By नीरज कुमार दुबे | Aug 04, 2026
आजकल लगभग हर राजनीतिज्ञ के बयान में एक बात बार-बार सुनाई देती है कि जेन जी यह चाहती है, जेन जी वह चाहती है। चुनावी रणनीतिकारों से लेकर कॉरपोरेट सलाहकारों तक, हर कोई इस पीढ़ी की आकांक्षाओं का विश्लेषण करने में जुटा है। राजनीतिक दल भी दावा कर रहे हैं कि उनकी नीतियां जेन जी की उम्मीदों पर खरी उतरेंगी। यह अपने आप में इस बात का प्रमाण है कि आज की राजनीति में यह वर्ग कितना निर्णायक बन चुका है। दुनिया के कई देशों में जेन जी ने आंदोलनों के माध्यम से सत्ता प्रतिष्ठानों को चुनौती दी है और कई जगह राजनीतिक परिवर्तन का कारण भी बनी है। ऐसे में कोई भी सरकार या दल युवाओं को हल्के में लेने का जोखिम नहीं उठा सकता। यही वजह है कि प्रधानमंत्री से लेकर विपक्ष के बड़े नेता और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि तक, सभी इस समय जेन जी को अपने पक्ष में आकर्षित करने की कोशिश में लगे हुए हैं।
दरअसल, जेन जी का सबसे बड़ा एजेंडा सम्मानजनक अवसर है। यह पीढ़ी दान या अनुकंपा नहीं चाहती, बल्कि निष्पक्ष व्यवस्था चाहती है। उसे यह स्वीकार नहीं कि मेहनत कोई करे और नौकरी किसी पेपर माफिया या भ्रष्ट तंत्र की वजह से अटक जाए। उसे यह भी स्वीकार नहीं कि एक भर्ती प्रक्रिया पूरी होने में चार-पांच वर्ष लग जाएं और इस बीच उसकी उम्र, ऊर्जा और उम्मीदें खत्म होती चली जाएं। डिजिटल युग में पली-बढ़ी यह पीढ़ी हर चीज में पारदर्शिता और जवाबदेही की अपेक्षा करती है। इसलिए सरकारों के दावों और वास्तविकता के बीच का अंतर उसे तुरंत दिखाई देता है।
जेन जी की दूसरी बड़ी अपेक्षा संवाद है। यह पीढ़ी आदेश सुनने की बजाय अपनी बात सुने जाने की अपेक्षा रखती है। यदि सरकारें, विश्वविद्यालय, आयोग और राजनीतिक दल युवाओं से नियमित संवाद करें, उनकी शिकायतों का समयबद्ध समाधान दें और निर्णय प्रक्रिया को पारदर्शी बनाएं, तो असंतोष स्वतः कम हो सकता है। इसके विपरीत जब समस्याओं को टालने या आंदोलनों को केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा मानकर दबाने की कोशिश होती है, तब अविश्वास और गहरा होता है।
राजनीतिक दलों को भी यह समझना होगा कि जेन जी केवल नारों और भावनात्मक अपीलों से प्रभावित होने वाली पीढ़ी नहीं है। वह घोषणापत्र पढ़ती है, आंकड़ों की जांच करती है, तथ्यों की पड़ताल करती है और सोशल मीडिया के माध्यम से नेताओं की बातों की तुलना उनके काम से करती है। इसलिए रोजगार, शिक्षा, कौशल विकास, स्टार्टअप, अनुसंधान, डिजिटल अर्थव्यवस्था और सुशासन जैसे मुद्दे अब केवल नीति दस्तावेजों तक सीमित नहीं रह सकते; उनका असर जमीन पर दिखाई देना चाहिए।
देखा जाये तो जेन जी की सबसे बड़ी मांग बहुत सरल है। वह चाहते हैं एक ऐसा भारत, जहां प्रतिभा को अवसर मिले, व्यवस्था भरोसेमंद हो और भविष्य अनिश्चितता का पर्याय न बने। जो सरकारें और राजनीतिक दल इस संदेश को समझेंगे, वही आने वाले वर्षों की राजनीति का नेतृत्व करेंगे। और जो इसे केवल एक चुनावी नारा समझेंगे, उन्हें यह पीढ़ी उतनी ही तेजी से नकार भी सकती है, जितनी तेजी से वह किसी को लोकप्रिय बनाती है।