अमृतपान समान है गीता का पाठ, मिलेंगे जीवन के सूत्रवाक्य

By आरएन तिवारी | Nov 20, 2020

गीता अर्जुन के समक्ष अवश्य गाई गई किन्तु इसका उद्देश्य विश्व का प्रत्येक प्राणी था। यह सम्पूर्ण मानव-जाति का धर्म शास्त्र है। हमारे आचार्यों ने इसे ब्रह्म-गीत भी (Song of God) कहा है। यह हमें कर्म करने की शिक्षा देती है। यह हमारी जिंदगी को एक उत्सव बना देती है। यदि हम धर्म के रास्ते पर चलते हुए अपना कर्त्तव्य करते रहें, तो नि:संदेह हमारा जीवन देव तुल्य हो जाता है। राम और कृष्ण को हम भगवान इसीलिए मानते हैं क्योंकि अनेक कष्ट उठाकर भी उन्होने जीवन भर धर्म पूर्वक अपने कर्तव्य का पालन किया। 

या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिसृता :।। 

गीता के श्लोक अच्छी तरह से मनन करके हृदय में धारण करने योग्य हैं, जो साक्षात भगवान के मुखारविंद से निकले हैं। जो इसका आश्रय लेता है उसको फिर किसी दूसरे धर्म ग्रंथ की आवश्यकता नहीं होती। 

तो क्यों न हम, गीता गुनगुनाकर अपने जीवन को धन्य कर लें। 

एकं शास्त्रं देवकी पुत्रं गीतम् 

एको देवो देवकी पुत्र एव । 

एको मंत्रः तस्य नामानि यानि 

कर्माप्येकं तस्य देवस्य सेवा ॥ 

आज के युग में लोग एक शास्त्र, एक ईश्वर, एक धर्म तथा एक वृति के लिए उत्सुक हैं। अतएव मेरी समझ से एकं शास्त्रं देवकी पुत्रं गीतम् केवल एक शास्त्र श्रीमद्भगवत गीता हो जो सम्पूर्ण विश्व के लिए हो। 

एको देवो देवकी पुत्र एव सारे संसार के लिए एक ईश्वर हो और वह कौन? श्रीकृष्ण। एको मंत्रः तस्य नामानि यानि एक मंत्र एक प्रार्थना हो उनके नाम का संकीर्तन---

हरे कृष्ण, हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। 

हरे राम, हरे राम राम राम हरे हरे।। 

कर्माप्येकं तस्य देवस्य सेवा और केवल एक ही कार्य हो भगवान की सेवा।

हमारे धर्माचार्यों के अनुसार सभी शास्त्रों में सर्व श्रेष्ठ शास्त्र एक ही है और वह है श्रीमद्भगवत गीता जिसका गायन स्वयम भगवान ने किया है। तैतीस करोड देवताओ में सर्व श्रेष्ठ देव देवकीनन्दन भगवान श्रीकृष्ण ही हैं। इसका प्रमाण भागवत महापुराण में भी मिलता है। 

एते चान्शकला: सर्वे कृष्णस्तुभगवानस्वयम  

इंद्रारिव्याकुलम हन्तुम मृडयंति युगे-युगे ॥ 

आज तक जितने भी राम आदि चौबीस अवतार हुए हैं वे सभी अंशावतार हैं, जैसे कि भगवान श्रीराम बारह कला के अवतार हैं किन्तु श्रीकृष्ण सोलह कला के अवतार हैं और वे सौ फीसदी (पूर्ण) ब्रह्म हैं। यदि हम थोड़ा विचार करें तो पाते हैं कि स्वर्ग में सब कुछ है लेकिन मौत नहीं है, गीता में सब कुछ है लेकिन झूठ नहीं है, दुनिया में सब कुछ है लेकिन किसी को सुकून नहीं है और आज के इंसान में सब कुछ है लेकिन सब्र नहीं है।

