By अभिनय आकाश | Oct 07, 2026
फ्रांस में बदहाल शिक्षा व्यवस्था और बजट कटौती के खिलाफ शुरू हुआ छात्र आंदोलन अब केवल एक घरेलू संकट नहीं रह गया है बल्कि एक बड़े वैश्विक भू राजनीतिक टकराव का केंद्र बन चुका है। ईरान ने इस मुद्दे को लेकर फ्रांस को मानवाधिकारों और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर उसके दोहरे मापदंडों के लिए अंतरराष्ट्रीय मंच पर बुरी तरह लताड़ा है। ईरान के विदेश मंत्रालय ने तेहरान में तैनात फ्रांस के राजदूत पियारे कोचाड़ को तलब किया और प्रदर्शनकारियों पर की जा रही पुलिसिया बर्बरता के खिलाफ कड़ा विरोध दर्ज कराया। ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बाकेई ने फ्रांस को उसके दोहरे रवैया पर घेरते हुए कहा कि समस्या विरोध प्रदर्शन नहीं बल्कि पश्चिमी देशों की पाखंडी नीतियां है। बाकी ने जनवरी 2026 में ईरान में हुए प्रदर्शनों का हवाला देते हुए याद दिलाया कि तब फ्रांसीसी अधिकारियों ने ईरान में पुलिस थानों पर हुए सशस्त्र हमलों को शांतिपूर्ण विद्रोह बताया था और ईरान सरकार को संयम बरतने की सलाह दी थी। उन्होंने सवाल उठाया जब वही व्यवहार आगजनी और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं फ्रांस में होती है तो सरकार इसे शहरी हिंसा कहकर बल प्रयोग को जायज क्यों ठहरा रही है? क्या प्रदर्शनकारियों की भौगोलिक स्थिति के आधार पर मानव अधिकारों की परिभाषा बदल जाती है?
पुलिस द्वारा दागे गए आंसू गैस के गोलों, वाटर कैनन और स्टन ग्रेनेड की कारवाही में अब तक 300 से ज्यादा छात्र और 700 से ज्यादा पुलिसकर्मी घायल हो गए हैं। इस दौरान एक 15 वर्षीय छात्र का हाथ उड़ जाने से ऐसी गंभीर घटना भी सामने आई है। कानून व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर फ्रांसीसी प्रशासन अब तक 6000 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार कर चुका है। जिनमें से लगभग 85% नाबालिक हाई स्कूल के बच्चे हैं। अमेरिकी मीडिया के अनुसार ट्रंप का यह बयान अमेरिकी घरेलू राजनीति से प्रेरित है। जहां वे प्रवासियों के खिलाफ अपनी सख्त नीतियों को सही ठहराने के लिए फ्रांस की स्थिति का उदाहरण दे रहे हैं। डोन्ड ट्रंप के इस बयान पर फ्रांस के विदेश मंत्री झील नोएल बैरो ने तीखी आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि फ्रांस के विरोधी और साझेदार सभी अपने-अपने एजेंडे के तहत इस आंदोलन की मनगढ़ंत व्याख्या कर रहे हैं।