प्यार करने का अर्थ ये नहीं है शारीरिक संबंध बनाने का लाइसेंस मिल गया है: केरल हाई कोर्ट

By प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क | Nov 20, 2021

कोच्चि। केरल उच्च न्यायालय ने बलात्कार के मामले में दोषी करार दिए गए एक व्यक्ति द्वारा दायर अपील पर विचार करते हुए कहा कि अपरिहार्य मजबूरी के सामने बेबसी को सहमति नहीं माना जा सकता है। न्यायमूर्ति आर नारायण पिशारदी ने अपने आदेश में कहा कि केवल इसलिए कि पीड़िता आरोपी से प्यार करती थी, यह नहीं माना जा सकता कि उसने संबंध बनाने के लिए सहमति दी थी। अदालत ने 31 तारीख के अपने आदेश में कहा, ‘‘कानून के परिप्रेक्ष्य में अपरिहार्य मजबूरी के सामने बेबसी को सहमति नहीं माना जा सकता। सहमति के लिए किसी कृत्य के बारे में और इसके नैतिक प्रभाव का बोध होना आवश्यक है।

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अदालत ने कहा कि अगर यह मान लिया जाए कि बाद के मौकों पर लड़की ने आरोपी के कृत्य का विरोध नहीं किया तो भी यह नहीं कहा जा सकता कि आरोपी को उसने शारीरिक संबंध बनाने की सहमति दी थी। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि यह माना जा सकता है कि पीड़ित लड़की ने किसी अपरिहार्य परिस्थितियों में ऐसा नहीं किया होगा, क्योंकि उसके पास कोई अन्य विकल्प नहीं था।

हालाकि, अदालत ने यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) कानून के तहत दोषसिद्धि को रद्द कर दिया क्योंकि पीड़िता की उम्र साबित नहीं हुई। अदालत ने कहा कि आरोपी का कृत्य स्पष्ट रूप से भारतीय दंड संहिता (अपहरण और बलात्कार) की धारा 366 और 376 के तहत दंडनीय अपराध है।

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