Gujarat High Court ने बेटी की हत्या की आरोपी मां को जमानत दी, कहा- भूख समाज की विफलता

By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Aug 06, 2026

अहमदाबाद, छह अगस्त गुजरात उच्च न्यायालय ने खाना मांग रही दो-वर्षीय बेटी की कथित तौर पर पीट-पीटकर हत्या करने की आरोपी महिला की जमानत अर्जी मंजूर करते हुए टिप्पणी की कि यह घटना इस बाती की ‘‘दिल दहला देने वाली याद’’ दिलाती है कि भूख केवल आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा, न्याय और जमीर का मामला है। न्यायमूर्ति हसमुख डी. सुथार की पीठ ने पिछले हफ्ते दिये अपने फैसले में कहा कि जब भुखमरी किसी मां को इतना बड़ा कदम उठाने पर मजबूर कर देती है, तो यह विफलता किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे समाज की होती है। अदालत ने यह भी कहा कि इस दुखद घटना को करुणा और इस बात के पुख्ता संकल्प के तौर पर देखा जाना चाहिए कि कोई भी मां या बच्चा भुखमरी की पीड़ा सहने को मजबूर न हो।

अदालत ने कहा, ‘‘यह घटना केवल एक व्यक्ति की त्रासदी नहीं है, बल्कि समाज पर एक गंभीर आरोप है और यह सामाजिक न्याय एवं नैतिकता से जुड़े बुनियादी सवाल खड़े करती है।’’ फैसले में पीठ ने टिप्पणी की, ‘‘इस अदालत का मानना ​​है कि सामाजिक न्याय इस सिद्धांत पर आधारित है कि हर इंसान को भोजन, रहने की जगह, स्वास्थ्य सेवा और सम्मान जैसी बुनियादी जरूरतें मिलनी चाहिए। जब ​​भुखमरी के कारण कोई मां इतना कठोर कदम उठाने पर मजबूर हो जाती है, तो यह किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे समाज की विफलता होती है।’’ अदालत ने फैसले में कहा कि यह घटना सामाजिक कल्याण व्यवस्था की विफलता को दर्शाती है और कमजोर परिवारों, विशेषकर महिलाओं और बच्चों, की सुरक्षा के लिए राज्य और समाज की नैतिक जिम्मेदारी को उजागर करती है। अदालत ने कहा कि भारतीय संविधान के तहत, बच्चों को छह साल की उम्र पूरी होने तक शुरुआती बचपन की देखभाल और शिक्षा के लिए मौलिक अधिकार दिए गए हैं, और सार्वजनिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए पोषण के स्तर और जीवन स्तर को ऊपर उठाना राज्य सरकार का कर्तव्य है।

अपने फैसले में अदालत ने दो उपन्यासों -पन्नालाल पटेल के गुजराती उपन्यास ‘मानवीनी भवाई’ और विक्टर ह्यूगो के ‘लेस मिज़रेबल्स’ का उल्लेख किया। पटेल के इस उपन्यास में भीषण भूख और सामाजिक व्यवस्था के ढहने से पैदा होने वाले मनोवैज्ञानिक डर को दिखाया गया है, जबकि विक्टर ह्यूगो का संबंधित उपन्यास 19वीं सदी के फ्रांस में ग़रीब, दबे-कुचले और समाज से हाशिये पर धकेल दिए गए लोगों की जिंदगी और संघर्षों पर आधारित है। अदालत ने फैसले में महात्मा गांधी और चार्ल्स डिकेंस के अलावा हिंदू, इस्लामी एवं ईसाई धर्मग्रंथों का भी उल्लेख किया, जिनमें भूखों को खाना खिलाने को एक पवित्र कर्तव्य बताया गया है।

पीठ ने कहा कि यह कथित घटना दिल दहला देने वाली है और याद दिलाती है कि भूख केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा, न्याय और अंतरात्मा का मामला है। इसमें महात्मा गांधी के उस उद्धरण को इंगित किया कि ‘‘दुनिया में ऐसे लोग हैं जो इतने भूखे हैं कि उन्हें भगवान रोटी के रूप में ही दिखाई दे सकते हैं।’’ फैसले में कहा गया है, ‘‘सभी धर्म यह बताते हैं कि किसी व्यक्ति को भूख से मरने देना न केवल एक सामाजिक विफलता है, बल्कि एक नैतिक और आध्यात्मिक विफलता भी है।

प्रमुख खबरें

Shubman Gill को श्रीलंका टेस्ट से पहले डबल झटका, WTC फाइनल की उम्मीदों पर असर?

Calcutta High Court ने CBI से RG Kar case की जांच रिपोर्ट 28 अगस्त तक पेश करने को कहा

BSE Sensex 374 अंक चढ़ा, Reliance Industries और बैंक शेयरों में लिवाली

Shehbaz Sharif तीन दिवसीय यात्रा पर Saudi Arabia जाएंगे, रक्षा संबंधों पर होगी वार्ता