By दीपक कुमार त्यागी | Oct 28, 2025
भारतीय फिल्म जगत की प्रसिद्ध शख्शियत 'गोवर्धन असरानी' का जन्म राजस्थान की विश्व प्रसिद्ध गुलाबी नगरी जयपुर के एक सिंधी हिंदू परिवार में 1 जनवरी 1941 को हुआ था। उनके पिता कालीन व्यापारी थे और वह सात भाई-बहन थे। 'असरानी' बचपन से ही नाटकों और मिमिक्री में गहरी दिलचस्पी रखते थे। उन्होंने जयपुर से ही अपनी प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की। स्कूल के दिनों से ही वह नियमित रूप से नाटक और अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेते थे, जिससे की उनके अंदर छिपी हुई अभिनय की प्रतिभा को निखारने का भरपूर अवसर मिला। पढ़ाई पूरी करने के बाद 'असरानी' ने अपने करियर की शुरुआत अखिल भारतीय रेडियो के जयपुर स्टेशन में रेडियो कलाकार के रूप में की थी। 'असरानी' ने 1970-80 के दशक की जानी-मानी अभिनेत्री 'मन्जू बंसल' से विवाह किया था।
यहां आपको बता दें कि 'असरानी' ने अभिनय के साथ गायकी में भी हाथ आजमाया था, उन्होंने कई फिल्मों के गाने गाए, 'असरानी' ने वर्ष 1977 में आई फिल्म अलाप में 'बिनती सुन ले तनिक' और 'हो रामा डर लागे अपनी उमरिया से' गाने को अपनी आवाज़ देने का काम किया था, वहीं वर्ष 1978 में फिल्म फूल खिले हैं गुलशन गुलशन में 'मुन्नू भाई मोटर चली पम-पम' गाने में उन्होंने किशोर कुमार का जमकर साथ दिया था। 'असरानी' ने एक निर्देशक रूप में वर्ष 1977 में अपनी पहली फिल्म ‘ओस की बूंद’ बनाई। इसके बाद उन्होंने कुछ गुजराती फिल्मों का निर्देशन भी किया। साथ ही उन्होंने लेखक के रूप में कई फिल्मों की कहानी पर भी काम किया। 'असरानी' ने वर्ष 1990 के दशक में जब छोटे पर्दे के रूप में घर-घर टेलीविजन लोकप्रिय हो रहा था, तब हम पांच, फासले, श्रीमान-श्रीमती, देख भाई देख जैसे लोकप्रिय टेलीविजन धारावाहिक में काम करके घर-घर में जगह बनाने का काम किया था। हालांकि दर्शकों ने 'असरानी' को सबसे ज्यादा एक हास्य अभिनेता के रूप में पसंद किया था। वैसे भी अगर 'असरानी' के हास्य अभिनय की शैली व डॉयलॉग को देखें तो उसमें डबल मीनिंग की बातें, अश्लीलता, ओछापन व फूहड़ता आदि का कोई स्थान नहीं था, उनका हास्य अभिनय बेहद ही उच्च कोटि का सभ्यता के दायरे में रहते हुए व भरपूर मनोरंजन से परिपूर्ण होता था जिसे हम अपने पूरे परिवार के साथ बैठकर के देख सकते हैं। 'असरानी' की फिल्म स्टार 'राजेश खन्ना' से खूब पटती थी, जिसके चलते ही दोनों ने लगभग 25 फिल्मों में एक साथ काम किया, जिनमें अमर प्रेम, आंधी, अवतार, बावर्ची आदि शामिल हैं।
'गोवर्धन असरानी' का लगभग पांच दशक से अधिक का शानदार फिल्मी करियर उनके फिल्मी दुनिया में अपार योगदान की स्वयं गवाही देता है। जिस करियर ने ही 'असरानी' को हिंदी सिनेमा के प्रसिद्ध हास्य और चरित्र अभिनेता बना दिया। वैसे देखा जाए तो जिस दौर में किसी भी हास्य अभिनेता को अपने प्रतिभा को दिखाने के सीमित अवसर मिलते थे, उस दौर में भी 'गोवर्धन असरानी' ने अपने जबरदस्त अभिनय के दम पर देश व दुनिया में एक विशिष्ट पहचान बनाने का कार्य किया था। हालांकि उनकी असली पहचान वर्ष 1975 की फिल्म ‘शोले' से बनी थी, जहां जेलर के किरदार में उनकी डायलॉग डिलीवरी और अंदाज ने उन्हें अमर कर दिया। 'असरानी' के चुपके चुपके, नमक हराम, निकाह और वेलकम जैसी फिल्मों में किरदार बेहद ही यादगार रहे। उन्होंने 350 से ज्यादा हिंदी और गुजराती फिल्मों में काम किया था।
हालांकि अपनी अदाकारी से लोगों के चेहरों पर मुस्कराहट लाने वाले दिग्गज हास्य अभिनेता 'गोवर्धन असरानी' अब हमारे बीच नहीं रहे हैं, वह अपने चहेतों को रूला कर के दुनिया से रुखसत हो गये हैं। 20 अक्टूबर 2025 दीपावली के दिन मुंबई के एक अस्पताल में इलाज़ के दौरान लीजेंड अभिनेता 'असरानी' का निधन हो गया था। 'असरानी' ने दुनिया को अलविदा जरूर कह दिया है, लेकिन उन्होंने जिस तरह से एक हास्य अभिनेता के रूप में काम करते हुए एक लंबी रेखा खींचने का कार्य किया है, वह बेहद ही काबिले-तारीफ है, उनके द्वारा खींचीं गयी हास्य अभिनय की इस लंबी रेखा को पार करना किसी भी भारतीय हास्य अभिनेता के लिए आसान लक्ष्य नहीं होगा। 'असरानी' के निधन से प्रशंसकों व भारतीय सिनेमा जगत को एक अपूरणीय क्षति तो हुई है, लेकिन जिस तरह से 'असरानी' ने अपने हास्य अभिनय की एक अमिट छाप छोड़ी है, उसके दम पर वह हमेशा हमारे दिलो-दिमाग में जिंदा रहेंगे। मैंने भी कई बार स्वयं देखा है कि आज दशकों के बाद भी लोग 'असरानी' के मुख से 'हम अंग्रेजों के जमाने के जेलर है' डायलॉग को अवश्य सुनना चाहते थे। मैं ऐसे लीजेंड अभिनेता 'गोवर्धन असरानी' को कोटि-कोटि नमन करते हुए अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं।
- दीपक कुमार त्यागी
अधिवक्ता, स्तंभकार व राजनीतिक विश्लेषक