By अभिनय आकाश | Aug 06, 2026
राजनीतिक अनिश्चितता, सीमा पार से बढ़ता आतंकवाद और सड़कों पर भड़कता जन-आक्रोश पाकिस्तान इस वक्त एक साथ कई मोर्चों पर गंभीर संकट से जूझ रहा है। तस्वीर साफ़ है। एक कब्जे वाले इलाके में कराया गया दिखावटी चुनाव, खून-खराबे में तब्दील होते सड़कों के विरोध-प्रदर्शन, पुलिस थानों पर बरसाती गोलियों वाले सिरफिरे आतंकी, और सेना के इशारों पर नाचती सरकार की धज्जियां उड़ाते विद्रोही! गजब की बात तो यह है कि कभी जिनके दम पर पाकिस्तान उछलता था, आज वही पुराने दोस्त उसके सबसे बड़े दुश्मन बन बैठे हैं। सोने पर सुहागा यह कि जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री की एक आवाज पर आज भी सड़कों पर हुजूम उमड़ पड़ता है और हालत यह आ चुकी है कि खुद सरकार भी मान रही है कि सिस्टम पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है। कहानी की शुरुआत करते हैं पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (PoK) से करते हैं। इस्लामाबाद की सरकार ने सोचा था कि 10 अगस्त तक निपटाने के लिए यहाँ एक ढर्रे वाला लोकल इलेक्शन करा देंगे। लेकिन नेताओं की रैलियों की जगह, पाकिस्तान के गैर-कानूनी कब्जे में पिस रही जनता ने यह पूरी गर्मी सड़कों के उग्र आंदोलनों में बिता दी। इस पूरे बवाल के केंद्र में 'जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी' (JAC) खड़ा है। शुरुआत बहुत सीधी-सादी मांगों सस्ती बिजली, सब्सिडी वाला आटा, टैक्स में छूट और शासन में सही नुमाइंदगी से हुई थी। लेकिन अब यह चिंगारी पूरे पाकिस्तान के लिए ऐसा नासूर बन चुकी है, जिसे बुझाना इस्लामाबाद के बस के बाहर की बात दिख रही है!
पाकिस्तान के सबसे बड़े सूबे क्वेटा बलूचिस्तान का इलाका वैसे तो लगभग 45% क्षेत्र में फैला है। ईरान से इसकी सीमा भी लगती है। बलूचिस्तान में दूर दूर तक खाली मैदान और रेगिस्तान हैं। यहां की वीरानगी में इन दिनों बागी तेवर और तेज हो गए हैं। बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) के लड़ाके अलग देश की मांग कर रहे हैं। हालात ये हैं कि बलूच लड़ाकों और पश्तून (पठान) विद्रोहियों का बलूचिस्तान सूबे के लगभग 70% हिस्से पर कब्जा है। अब सवाल केवल यह नहीं है कि पाकिस्तानी सुरक्षा बल कितने विद्रोहियों को ढेर करते हैं या गिरफ्तार करते हैं। असली सवाल यह है कि क्या पाकिस्तानी सरकार पुलिस स्टेशन खुले रख सकती है, हाईवे पर यातायात चला सकती है, बाजार और कारोबार सामान्य रख सकती है और लोगों को बिना डर के यात्रा करने की सुरक्षा दे सकती है? बलूचिस्तान के कई इलाकों में हथियारबंद लड़ाके क्वेटा, खुजदार और मसतुंग जैसे शहरों में घुसकर पुलिस थानों और सरकारी दफ्तरों पर हमले करते हैं। बीएलए के लड़ाके और पश्तून गुट सड़कों पर अस्थायी चौकियां बना रहे हैं और वाहनों की तलाशी लेते हैं। खुलेआम वसूली भी होती है।
