भारती कुश्ती के पितामह थे गुरू हनुमान

By रमेश सर्राफ धमोरा | May 24, 2021

भारत में कुश्ती गांव-गांव में प्रचलित है। हर गांव में सुबह और शाम नवयुवक अखाड़े में व्यायाम करते मिल जाते हैं। परन्तु अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की इसमें कोई पहचान नहीं थी। इस पहचान को दिलाने का श्रेय गुरु हनुमान को जाता है। गुरू हनुमान का असली नाम विजय पाल था। भारतीय मल्लयुद्ध के आदर्श देवता हनुमान जी से प्ररित होकर विजय पाल ने अपना नाम बदल कर हनुमान रखा और आजीवन ब्रह्मचारी रहने का प्रण कर लिया। उनके स्वयं के कथन के अनुसार उनकी शादी तो कुश्ती से ही हुई थी। इस बात में कोई अतिशयोक्ति भी नहीं थी। क्योंकि जितने भी पहलवान उनके सानिध्य में आगे निकले उनमें शायद ही किसी को उतना सम्मान मिला हो जितना गुरु हनुमान को मिला।

गुरु हनुमान देश के प्रख्यात कुश्ती प्रशिक्षक तो थे ही स्वयं बहुत अच्छे पहलवान भी थे। उन्होंने सम्पूर्ण विश्व् में भारतीय कुश्ती को महत्वकपूर्ण स्थान दिलाया। अपने शिष्यों को ही वे पुत्रवत स्नेह करते थे। वे पूर्ण शाकाहारी थे तथा इस मान्यता के विरोधी थे कि मांसाहार से ही शक्ति प्राप्त होती है। वे प्रातः तीन बजे उठ कर शिष्यों के प्रशिक्षण में लग जाते थे। उनके अखाड़े के छात्र अपना भोजन स्वयं बनाते थे। अनुशासनप्रिय गुरु जी दिनचर्या में जरा भी ढिलाई पसंद नहीं करते थे। गुरू हनुमान स्वाधीनता संग्राम में भी सक्रिय थे। अनेक फरार क्रांतिकारी उनके पास आश्रय पाते थे। 1940 में एक क्रांतिकारी की तलाश में पुलिस ने अखाड़े में छापा मारा। पर गुरु जी ने उसे पुलिस को नहीं सौंपा। इससे चिढकर पुलिस उन्हें ही पकडकर ले गयी। उन्हेंयातनाएं दी गयीं। कई घंटे तक कुएं में उल्टा लटका कर रखा गया। लेकिन गुरु जी विचलित नहीं हुए।

1947 के बाद उनका अखाड़ा उत्तर भारत के पहलवानों का तीर्थ बन गया। गुरु हनुमान ने उसे कभी व्यावसायिक नहीं होने दिया। धीरे-धीरे उनके शिष्य खेल प्रतियोगिताएं जीतने लगे। अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के नियम अलग थे। वहां कुश्ती भी रबड़ के गद्दों पर होती थी। गुरु हनुमान ने उन नियमों को समझकर अपने पहलवानों को वैसा ही प्रशिक्षण दिया। इससे उनके शिष्य उन प्रतियोगिताओं में भी स्थान पाने लगे। 

गुरु जी ने कलाई पकड़ जैसे अनेक नये दांव भी विकसित किये थे। विपक्षी काफी प्रयास के बाद भी जब कलाई नहीं छुड़ा पाता था तो वह मानसिक रूप से कमजोर पड़ जाता था। इसी समय वे उसे चित कर देते थे। उनका यह दांव बहुत लोकप्रिय हुआ। उनके अखाड़े को विशेष प्रसिद्धि तब मिली जब 1972 के राष्ट्रमंडल खेलों में उनके शिष्य वेदप्रकाश, प्रेमनाथ और सुदेश कुमार ने स्वर्ण पदक जीता। इसी प्रकार 1982 के एशियायी खेलों में उनके शिष्य सतपाल एवं करतार सिंह ने स्वर्ण पदक जीता। 1986 में भी उनके शिष्य दो स्वर्ण पदक लाये। सात शिष्यों ने भारत की सर्वश्रेष्ठ कुश्ती प्रतियोगिताएं जीतीं। उनके आठ शिष्यों को भारत में खेल के लिए दिया जाने वाला सर्वश्रेष्ठ अर्जुन पुरस्कार मिला। 1988 में भारत सरकार ने उन्हें खेल प्रशिक्षकों को दिये जाने वाले द्रोणाचार्य पुरस्कार से तथा 1983 में पदम श्री से सम्मानित किया।

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भारतीय कुश्ती के पितामह गुरू हनुमान को 1960 में राष्ट्र गुरू, 1982 में राजस्थान श्री, 1983 में पद्मश्री, 1987 में द्रोणाचार्य, 1989 में भीष्म पितामह और 199। में छत्रपति साहू अवार्ड प्रदान किया गया था। इसके अलावा गुरू जी को 1980 में फ्रांस में डिप्लोमा आफ आनर, 1981 में जापान ने लार्ड बुद्धा अवार्ड, पाकिस्तान ने 1989 में कुश्ती खुदा पुरस्कार, जपान ने 1991 में मास्टर डिग्री ब्लैक बेल्ट, अमेरिका ने 1991 में कुश्ती किंग अवार्ड और इंग्लैंड ने 1991 में शहीद उधम सिंह अवार्ड प्रदान किया था। 

