अरुण नेहरू: जिन्हे इंदिरा गांधी राजनीति में लाईं, राजीव से मतभेद के बाद छोड़ दी थी कांग्रेस

अरुण नेहरू: जिन्हे इंदिरा गांधी राजनीति में लाईं, राजीव से मतभेद के बाद छोड़ दी थी कांग्रेस
Prabhasakshi

अरुण नेहरू गांधी-नेहरू परिवार के बेहद करीबी सदस्य थे। इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के कार्यकाल में उन्हें देश के सबसे ताकतवर राजनीतिक हस्तियों में शामिल किया जाता था। इसी से अरुण नेहरू के राजनीतिक कद का अंदाजा भी लगाया जा सकता है। अरुण नेहरू पर्दे के पीछे रहकर काम करने वाले नेताओं में से थे।

भारत की राजनीति में गांधी नेहरू परिवार का दबदबा रहा है। गांधी-नेहरू परिवार का एक और सदस्य जिसका राजनीति में वर्चस्व देखने को मिला था, वह अरुण नेहरू थे। अरुण नेहरू गांधी-नेहरू परिवार के बेहद करीबी सदस्य थे। इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के कार्यकाल में उन्हें देश के सबसे ताकतवर राजनीतिक हस्तियों में शामिल किया जाता था। इसी से अरुण नेहरू के राजनीतिक कद का अंदाजा भी लगाया जा सकता है। अरुण नेहरू पर्दे के पीछे रहकर काम करने वाले नेताओं में से थे। उनके फैसले कांग्रेस और उसकी सरकार के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण होते थे। अरुण नेहरू का जन्म 24 अप्रैल 1944 को लखनऊ में हुआ था। उनके पिता का नाम आनंद नेहरू था। उन्होंने लखनऊ के ही ला मार्टिनियर बॉयज़ कॉलेज, लखनऊ और लखनऊ क्रिश्चियन कॉलेज से अपनी पढ़ाई पूरी की ।अरुण नेहरू की शादी 1967 में सुभद्रा से हुई थी।

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जानकारों के मुताबिक अरुण नेहरू को राजनीति में इंदिरा गांधी लेकर आए थे। हालांकि इंदिरा गांधी को यह सलाह वीपी सिंह की ओर से दी गई थी। वीपी सिंह अरुण नेहरू से काफी प्रभावित थे। उस वक्त उत्तर प्रदेश की राजनीति में हेमंती नंदन बहुगुणा और वीपी सिंह के बीच वर्चस्व की लड़ाई चल रही थी। 1980 में इंदिरा गांधी दो जगह से चुनाव लड़ी थीं। एक था रायबरेली और दूसरा का आंध्र प्रदेश का मे़डक। इंदिरा गांधी ने रायबरेली सीट से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद कांग्रेस की ओर से नए उम्मीदवारों की खोज शुरू हुई थी। बहुगुणा की ओर से इस सीट के लिए जगपत दुबे का नाम आगे किया गया था जबकि वीपी सिंह ने अरुण नेहरू का नाम सुझाया था। उस समय अरुण नेहरू एक कंपनी में कोलकाता में रहकर काम करते थे। चुनाव के समय वह रायबरेली जरूर आया करते थे।

इंदिरा गांधी के चचेरे भाई होने के कारण उनके पक्ष में फैसला गया। रायबरेली की सीट गांधी परिवार के लिए प्रतिष्ठा की सीट थी। ऐसे में अरुण नेहरू का नाम इस सीट से फाइनल हो गया। अरुण नेहरू ने यहां से जीत हासिल की। संजय गांधी के निधन के बाद इनका कद कांग्रेस में काफी बढ़ने लगा। व्यापारिक समुदाय में अरुण नेहरू की अच्छी पकड़ थी। पार्टी के लिए फंड जुटाने में उनकी भूमिका भी अहम हो जाती थी। 1981 में जब राजीव गांधी राजनीति में आएं तो अरुण नेहरू उनके प्रमुख सलाहकार बने। इंदिरा गांधी के रहते पीएम हाउस में अरुण नेहरू की तूती बोलती थी। जब तक इंदिरा गांधी रहीं, अरुण नेहरू उनके काफी भरोसेमंद रहे। उन्होंने रायबरेली से 1984 में भी चुनाव जीता।

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कहते हैं कि इंदिरा गांधी की हत्या के बाद वह अरुण नेहरू ही थे जिन्होंने राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बनाने का प्रस्ताव रखा था। राजीव गांधी की सरकार में अरुण नेहरू आंतरिक सुरक्षा मंत्री भी बने। इसके अलावा उन्हें ऊर्जा मंत्रालय की जिम्मेदारी भी दी गई। हालांकि इसी दौरान राजीव गांधी से उनके कई मतभेद हुए जिसके बाद उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी और वीपी सिंह के साथ हो गए। वीपी सिंह ने उन्हें बिल्लौर से प्रत्याशी बनाया। बिल्हौर से वे चुनाव जीतने में कामयाब हुए। हालांकि धीरे-धीरे उनका कद घटने लगा। 1998-99 में अरुण नेहरू को भाजपा ने रायबरेली से उम्मीदवार बनाया। लेकिन वे चुनाव हार गए। अरुण नेहरू को भाजपा नेता अरुण जेटली का भी बेहद करीबी बताया जाता है। 25 जुलाई 2013 को अरुण नेहरू का गुड़गांव में निधन हो गया था।

- अंकित सिंह