By संतोष उत्सुक | Dec 27, 2023
ज़माने से सुनते, पढ़ते, लिखते और कहते आए हैं कि पैसा खुशी खरीद नहीं सकता। इन क्रियाओं में ‘देखना’ शामिल नहीं है। यह खरा सच भी सभी देखते हैं कि पैसा बहुत ज़रूरी है। स्वाभाविक है जिसके पास पैसा कम होगा या नहीं होगा उसे यही कहना पडेगा कि पैसे से खुशी नहीं मिलती या पैसे से खुशी खरीदी नहीं जा सकती। लेकिन जिसके पास दौलत होगी वह भूलकर भी नहीं कहेगा कि पैसे से खुशी नहीं खरीदी जा सकती। वह उस पैसे से और पैसा बनाने की जुगत में होगा। प्रसिद्ध व्यंग्य लेखक श्रीलाल शुक्ल ने कहा है कि अगर हम खुश रहें तो गरीबी हमें दुखी नहीं कर सकती और गरीबी को मिटाने की असली योजना यही है कि हम बराबर खुश रहें। इस बात में गरीबी में भी खुश रहने का ज़िक्र है।
इस अध्ययन ने साल भर खुश रहने की राशी का आकलन भी किया है। मिसाल के तौर पर सबसे महंगी ख़ुशी ईरान की है। वहां एक साल खुश रहने के लिए करीब दो करोड़ रूपए की ज़रूरत है। सबसे कम खर्चा सिएरा लियोन में होगा। वहां सिर्फ सात लाख से थोड़ी ज़्यादा रकम में खुश रह सकते हैं। यह सिर्फ एक बार मिली ज़िंदगी को आराम, संतुष्टि और वैभव से गुज़ारने की भौतिक कीमत है। यह ठीक वैसे ही है कि एक छोटे से गांव में एक दिन का खर्च इतना है और एक सुविधाजनक शहर में उतना। खुशी इतनी महत्त्वपूर्ण वस्तु, अनुभव या भावना यानी जो भी है उसकी कीमत तो चुकानी ही पड़ेगी। हमारे देश में खुश रहने की कीमत पता नहीं चल सकी।
प्रवाचक, खुश रहने का मुस्कुराता उपदेश देने के लाखों लेते हैं और करोड़पति होना उनका ध्येय होता है। हमारे यहां तो पैसा खुशी के इलावा काफी कुछ दिला सकता है। उस काफी कुछ के सामने बेचारी ख़ुशी फीकी पड़ जाती है। पैसा, राजनीति में घोडों का व्यापार करवा सकता है। धर्म को अधर्म में बदल सकता है। अधार्मिक व्यक्ति को धार्मिक बना सकता है। समाज में वर्चस्व कायम करवा सकता है। सिर्फ खुशी से पैसा कमाना आसान नहीं है। हमारे यहां तो ख़्वाब देखा जाता है कि बिना मेहनत पैसा मिल जाए। पैसा न मिले तो खाना, पहनना, रहना मुफ्त हो जाए। अब खुशी की परिभाषा बदल गई है। खरीदना, अच्छा शब्द न लगे तो पैसे से खुशी मिलती, उगाई, हथियाई, पटाई या पकाई प्रयोग कर सकते हैं।
- संतोष उत्सुक