By संतोष उत्सुक | Jul 07, 2025
हेलीकाप्टर वहीँ जा सकता है जहां हवाई जहाज नहीं जा सकता। स्वार्थ और प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़ ने इंसान के दिमाग पर कब्ज़ा कर लिया है इसलिए विकास के हेलीकाप्टर कहीं भी जाने को तैयार हैं जिससे विकास चाहने वाले बहुत खुश हैं। उनका धंधा चमक रहा है। राजनीति उनकी ख़ास दोस्त हैं, इसलिए सिर्फ पैसे की शक्ति, हस्ती और मस्ती है। बस एक बार मिली, दूसरों की ज़िंदगी ज़रा सस्ती है। तभी तो निडर होकर बेहद दुर्गम, पर्यावरण की दृष्टि से अति संवेदनशील घाटी में, हर ढाई मिनट में एक उड़ान भरी जा रही। थोड़ा सा हिसाब किताब कर लें तो बारह घंटे में तीन सौ चार उड़ानें। ग्यारह हज़ार फुट ऊपर, संकरी घाटी का रोमांच दिलाने के लिए, बारह साल में दस हादसे देखने वाली हमारी लोकप्रिय व्यवस्था, अनुशासन और धार्मिक श्रद्धा मौन रहने के सिवाए और क्या कर सकती है ।
अब तो पर्यटन का कर्म और धर्म यही हो गया है। सुरक्षा प्रबंधों को कहीं भी दफना दिया जाता है। एयर ट्राफिक टावर कंट्रोल की कोटेशनें फ़ाइल में रह जाती हैं। अधिकांश सिस्टम बेहोश पड़े होते हैं। व्यवस्थाओं की संगठित गर्दन छुडाने के लिए मुआवजा है। बाज़ार का चरित्र तो राजनीति से मिलता जुलता होता है। बेचारे पर्यावरण की बाज़ार क्यूं सुनेगा, आज तक सुनी है क्या। कहीं इस सोच को मान्यता तो नहीं मिलती जा रही कि धार्मिक कार्य करने वाले को यदि व्यवस्था की कमियों के कारण या प्राकृतिक गलती के कारण शरीर छोड़ना पड़ रहा है तो वह मोक्ष प्राप्त करने के लिए अधिकृत होगा।
कुछ जगहों पर सिर्फ प्रसिद्ध, विशेष और धनवान लोगों को ही जाने की इजाज़त होनी चाहिए। आम आदमी के लिए तो किसी भी जगह की प्रतिकृति काम चला सकती है। इंसान को समझाना हमेशा मुश्किल रहा। फिर ऐसा करना बाज़ार ने और मुश्किल बना दिया है। राजनीति भी अपनी टांग अड़ाकर रखना चाहती है। उसने भी तो सहानुभूति पूर्वक संवेदना देने के लिए कुछ लोग चुनने होते हैं। ऐसे लोग विकास के हेलीकाप्टर में सवार होते हैं। उचित तरीके से कुछ नहीं करना चाहते। उनके जीवन का नियंत्रण गैर अनुशासित लोगों के हाथ में होता है। विकास के हेलीकाप्टर कहीं भी उड़ना और उतरना चाहते हैं लेकिन जब टकराकर, भटककर, फंसकर गिरते हैं तो विनाश का मलबा हो जाते हैं और मोक्ष मिलना मुश्किल हो जाता है।
- संतोष उत्सुक