बलूचिस्तान को पाकिस्तान की खनिजों की खदान भी कहते हैं। बात शुरू की तो खुजदार शहर के युवक मोमिन का पाक सरकार पर गुस्सा फूट पड़ा। मोमिन कहते हैं यहां के ग्वादर पोर्ट पर चीन का कब्जा है। चीन ने सीपैक के नाम पर यहां लगभग 3 लाख करोड़ रुपए का निवेश किया है। ग्वादर पोर्ट पर चीन की फिशिंग बोट्स का कब्जा है। स्थानीय बलूच मछुआरों को चीनी बोट्स खदेड़ देती हैं। इनकी बोट्स बड़ी और ज्यादा पावर वाली होती हैं। ज्यादातर बलूच मछुआरों के पास अब भी पालदार नौकाएं हैं। बलूच बेरोजगार हो रहे हैं। 55 साल के असलम का कहना है कि यहां के रेअर अर्थ मिनरल पर अमेरिका का कब्जा है। पाक आर्मी चीफ मुनीर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के सामने मिनरल की नुमाइश करते हैं। इस खजाने पर केवल बलूचों का हक है।
खैबर पख्तूनख्वा पाकिस्तान का फ्रंटियर यानी सरहदी इलाका है। डूरंड लाइन पाक और अफगानिस्तान को अलग करती है। अफगानिस्तान में तालिबान सरकार के पांच साल में खैबर के अधिकांश इलाके में इन्हीं का दबदबा है। 2 अगस्त को पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिमी खैबर पख्तूनख्वा (KP) प्रांत में आतंकवाद-विरोधी रैली के दौरान हुए आत्मघाती बम धमाके में कम से कम 17 लोगों की मौत हो गई और दो दर्जन से ज़्यादा लोग घायल हो गए। मरने वालों में ज़्यादातर आम नागरिक और पुलिस अधिकारी थे। यह हमला प्रांत की स्वात घाटी के काबल शहर में हुआ, जहाँ प्रदर्शनकारी एक पुलिस स्टेशन के पास जमा होकर नारे लगा रहे थे और घाटी में शांति और अमन की मांग कर रहे थे। 'स्वात पीस रैली' नाम की इस रैली का आयोजन स्थानीय आदिवासी परिषद 'स्वात अमन जिरगा' ने किया था। यह बम धमाका पाकिस्तान के लिए आंतरिक सुरक्षा और जान-माल के नुकसान के लिहाज़ से बेहद गंभीर रहे साल की एक और घटना है। 'डॉन' की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान सशस्त्र बलों के एक प्रवक्ता ने शुक्रवार (31 जुलाई) को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि 2026 में पाकिस्तान में आतंकवाद की 3,145 घटनाएं हुईं, जिनमें से 1,971 घटनाएं KP में हुईं। जुलाई 2026 तक, आतंकवादी घटनाओं में 800 से ज़्यादा पाकिस्तानी मारे जा चुके हैं, जिनमें 300 से ज़्यादा सुरक्षाकर्मी शामिल हैं। खैबर में पाक सरकार के कानून नहीं तालिबान का शरिया चलता है। दरअसल, इस इलाके में विभाजन के समय से ही कबिलाई व्यवस्था लागू रही है। स्वात, सैदू, मिंगोरा और मर्दन में 'लोया जिरगा' के जरिए ही कानून चलता है। ये जिस जगह असल में शरिया कानून को लागू करती है। अफगान तालिबान इसका है। इमरान खान की सरकार ने 2021 में टीटीपी के साथ सुलह की कोशिश की, लेकिन इमरान की गद्दी जाते ही टीटीपी ने खैबर में अपने दबदबे को और बढ़ा लिया है। खैबर के वजीरिस्तान में पाकिस्तान सेना कई सैन्य ऑपरेशन कर चुकी है, लेकिन यहां अब टीटीपी काबिज है। आए दिन टीटीपी के हमलों के कारण स्कूल और कॉलेज बंद रहते हैं। खैबर पख्तूनख्वा में टीटीपी के आए दिन होने वाले हमलों से पाक सेना में खौफ है। इस साल टीटीपी फौज पर 145 से ज्यादा हमले कर चुकी है, इनमें 48 सैनिक मारे गए। खैबर में डूरंड लाइन पर अभी पाक सेना की 50 फौजी चौकियां खाली हैं। 22 पोस्ट पर ही पाक फौज तैनात है।