Gold का भाव अब युद्ध से नहीं बल्कि अमेरिकी Fed के फैसलों और ब्याज दरों से होगा तय

By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Aug 10, 2026

सोने की कीमतों और भू-राजनीतिक संघर्षों के बीच पारंपरिक संबंध बदल रहा है तथा मुद्रास्फीति, ब्याज दरें और मौद्रिक नीति सर्राफा कीमतों को प्रभावित करने वाले अधिक महत्वपूर्ण कारक बनकर उभरे हैं। एक रिपोर्ट में यह बात कही गई है। मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड (एमओएफएसएल)) की एच1 2026 प्रेशियस मेटल्स रिपोर्ट के अनुसार, चालू वर्ष की पहली छमाही में यह स्पष्ट हुआ कि केवल भू-राजनीतिक जोखिम सोने में तेजी बनाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।

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दमानी ने कहा कि ऊंचे बॉन्ड प्रतिफल (यील्ड) सोने के लिए सबसे बड़ी बाधा बनकर उभरी। इससे सुरक्षित निवेश के रूप में सोने की पारंपरिक मांग पर भी असर पड़ा, जबकि भू-राजनीतिक तनाव ऊंचे स्तर पर बने रहे। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष की शुरुआत में नीतिगत अनिश्चितता, एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ईटीएफ) में निवेश, केंद्रीय बैंकों की खरीदारी और अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में कटौती की उम्मीदों से सोने की कीमतों को मजबूती मिली।

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रिपोर्ट में कहा गया कि बाद में शुल्क बढ़ने से उत्पादन लागत और मुद्रास्फीति की अपेक्षाएं बढ़ीं। इससे लंबे समय तक ऊंची ब्याज दरें बने रहने की आशंका मजबूत हुई और अमेरिकी ट्रेजरी प्रतिभूतियों की वास्तविक प्रतिफल तथा डॉलर में तेजी आई। रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका-ईरान संघर्ष भी इस बदलते रुख का उदाहरण है।

संघर्ष बढ़ने पर शुरुआती दौर में सोने की मांग बढ़ी, लेकिन कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से मुद्रास्फीति की चिंता बढ़ी और मौद्रिक नीति में ढील की उम्मीद कमजोर हुई। इससे सोने की तेजी सीमित रही और बाद में कीमतों में सुधार आया। रिपोर्ट में कहा गया, शुल्क अब केवल आर्थिक वृद्धि के लिए जोखिम नहीं रह गए हैं, बल्कि वे मुद्रास्फीति बढ़ाने वाली ताकत बन गए हैं।

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रिपोर्ट के अनुसार, आगे भी मुद्रास्फीति का रुख, फेडरल रिजर्व के संकेत, वैश्विक नकदी की उपलब्धता, केंद्रीय बैंकों की खरीदारी, ईटीएफ में निवेश और सट्टा निवेश सोने और चांदी की कीमतों के प्रमुख चालक बने रहेंगे।

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