By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Sep 11, 2026
(कोमल पंचमटिया) मुंबई, 11 सितंबर नीब करौरी बाबा के जीवन पर आधारित फिल्म ‘हनुमान अंश’ सात अगस्त को जब सिनेमाघरों में आई तो न उसके साथ किसी बड़े सितारे का नाम जुड़ा था और न ही उसे लेकर कोई चर्चा थी। यहां तक की टिकट खिड़की पर कोई खास हलचल नहीं हुई, लेकिन कुछ ही हफ्तों में तस्वीर ऐसी बदली कि 10 लाख रुपये से शुरुआत करने वाली यह फिल्म 200 करोड़ रुपये की कमाई तक पहुंच गई। टिकट खिड़की पर फिल्म के धमाकेदार प्रदर्शन ने 51 साल पहले आई फिल्म ‘जय संतोषी मां’ को मिली अप्रत्याशित सफलता की याद दिला दी।
उनके भक्तों में हॉलीवुड अभिनेत्री जूलिया रॉबर्ट्स, क्रिकेटर विराट कोहली और उनकी पत्नी एवं अभिनेत्री अनुष्का शर्मा जैसे चर्चित नाम शामिल हैं। ऐसा भी बताया जाता है कि स्टीव जॉब्स और मार्क जुकरबर्ग जैसे कारोबारी दिग्गज भी उत्तराखंड के कैंची धाम में उनके आश्रम आए थे। नीब करौरी बाबा का असली नाम लक्ष्मण नारायण शर्मा था।
उनका जन्म करीब 1900 में उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिले के एक गांव में हुआ था और 1973 में उनका निधन हुआ था। कम उम्र में उनका विवाह हो गया था लेकिन बाद में उन्होंने घर-परिवार छोड़कर संन्यासी जीवन अपना लिया। उनके भक्त उन्हें भगवान हनुमान का अवतार मानते हैं और उनका मानना है कि बाबा नीब करौरी के पास चमत्कार करने की शक्ति थी।
‘हनुमान अंश’ की सफलता ने फिल्म जगत को भी हैरान कर दिया है और अब यह चर्चा का विषय है कि आखिर एक ऐसी फिल्म बॉक्स ऑफिस पर अचानक कैसे छा गई जिसके बारे में पहले कोई चर्चा नहीं थी। फिल्म कारोबार के आंकड़ों पर नजर रखने वाली वेबसाइट ‘सैकनिल्क’ के अनुसार, पहले सप्ताह की मामूली कमाई के बाद दूसरे सप्ताह में फिल्म का कारोबार और गिर गया था, लेकिन तीसरे सप्ताह से तस्वीर पूरी तरह बदल गई। पीवीआर आईनॉक्स लिमिटेड के मुख्य व्यवसाय नियोजन एवं रणनीति अधिकारी कमल ज्ञानचंदानी ने पीटीआई-से कहा, ‘‘किसी ने ऐसी उम्मीद नहीं की थी।
‘हनुमान अंश’ अपने आप में एक ‘केस स्टडी’ है। तीसरे सप्ताह में इसे सिनेमाघरों से हटाए जाने की नौबत आ गई थी लेकिन उसी सप्ताह फिल्म ने रफ्तार पकड़ ली और चौथे एवं पांचवें सप्ताह में ‘ब्लॉकबस्टर’ बन गई। ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है।’’ फिल्म उद्योग से जुड़े कई व्यक्तियों और फिल्म इतिहासकारों का मानना है कि आस्था पर आधारित सिनेमा के प्रति दर्शकों का आकर्षण नया नहीं है।
इससे पहले 1975 में रिलीज हुई ‘जय संतोषी मां’ और 1977 में आई ‘शिरडी के साईं बाबा’ से लेकर 2024 में भगवान विष्णु के वराह और नरसिंह अवतारों पर बनी ‘महावतार नरसिंह’ तक ऐसी फिल्मों ने दर्शकों से लगातार जुड़ाव बनाया है। ‘महावतार नरसिंह’ ने दुनियाभर में 300 करोड़ रुपये से अधिक की कमाई की थी। फिल्म इतिहासकार एवं अभिलेख विशेषज्ञ एस. एम. एम. औसाजा के अनुसार, धार्मिक और पौराणिक फिल्मों की लोकप्रियता नयी बात नहीं है।
उन्होंने कहा कि दादासाहेब फाल्के की फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ (1913) से ही ऐसी फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर अहम भूमिका निभाई है। उन्होंने ‘राम राज्य’ (1943), वी. शांताराम की ‘शकुंतला’ (1943) और ‘जय संतोषी मां’ का उदाहरण दिया। ‘जय संतोषी मां’ उस समय सिनेमाघरों में आई थी जब ‘शोले’ भी सिनेमाघरों में लगी थी।
