सांसद या विधायक हों, लेकिन संसद और विधानसभाओं से लेकर जनता के बीच इनकी आवाज और राजनीतिक प्रभाव किसी बड़ी पार्टी से कम नहीं है। ऐसे में आइए जानते हैं कि कैसे एकल राजनीतिक चेहरे अपने मुद्दों, सोशल मीडिया पकड़ और बेबाक नेतृत्व के दम पर पारंपरिक बहुदलीय व्यवस्था के बीच अपनी एक मजबूत और असरदार पहचान बना रहे हैं।
किशोर से पहले, भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर आज़ाद 2024 के लोकसभा चुनावों में अपनी पार्टी 'आज़ाद समाज पार्टी (कांशीराम)' के टिकट पर उत्तर प्रदेश की नगीना सीट से सांसद चुने गए थे। उन्होंने बीजेपी उम्मीदवार को 1.51 लाख वोटों से हराया था। 38 वर्षीय आज़ाद, जो दलितों के एक प्रमुख नेता हैं, ने 2022 में गोरखपुर अर्बन सीट से यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ अपना पहला चुनाव लड़ा था, लेकिन वे हार गए और उन्हें सिर्फ़ 3% वोट मिले। सांसद चुने जाने के बाद, आज़ाद संसद के अंदर और बाहर दलितों और मुसलमानों की एक बड़ी आवाज़ बनकर उभरे हैं। उन्हें लोकसभा में अलग-अलग मुद्दों पर बहस में हिस्सा लेने का समय मिलता है, साथ ही संसद के बाहर अपने आंदोलन के दौरान उन्हें सांसद का प्रोटोकॉल भी मिलता है। मध्य प्रदेश के दतिया विधानसभा उपचुनाव में उनकी पार्टी के उम्मीदवार दामोदर यादव तीसरे स्थान पर रहे। सोमवार को घोषित नतीजों में कांग्रेस उम्मीदवार घनश्याम सिंह ने बीजेपी के आशुतोष तिवारी को 6,016 वोटों से हराया, जबकि दामोदर को 22,527 वोट मिले।
जयराम महतो, जिन्हें 'टाइगर' के नाम से भी जाना जाता है, झारखंड विधानसभा में अपनी पार्टी 'झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा' (JLKM) के अकेले विधायक हैं। उन्होंने 2024 का लोकसभा चुनाव गिरिडीह से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर लड़ा था और उन्हें 3.47 लाख वोट मिले थे। इसके बाद, नवंबर 2024 के विधानसभा चुनावों से पहले चुनाव आयोग ने JLKM को मान्यता दी, जिसमें वे डुर्मी सीट से चुने गए। उन्होंने बेरमो से भी चुनाव लड़ा था, लेकिन वहां वे दूसरे स्थान पर रहे। 31 साल के महतो OBC कुडमी समुदाय के उभरते हुए नेता हैं और झारखंड के युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय हैं। सोशल मीडिया पर उनके वीडियो को बहुत ज़्यादा लोग देखते हैं। इन वीडियो में वे राजनीतिक जागरूकता, राजनीतिक नेताओं द्वारा जमा की गई संपत्ति, लोगों की गरीबी और इस बात पर बात करते हैं कि कैसे झारखंड में बाहरी लोगों को सरकारी नौकरियां मिलती हैं। अपने चुनावी नामांकन हलफनामे में उन्होंने YouTube को अपनी आय का स्रोत बताया था। महतो, आज़ाद और किशोर में एक आम बात यह है कि वे अपनी-अपनी पार्टियों के युवा संस्थापक हैं और उन्होंने बदलाव और न्याय तथा नई राजनीति के अपने एजेंडे से लोगों के बीच अपनी पहचान बनाई है।
AIMIM के प्रमुख और हैदराबाद से पांच बार सांसद रहे 57 वर्षीय असदुद्दीन ओवैसी लोकसभा में अपनी पार्टी के अकेले सदस्य हैं। देश में मुसलमानों की एक अहम आवाज़ के तौर पर उभरने के कारण उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है। वे संसद और दूसरे सार्वजनिक मंचों पर बड़े राष्ट्रीय मुद्दे उठाने के लिए जाने जाते हैं, जिनमें मुस्लिम समुदाय से जुड़े मुद्दे भी शामिल हैं। हालांकि AIMIM एक पुरानी पार्टी है, लेकिन ओवैसी ने इसके विस्तार की अगुवाई की है। अब तेलंगाना, बिहार और महाराष्ट्र समेत कई राज्यों में पार्टी के कई विधायक और पार्षद हैं।