गुरू हनुमान और उनके परम शिष्य तथा 1982 के एशियाई खेलों के स्वर्ण विजेता महाबली सतपाल को 1983 में एक साथ पद्मश्री से सम्मानित किया गया था। जबकि करतार सिंह को 1986 में पद्मश्री सम्मान मिला था। इस अखाडे से सुखचैन को 2003, महासिंह राव को 2005, जगमन्दर सिंह को 2007, सतपाल को 2009 में द्रोणाचार्य पुरस्कार मिला था जबकि राज सिंह को 2013 में लाइफटाइम द्रोणाचार्य पुरस्कार मिला था।

गुरु हनुमान एक गुरु ही नहीं बल्कि अपने शिष्यों के लिए पिता तुल्य थे। कुश्ती का जितना सूक्ष्म ज्ञान उन्हें था शायद ही किसी को हो। गुरु हनुमान ने जब ये देखा की उनके पहलवानों को बुढ़ापे में आर्थिक तंगी होती है तो उन्होंने सरकार से पहलवानों के लिए रोजगार के लिए सिफारिश की। परिणामस्वरुप आज बहुत से राष्ट्रीय प्रतियोगिता जीतने वाले पहलवानों को भारतीय रेलवे में हाथों हाथ लिया जाता है। इस तरह उन्होंने हमेशा अपने शिष्यों की सहायता अपने बच्चो के समान की। उनका रहन सहन बिल्कुल गाँव वालों की तरह ही था। उन्होंने अपनी पूरी जिन्दगी एक धोती कुरते में ही गुजर दी थी। भारतीय स्टाइल की कुश्ती के वे माहिर थे। उन्होंने भारतीय स्टाइल और अंतर्राष्ट्रीय स्टाइल का मेल कराकर अनेक एशियाई चैम्पियन दिए। कुश्ती के पितामाह गुरु हनुमान के नाम से मशहूर देश के इस सबसे बड़े अखाड़े ने अब तक देश को 124 अंतरराष्ट्रीय पहलवान दिए हैं। इसके अलावा 14 अर्जुन पुरस्कार और 16 द्रोणाचार्य पुरस्कार विजेता पहलवान भी यहां से निकले हैं। इसके बावजूद यह अखाड़ा आज दुर्दशा का शिकार बन चुका है।

गुरू हनुमान को शायद अपनी मृत्यु का पूर्वाभास हो गया था। इसी कारण उन्होने अपने जीते जी अपनी कर्मस्थली दिल्ली के गुरु हनुमान अखाड़ा व अपनी जन्म भूमि चिड़ावा में अपनी आदमकद प्रतिमा लगवा दी थी। चिड़ावा में तो उनकी मृत्यु से एक सप्ताह पूर्व ही 16 मई 1999 को पूर्व केन्द्रीय मंत्री शीशराम ओला व डा.गिरिजा व्यास के हाथों उनकी मूर्ति का अनावरण किया गया था।

24 मई 1999 को गुरु हनुमान गंगा स्नान के लिए हरिद्वार जा रहे थे। मार्ग में मेरठ के निकट उनकी कार का टायर फटने से वह एक पेड़ से टकरा गयी। इस दुर्घटना में ही उनका देहांत हो गया। उनके शिष्य तथा नये पहलवान आज भी उस अखाड़े की मिट्टी को पवित्र मानकर माथे से लगाते हैं। गुरू हनुमान की स्मृति में हर वर्ष सरकारी स्तर पर अन्तर्राष्ट्रीय कुश्ती दंगल स्पर्धा आयोजित की जानी चाहिये। ताकि आने वाली पीढ़ी के खिलाड़ी भी गुरू हनुमान से प्ररणा लेते रहें व उनके बताये मार्ग पर चलकर दुनिया में देश का नाम गौरवान्वित कर सकें।

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गरू हनुमान की इच्छा थी कि दिल्ली के गुरु हनुमान अखाड़ा की तरह ही चिड़ावा में भी कुश्ती के खिलाड़ी तैयार हो इस लिये उन्होने चिड़ावा में भी कुश्ती अखाड़ा स्थापित किया था। उन्होने चिड़ावा में बड़े स्तर पर कुश्ती दंगल का आयोजन भी करवाया था मगर गुरू हनुमान की आकस्मिक मौत हो जाने के बाद उनके शिष्यों का पूरा ध्यान दिल्ली के अखाड़े तक ही सिमट कर रह गया। फलस्वरूप चिड़ावा का गुरू हनुमान अखाड़ा बनने से पूर्व ही बदतर स्थिति में पहुंच गया है। यदि समय रहते इस अखाड़े पर ध्यान नहीं दिया गया गुरू हनुमान का अपनी जन्म भूमि चिड़ावा में एक बड़ा कुश्ती अखाड़ा स्थापित करने का सपना टूट जायेगा।

खेल मंत्रालय ने खेल अकादमियों और प्रबंधन के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान देने के लिए भारतीय कुश्ती के पितामह गुरू हनुमान के कुश्ती अखाडे को राष्ट्रीय खेल प्रोत्साहन पुरस्कार से सम्मानित कर भारतीय कुश्ती के पितामह गुरू हनुमान को सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित की थी। 

- रमेश सर्राफ धमोरा

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