By रेनू तिवारी | Apr 25, 2026
कुछ फिल्में आप जिज्ञासा के साथ देखने जाते हैं, कुछ उत्साह के साथ, और फिर कुछ ऐसी दुर्लभ फिल्में होती हैं जो आपको यह सोचने पर मजबूर कर देती हैं: आखिर इसे बनाया ही क्यों गया? 'गिन्नी वेड्स सनी 2' (Ginny Weds Sunny 2) इसी श्रेणी में मजबूती से खड़ी नजर आती है। यह एक ऐसी फिल्म है जहां कहानी बिखरी हुई है, संगीत याद नहीं रहता, और परफॉरमेंस पर आपका ध्यान नहीं टिकता। फिल्म खत्म होने के बाद आपको महसूस होता है कि अपनी सुबह के ढाई घंटे इसके लिए कुर्बान करना बिल्कुल जरूरी नहीं था।
फिल्म की शुरुआत ऋषिकेश के एक छोटे शहर के लड़के सनी से होती है, जो कुश्ती में डूबा हुआ है और नेशनल टीम में जगह बनाने का सपना देखता है। लेकिन दुर्भाग्य से, कुछ ऐसी घटनाएं घटती हैं कि उस पर 'परेशान करने वाले' (pervert) का लेबल लग जाता है। दो साल बाद, हम देखते हैं कि उसके जीवन का नया मिशन है—शादी करना। क्योंकि जाहिर है, हमारे सिनेमा में शादी से बड़ा दुखों का कोई इलाज नहीं है! दिक्कत यह है कि कोई उससे शादी नहीं करना चाहता, और उसकी यही हताशा फिल्म का रनिंग जोक बन जाती है।
दूसरी तरफ गिन्नी है—एक आधुनिक, शिक्षित लड़की जो अपनी शर्तों पर जीती है। उसकी मां इंग्लिश टीचर है, लेकिन फिर भी शादी को लेकर वही जल्दबाजी वहां भी है। 2026 में भी हमारी फिल्में शादी को जीवन के अंतिम लक्ष्य और 'वैलिडेशन' के रूप में पेश कर रही हैं। सवाल यह है कि क्यों?
लॉजिक को मिली छुट्टी
निर्देशक प्रशांत झा हमें अरेंज मैरिज के उस पक्ष में ले जाते हैं जहां परिवार रिश्ता पक्का करने के लिए झूठ बोलते हैं। आज के डिजिटल युग में, जहां आपकी पूरी जिंदगी ऑनलाइन है, ये झूठ और भी बेतुके लगते हैं। एक दिल्ली की पढ़ी-लिखी लड़की का 10वीं फेल लड़के से शादी के लिए मान जाना और एक पिछड़े समाज वाले छोटे शहर में बसने के लिए तैयार होना, गले से नीचे नहीं उतरता।
कुछ अच्छे विचार, लेकिन कमजोर पकड़
फिल्म में कुछ प्रासंगिक विचारों को छूने की कोशिश की गई है, जो इसकी एकमात्र खूबी कही जा सकती है:
फेमिनिज्म की झलक: फिल्म महिलाओं की समानता की उम्मीदों को स्वीकार करती है।
कंडीशनिंग: यह दिखाया गया है कि कैसे महिलाओं के साथ बातचीत की कमी पुरुषों के रिश्तों की समझ को प्रभावित करती है।
मेंटालिटी पर चोट: "पति होने का ईगो" और महिलाओं को जज करने वाली पुरुषों की मानसिकता पर भी फिल्म कटाक्ष करती है।
लेकिन समस्या यह है कि फिल्म इन गंभीर मुद्दों को सिर्फ 'टिक' करती चलती है, गहराई में नहीं जाती।
परफॉरमेंस: कलाकारों की मेहनत पर पानी
अभिनय के मामले में अविनाश तिवारी शानदार हैं। उन्हें अपनी गंभीर भूमिकाओं से हटकर एक मृदुभाषी और प्यार में डूबे पति के रूप में देखना सुखद है। मेधा शंकर के पास अपने पल हैं, खासकर इमोशनल दृश्यों में, लेकिन 'बबली' रोल में वह थोड़ा ज्यादा कर जाती हैं। '12वीं फेल' के बाद उन्हें देखकर एहसास होता है कि एक अच्छा निर्देशक अभिनेता से क्या कुछ निकलवा सकता है। सुधीर पांडे और लिलेट दुबे जैसे दिग्गज कलाकारों के पास भी इस स्क्रिप्ट में करने को कुछ खास नहीं था।
फैसला: क्या देखें या नहीं?
'गिन्नी वेड्स सनी 2' बहुत कुछ कहना चाहती है, लेकिन उसे पता ही नहीं कि कहना कैसे है। यह बॉलीवुड के पुराने घिसे-पिटे फॉर्मूले पर चलती है: दो अजनबी मिलते हैं, शादी होती है और फिर उम्मीद की जाती है कि प्यार हो जाएगा। लेकिन दर्शक को यह कभी महसूस नहीं होता कि उन्हें प्यार हुआ कब और क्यों?
नतीजा: यह फिल्म मजेदार होने की कोशिश करती है, लेकिन है नहीं। यह प्रासंगिक होने का नाटक करती है, लेकिन बहुत सुरक्षित खेलती है। अगर आप एक अच्छी प्रेम कहानी की तलाश में हैं, तो शायद यह फिल्म आपके लिए नहीं है।
रेटिंग: 2/5 स्टार
वन लाइनर: बिना किसी लॉजिक और मैजिक वाली यह शादी सिर्फ दर्शकों के लिए एक 'ट्रेजेडी' है।