दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव में जेन जी ने एबीवीपी को जीताया, एनएसयूआई को छकाया, समझिए इसके राजनीतिक निहितार्थ

By कमलेश पांडे | Sep 21, 2026

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव 2026 के परिणाम घोषित हो चुके हैं, जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समर्थित छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने शानदार प्रदर्शन करते हुए केंद्रीय पैनल के चार में से तीन मुख्य पदों (अध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव) पर जीत हासिल की है। वहीं उपाध्यक्ष पद पर एक बड़ा उलटफेर देखने को मिला, जहाँ निर्दलीय उम्मीदवार दीपांशु शौकीन ने बड़ी जीत दर्ज की है। इस चुनाव में कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई का खाता भी नहीं खुल सका। इससे साफ है कि जेन-जी युवाओं का रूझान अब भी एबीवीपी के साथ बना हुआ है। चर्चित जेन-जी आंदोलन (CJP) के बाद आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जेन-जी युवाओं को खुद से जोड़े रखने का जो बीड़ा उठाया, वह सफल रहा। इसके राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव भी दूरगामी होंगे।

एक, अध्यक्ष- यश डबास- एबीवीपी - 24,576    विजय शंकर मीणा/NSUI - 22,523 वोट।

दो, उपाध्यक्ष- दीपांशु शौकीन- निर्दलीय- 30,615- इशू मौर्या (ABVP) - 16,910 वोट।

तीन, सचिव- रिया छावड़ी- एबीवीपी - 21,650- नम्रता चौधरी/NSUI - 14,869 वोट।

चार, संयुक्त सचिव- लक्ष्यराज सिंह    - ABVP - 16,615- विशेष यादव, निर्दलीय/SCS - 15,778 वोट।

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव 2026 में कांटे की टक्कर हुई। अध्यक्ष पद के लिए मतगणना के दौरान कई राउंड तक ABVP के यश डबास और NSUI के विजय मीणा के बीच बेहद करीबी मुकाबला देखा गया, लेकिन अंतिम राउंड्स में यश डबास ने बाजी मार ली। इस साल 18 सितंबर को हुए मतदान में 40.46% वोटिंग दर्ज की गई थी, जो कि पिछले 3 वर्षों में सबसे अधिक रही। दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश के बाद चुनाव नतीजों के बाद किसी भी तरह के विजय जुलूस या रैलियों पर पूरी तरह से रोक लगाई गई थी। समझिए इसके राजनीतिक निहितार्थ:-

देखा जाए तो दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव के परिणाम केवल एक छात्र संगठन की जीत या हार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह देश के सबसे बड़े छात्र निर्वाचन क्षेत्रों में से एक—जहाँ युवा (जेन जी) मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं—के वैचारिक और सामाजिक रुझान को दर्शाते हैं। इस चुनाव परिणाम और रुझान के राजनीतिक व सामाजिक मायने निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझे जा सकते हैं:-

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एक, 'जेन जी' (Gen Z) का व्यावहारिक राजनीति की ओर झुकाव: जेन जी (1997-2012 के बीच जन्मे युवा) को अक्सर वैचारिक रूप से स्वतंत्र माना जाता है। एबीवीपी की मजबूत उपस्थिति यह दर्शाती है कि संगठन ने केवल पारंपरिक या राष्ट्रीय मुद्दों पर ध्यान केंद्रित न करके कैंपस की व्यावहारिक समस्याओं (जैसे हॉस्टल, वाई-फाई, स्पोर्ट्स इंफ्रास्ट्रक्चर और फीस) को अपने एजेंडे में शामिल किया। युवाओं ने अमूर्त नारों के बजाय धरातल पर काम करने वाले संगठन पर भरोसा जताया।

दो, एनएसयूआई (NSUI) के संगठनात्मक संकट का संकेत: एनएसयूआई का पिछड़ना या कमजोर प्रदर्शन यह दिखाता है कि मुख्य विपक्षी छात्र संगठन कैडर स्तर पर युवाओं से जुड़ने और उन्हें पोलिंग बूथ तक लाने में पूरी तरह सफल नहीं हो पा रहा है।

- कैडर आधारित नेटवर्क की कमी: एबीवीपी का संगठनात्मक ढांचा वर्षभर कैंपस गतिविधियों में सक्रिय रहता है, जबकि एनएसयूआई का चुनावी तंत्र अक्सर चुनाव घोषित होने के बाद अधिक सक्रिय दिखता है।

- विकल्प प्रस्तुत करने में विफलता: विपक्ष के रूप में केवल सत्ताधारी पार्टी या संगठन की आलोचना करना ही पर्याप्त नहीं होता; युवाओं के सामने एक ठोस और आकर्षक एजेंडा पेश करना आवश्यक होता है।

तीन, वामपंथी (Left) राजनीति की घटती पकड़: दिल्ली विश्वविद्यालय के परिसरों में वामपंथी छात्र संगठनों (AISA, SFI आदि) का आधार ऐतिहासिक रूप से सीमित रहा है, लेकिन इस चुनाव में उनकी नगण्य उपस्थिति यह साबित करती है कि मुख्यधारा के परिसरों में अति-सैद्धांतिक (Hyper-ideological) राजनीति अब युवा छात्रों को आकर्षित नहीं कर पा रही है।

चार, राष्ट्रीय मुख्यधारा की राजनीति का प्रतिबिंब: डूसू के चुनाव हमेशा से देश की राष्ट्रीय राजनीति का रुझान तय करने वाले सूचकांक (Barometer) माने जाते हैं। एबीवीपी को मिला समर्थन यह संकेत देता है कि शहरी, शिक्षित और पहली बार वोट करने वाले युवाओं का बड़ा वर्ग केंद्र में मौजूदा राजनीतिक विचारधारा और उसके छात्र पंख के प्रति सहज रुख रखता है।

पांच, निर्दलीय/स्वतंत्र उम्मीदवारों का उभरता प्रभाव: इस चुनाव में मुख्य पदों पर निर्दलीय उम्मीदवारों द्वारा दी गई कड़ी टक्कर और जीत (जैसे उपाध्यक्ष पद पर) यह स्पष्ट करती है कि 'जेन जी' किसी एक पार्टी या कैडर के प्रति आंख मूंदकर वफादार नहीं है। यदि मुख्य संगठन सही प्रत्याशी या एजेंडा तय नहीं करते, तो युवा वोटर्स निर्दलीय या नए विकल्पों को चुनने में संकोच नहीं करते।

वस्तुत: डूसू चुनाव के ये नतीजे यह स्पष्ट करते हैं कि आज की युवा पीढ़ी (Gen Z) केवल भावनात्मक या पारंपरिक राजनीतिक नारों पर वोट नहीं देती। जो संगठन मजबूत कैडर, कैंपस की ज़मीनी समस्याओं के समाधान और युवाओं के साथ वर्षभर सीधा संवाद बनाए रखेगा, वही छात्र राजनीति में अपनी प्रासंगिकता बनाए रख पाएगा।

- कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

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