कांग्रेस से जुदा हो गए थे हेमवती नंदन बहुगुणा के रास्ते, 1973 में बने थे UP के मुख्यमंत्री, ऐसा रहा उनका कार्यकाल

By अनुराग गुप्ता | Apr 25, 2022

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे हेमवती नंदन बहुगुणा ने साल 1952 में पहली बार निर्वाचित होकर विधानसभा पहुंचे थे। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से नाराज चल रहे हेमवंती नंदर बहुगुणा को लखनऊ भेज दिया था और फिर उन्होंने 8 नवंबर, 1973 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। कहा जाता है कि हेमवती नंदन बहुगुणा इतने ज्यादा लोकप्रिय हुआ करते थे कि वो आगे चलकर प्रधानमंत्री के उम्मीदवार भी बन सकते थे। ऐसे में उन्हें केंद्र की राजनीति से दूर कर उत्तर प्रदेश भेजा गया था।

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पौड़ी गढ़वाल में जन्में हेमवती नंदन बहुगुणा ने नवंबर 1973 में कांग्रेस शासित सरकार में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी और वह नवंबर 1975 तक इस पद पर रहे।


कौन हैं हेमवती नंदन बहुगुणा ?

हेमवती नंदन बहुगुणा का जन्म 25 अप्रैल, 1919 को पौड़ी गढ़वाल के बुघानी में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनका परिवार बाद में इलाहाबाद चला गया। हेमवती नंदन बहुगुणा की दो शादियां हुई थीं। पहली पत्नी पैतृक गांव बुघानी में रहती थीं। उनकी दूसरी पत्नी कमला बहुगुणा उनके साथ इलाहाबाद में रहा करती थीं और इस दंपत्ति के तीन बच्चे हैं।


इस दंपत्ति के सबसे बड़े बेटे विजय बहुगुणा उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रह चुके हैं और दूसरे बेटे शेखर बहुगुणा हैं। जबकि बेटी रीता बहुगुणा जोशी इलाहाबाद से भाजपा सांसद हैं और पहले वो उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी की अध्यक्ष रह चुकी हैं।


रीता बहुगुणा जोशी ने पिता हेमवती नंदन बहुगुणा पर एक किताब लिखी है। जिसमें उन्होंने विस्तार से बताया है कि हेमवंती नंदर बहुगुणा को आखिरी इंदिरा गांधी की कौन सी बातें पसंद नहीं आईं और इंदिरा उनसे क्यों नाराज थीं। इतना ही नहीं रीता बहुगुणा जोशी ने आरोप लगाया कि इंदिरा गांधी ने अपने बेटे संजय गांधी को बढ़ाने के चक्कर में कई योग्य लोगों को खो दिया था। इनमें महज हेमवती नंदन बहुगुणा ही नहीं बल्कि और लोग भी शामिल थे।


आपको बता दें कि हेमवती नंदन बहुगुणा को 1971 में केंद्रीय मंत्रिमंडल में संचार राज्य मंत्री की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। इसके बाद 1973 में उन्हें उत्तर प्रदेश भेज दिया गया था और फिर उनकी ताजपोशी हुई। हालांकि उनका कार्यकाल छोटा रहा और उन्हें 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया गया था।


कांग्रेस से जुदा हुए रास्ते

तत्कालीन इंदिरा गांधी ने जब देश से आपातकाल हटाया था और आम चुनावों का आह्वान किया था तब हेमवती नंदन बहुगुणा के रास्ते कांग्रेस से जुदा हो गए थे और उन्होंने पार्टी को अलविदा कहते हुए जगजीवन राम और नंदिनी सत्पथी के साथ कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी (सीएफडी) नामक एक नया समूह बनाया था।

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आम चुनावों में हिस्सा लेने के लिए सीएफडी ने जनता पार्टी के साथ गठबंधन किया और फिर चुनावों बाद मोरारजी देसाई मंत्रिमंडल में हेमवती नंदन बहुगुणा को शामिल किया गया था। उस वक्त उन्हें रसायन और उर्वरक मंत्री की जिम्मेदारी दी गई थी। जबकि 1979 में चौधरी चरण सिंह के कार्यकाल में उन्होंने वित्त मंत्री की जिम्मेदारी संभाली है। उनके कार्यकाल के दौरान देश मंदी की मार झेल रहा था। उस वक्त वैश्विक ऊर्जा संकट के कारण वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि में 5.2% की भारी गिरावट आई। जिसके बाद हेमवती नंदर बहुगुणा ने खुद को चौधरी चरण सिंह सरकार से अलग कर लिया और अक्टूबर 1979 में वापस कांग्रेस से हाथ मिला था।


जनवरी 1980 के चुनावों में उन्होंने गढ़वाल से इंदिरा गांधी की कांग्रेस (आई) पार्टी के उम्मीदवार के रूप में जीत हासिल की। लेकिन जल्द ही पार्टी को अलविदा कहते हुए अपनी सीट से इस्तीफा दे दिया और फिर 1982 में उन्होंने इस सीट के लिए उपचुनाव जीता।


बच्चन से हारे थे चुनाव

साल 1984 के आम चुनावों में हेमवती नंदन बहुगुणा को इलाहाबाद से कांग्रेस उम्मीदवार अमिताभ बच्चन के खिलाफ हार का सामना करना पड़ा था। उस वक्त अमिताभ बच्चन ने उन्हें 1,87,000 मतों से चुनाव हराया था। साल 1988 में हेमवती नंदन बहुगुणा की तबीयत बहुत ज्यादा खराब हो गई थी और बाईपास सर्जरी के लिए उन्हें अमेरिका जाना पड़ा था। हालांकि सर्जरी असफल रही और 17 मार्च 1989 को क्लीवलैंड अस्पताल में उन्होंने आखिरी सांस ली।


- अनुराग गुप्ता

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