झारखंड के सबसे युवा CM से लेकर राजनीतिक चुनौतियों से निपटने का तक ऐसा रहा है हेमंत सोरेन का सफर

By प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क | Aug 27, 2022

रांची। विधायक के तौर पर अयोग्य ठहराए जाने की आशंका का सामना कर रहे झारखंड के मुख्यमंत्री अब तक के राजनीतिक सफर में कई उतार-चढ़ाव देख चुके हैं। हेमंत सोरेन अपने पिता एवं झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के प्रमुख शिबू सोरेन की राजनीतिक विरासत के उत्तराधिकारी के तौर पर उनकी पहली पसंद नहीं थे। हालांकि, हेमंत सोरेन को उनके बड़े भाई दुर्गा सोरेन की 2009 में हुई मौत के बाद राजनीति में उतारा गया। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने शुक्रवार को दावा किया था कि ‘‘शैतानी ताकतें’’ उनकी लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार को अस्थिर करने का प्रयास कर रही हैं।

सोरेन ने भाजपा के नेतृत्व वाली अर्जुन मुंडा सरकार में उपमुख्यमंत्री का पद संभालने के लिए उच्च सदन से इस्तीफा दे दिया था। लेकिन, दो साल बाद ही भाजपा-झामुमो का गठबंधन टूट गया और राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। हालांकि, मुख्यमंत्री के रूप में उनका पहला कार्यकाल अल्पकालिक रहा, क्योंकि 2014 में भाजपा ने राज्य की सत्ता पर कब्जा जमाया और रघुबर दास मुख्यमंत्री बने थे। साल 2014 में वह झारखंड विधानसभा में जीतकर पहुंचे औ नेता प्रतिपक्ष बने। भाजपा द्वारा 2014-19 के दौरान सोरेन और उनके परिवार पर छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम और संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम का उल्लंघन करने का आरोप लगाये जाने के चलते उन्हें चुनौतियों का सामना करना पड़ा। हालांकि, बाद में चुनौतियों से निपटते हुए सोरेन ने पुराने दोस्तों (कांग्रेस और राजद) के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन किया। अपने सहयोगियों के समर्थन से सोरेन 2019 में सत्ता में आए और उनकी पार्टी झामुमो ने अकेले 30 विधानसभा सीट जीती।

सोरेन को ‘आपके अधिकार, आपकी सरकार, आपके द्वार’ जैसी नयी योजनाओं को शुरू करने का श्रेय दिया जाता है। उन्होंने दोपहिया वाहन इस्तेमाल करने वाले गरीब और निम्न-मध्यम वर्ग के लोगों के लिए इस साल 26 जनवरी से पेट्रोल पर 25 रुपये प्रति लीटर की राशि देने की भी घोषणा की थी। हाल में मुख्यमंत्री सोरेन ने राज्य के प्रतिभाशाली युवाओं के विदेश में उच्च शिक्षा हासिल करने के सपनों को पूरा करने के लिए छात्रवृत्ति को विस्तार देने की घोषणा की।

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उल्लेखनीय है कि राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रघुवर दास ने हेमंत सोरेन पर आरोप लगाया था कि उन्होंने मुख्यमंत्री रहते हुए और खनन विभाग का दायित्व भी अपने पास रखते हुए, रांची के अनगड़ा में एक खनन पट्टा अपने नाम आवंटित कराया था, जो सीधे तौर पर जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 9ए के तहत अवैध है। दास ने दावा किया था कि इस मामले में मुख्यमंत्री के खिलाफ लाभ के पद का मामला बनता है। उन्होंने अपनी पार्टी की ओर से राज्यपाल से मुलाकात कर इस मामले में हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया था और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की विधानसभा सदस्यता रद्द करने की मांग की थी।

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