इसके बावजूद ‘जय संतोषी मां’ ने जबरदस्त सफलता हासिल की। अब सभी की निगाहें नितेश तिवारी की महत्वाकांक्षी फिल्म ‘रामायण’ पर हैं, जिसमें रणबीर कपूर और साई पल्लवी मुख्य भूमिकाओं में हैं। यह फिल्म दिवाली पर रिलीज होगी।
उन्होंने कहा, ‘‘भारतीय सिनेमा में पौराणिक फिल्मों की एक विधा हमेशा से रही है और ये फिल्में लगातार सफल भी रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब ऐसी फिल्मों का पैमाना कहीं बड़ा हो गया है और बड़े कलाकार भी इनसे जुड़ रहे हैं।’’ औसाजा के मुताबिक, बाबा नीब करौरी जैसी आध्यात्मिक हस्तियों के प्रति आस्था किसी एक धर्म या समुदाय तक सीमित नहीं रहती और यही वजह है कि उनकी कहानियां व्यापक दर्शक वर्ग से जुड़ पाती हैं। ज्ञानचंदानी का मानना है कि कोविड-19 महामारी के बाद सिनेमाघरों में आस्था पर आधारित फिल्मों की लोकप्रियता अधिक साफ तौर पर दिखाई देने लगी है।
उन्होंने कहा, ‘‘लोग बड़ी संख्या में सिनेमाघरों में आ रहे हैं और आस्था पर आधारित फिल्मों को पसंद कर रहे है। इससे सिनेमाघरों को एक नया दर्शक वर्ग और एक ऐसी फिल्म विधा मिली है, जिस पर वे भरोसा कर सकते हैं। यह फिल्म उद्योग के लिए अच्छी खबर है।’’ सिनेपोलिस इंडिया के प्रबंध निदेशक देवांग संपत ने कहा कि ‘हनुमान अंश’ की सफलता से साफ है कि दर्शकों में धार्मिक फिल्मों के लिए विशेष जगह है, लेकिन सिर्फ धार्मिक विषय होना ही सफलता की गारंटी नहीं है।
संपत ने ‘कांतारा’, ‘महावतार नरसिंह’ और ‘लालो’ जैसी फिल्मों का जिक्र करते हुए कहा कि इनकी सफलता के पीछे कोई ऐसा फार्मूला नहीं है जिसे आसानी से दोहराया जा सके और इनमें साझा बात अपनी सांस्कृतिक जड़ों से गहरा जुड़ाव है। मिराज एंटरटेनमेंट लिमिटेड के कार्यकारी निदेशक दीपक अदवानी ने कहा कि वह अभी इसे किसी नये ‘ट्रेंड’ का नाम देने में जल्दबाजी नहीं करेंगे, लेकिन दर्शकों की पसंद में एक स्पष्ट बदलाव जरूर दिखाई दे रहा है। अदवानी ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘इन फिल्मों को जोड़ने वाली कड़ी केवल पौराणिक कथाएं नहीं हैं।
असली बात है उनकी प्रामाणिकता, सांस्कृतिक जुड़ाव और ऐसी कहानी जो दर्शकों को भावनात्मक रूप से थाम सके।’’ उन्होंने कहा कि ‘हनुमान अंश’ की खासियत यह भी है कि इसने युवाओं के साथ-साथ बुजुर्ग दर्शकों को भी सिनेमाघरों तक खींचा है। अदवानी ने कहा, ‘‘सबसे दिलचस्प बात यही है कि इसकी लोकप्रियता किसी एक उम्र के दर्शकों तक सीमित नहीं है।’’ सिनेमाघर संचालकों के मुताबिक, ‘हनुमान अंश’ की उपलब्धि इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि ‘टॉक्सिक’ और ‘आवारापन 2’ जैसी बड़े बजट की फिल्मों की मौजूदगी के बावजूद यह सफल हुई। कुछ सिनेमाघरों में ‘हनुमान अंश’ का प्रदर्शन किसी सामान्य फिल्म की ‘स्क्रीनिंग’ जैसा नहीं है।
मिराज सिनेमाज समेत कुछ सिनेमाघरों में धार्मिक वातावरण बनाने के लिए फिल्म शुरू होने से पहले या उसकी पृष्ठभूमि में हनुमान चालीसा बजाया जा रहा है। संपत ने बताया कि कुछ दर्शक सिनेमाघर में प्रवेश करने से पहले अपनी इच्छा से जूते-चप्पल उतार देते हैं, जबकि कुछ लोग फिल्म खत्म होने के बाद पर्दे पर अंतिम ‘क्रेडिट’ (फिल्म निर्माण से जुड़े लोगों की जानकारी देना) चलने तक खामोशी से अपनी सीट पर बैठे रहते हैं।