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गीता का ज्ञान, मोह से ग्रस्त लोगों के हृदय में सब्र और संतोष का भाव भर देता है। हम सभी जानते हैं-- महाभारत युद्ध के पूर्व अर्जुन कितना दुखी, अधीर और बेचैन हो गया था। भगवान ने गीता का उपदेश देकर अर्जुन का शोक दूर किया था। आज किसकी जिंदगी में शोक नहीं है? दुनिया का हर प्राणी शोक-सागर में डूबा हुआ है, गीता शोक का निवारण करती है। सच पूछिए तो गीता समस्या से सावधान भी कराती है और समस्या का समाधान भी बताती है गीता उस दर्द की दवा है जिस दर्द और पीड़ा से संसार का प्रत्येक प्राणी तड़प रहा है। भगवान ने कुरुक्षेत्र में चार लोगों को गीता सुनाई थी। अर्जुन, हनुमान, धृतराष्ट्र और संजय। अर्जुन, हनुमान और संजय तो तत्क्षण ही मोह मुक्त हो गए केवल धृतराष्ट्र ही मूढ़ मति बना रहा। यहाँ एक शंका उत्पन्न होती है कि गीता जैसे पवित्रतम और शुद्धतम ज्ञान के संसर्ग से भी धृतराष्ट्र का मोह दूर नहीं हुआ? तो इस प्रश्न या रहस्य की चर्चा किसी दूसरे अंक में करेंगे। फिलहाल हमें इतना ही समझना है कि हमारा चरित्र अर्जुन, हनुमान और संजय की तरह बनें धृतराष्ट्र जैसे मूढ़ मति की तरह नहीं। 

भारतामृत सर्वस्वम विष्णु वक्त्राद्विनि:सृतम। 

गीता गंगोदकम पीत्वा पुन: जन्म न विद्यते ॥

हमारे मनीषियों ने गीता और गंगा को मोक्ष दायिनी माना है। पूरी दुनिया का मार्ग दर्शन करने वाले गोस्वामी तुलसी दास जी ने अपने रामचरित्मानस में देव नदी गंगा की जयकार करते हुए कहते हैं—

जय जय जय जग पावनी, जयति देवसरी गंग। 

जय शिव जटा निवासिनी, अनुपम तुंग तरंग॥   

गंगा अपने स्वच्छ और निर्मल जल से जगत को पवित्र करने वाली है। 

गंगा स्नान या गंगा-जल पान करने वाला तन और मन दोनों से पवित्र हो जाता है किन्तु श्रीमद्भगवत गीता रूपी अमृत का पान करने वाला सीधे वैकुंठ को प्राप्त करता है। श्रीमद्भगवत गीता महाभारत का अमृत है और इसे स्वयम भगवान विष्णु ने अपने मुख कमल से सुनाया है। गंगा गीता की बड़ी बहन है। गंगा का जन्म भगीरथ काल में हुआ और गीता का प्रादुर्भाव महाभारत काल में हुआ। श्रीमद्भगवत गीता भगवान के मुख से निकली हैं और गंगा भगवान के चरण कमलों से निकली हैं। नि:संदेह भगवान के मुख तथा चरणों में कोई अंतर नहीं है लेकिन निष्पक्ष और गहन अध्ययन से हम पाएंगे कि श्रीमद्भगवत गीता गंगा-जल के बनिस्पत अधिक श्रेष्ठ और महत्वपूर्ण है। 

सर्वोपनिषदों गावो दोग्धा गोपालनंदन: । 

पार्थो वत्स:सुधीर्भोक्ता दुग्धमगीतामृतम महत ॥ 

यह श्रीमद्भगवत गीता सभी उपनिषदों का सार है, गो माता के तुल्य है, 

ग्वाल-बाल के रूप में प्रसिद्ध परम पिता परमेश्वर भगवान श्रीकृष्ण इस गाय को दुहने वाले है, अर्जुन बछड़ा है और आप सभी प्रभा साक्षी के पाठक विद्वान गण इस भगवद्गीता के अमृतमय दूध का पान करने वाले हैं।

जय श्रीकृष्ण... 

- आरएन तिवारी

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