हाय रे तिलचट्टा (व्यंग्य)

By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ | Jun 11, 2025

कभी-कभी जिंदगी कुछ ऐसी घटनाएँ हमारे सिर पर पटक देती है, जैसे कोई छुट्टी की सुबह, बिना अलार्म के उठा दे। घटना छोटी होती है, पर प्रतिक्रिया में पूरी पंचायत बैठ जाती है — जैसे पकोड़े में मिर्च ज्यादा पड़ गई हो। ये कहानी भी कुछ ऐसी ही है, जहां एक निरीह से तिलचट्टे ने पूरे दफ्तर को वह नचाया जैसे चुनावी मौसम में वादा। चाय की प्याली से उठती भाप जितनी गरम नहीं थी, उतनी गरमी उस तिलचट्टे की फड़फड़ाहट ने फैलाई।

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तिलचट्टा भी शायद चुनावी नेता था। एक बार में एक जगह नहीं रुकता। कूदता रहा — एक कुर्सी से दूसरी कुर्सी, एक मन से दूसरे मन में डर बोता रहा। पूरा ऑफिस रणभूमि बन चुका था। कोई झाड़ू ढूँढ रहा था, कोई वाइपर, और एक सज्जन तो चप्पल उतारकर  — “मारो सालो को…!” मगर साहस नाम की चीज़, वही थी जो पेंडिंग फाइल की तरह सबके दिलों में थी — दबा, बुझा और बेसुध।

उसी समय, प्रकट हुए मैनेजर साहब। बाल खिचड़ी, चाल धीमी, और चेहरा ऐसा शांत कि जैसे सब्जी में नमक कम हो फिर भी कहें — “ठीक है।” उन्होंने तिलचट्टे को देखा, जैसे डॉक्टर मरीज की एक्स-रे रिपोर्ट पढ़ता है। फिर बड़े आराम से पेपर कप से उसे फुसला कर उठाया और खिड़की से बाहर उछाल दिया। कमरे में शांति फैल गई — जैसे अचानक फिल्म में बैकग्राउंड म्यूज़िक बंद हो गया हो। लोगों ने राहत की साँस ली, कुछ ने ताली भी बजाई। लेकिन…

…शांति ज्यादा देर टिकती कहाँ है, ख़ासकर उस जगह जहां व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के ग्रेजुएट हों। एक दम आवाज़ उठी — “क्यों फेंका बाहर?” फिर दूसरा स्वर — “बिचारा जीवित था…!” एक और आवाज़ — “उसे पार्क में छोड़ सकते थे, पौधों के बीच, उसकी बस्ती में।” अचानक, जिसे नायक समझा गया था, वो खलनायक बन गया। तिलचट्टे के प्रति सहानुभूति बहने लगी, और मैनेजर पर आरोपों की बौछार। ये वही लोग थे जो पाँच मिनट पहले कुर्सी पर खड़े होकर चिल्ला रहे थे — “मार दो! बचाओ! मेरी चाय गिर गई!”

हमने सुना था कि लोकतंत्र में हर किसी को बोलने का अधिकार है। पर ये किसने कहा था कि हर बात में विरोध का ठेका भी लेना है? ऑफिस की ‘लीडरशिप कमेटी’ एक्टिव हो गई — जिसमें तीन ‘टी पार्टी’ सदस्य, दो ‘दूसरे की टाँग खींचो’ विशेषज्ञ और एक ‘कभी काम ना करने की शपथ’ ले चुका कर्मचारी शामिल थे। मीटिंग हुई — "तिलचट्टा भी तो भगवान की रचना है!" और वही लोग जिन्होंने “चप्पल से मारो इस कीड़े को!” कहा था, अब “जीवन का सम्मान करना चाहिए!” के पोस्टर बना रहे थे।

बात मैनेजर के ‘रवैये’ पर आई। "बहुत रूखे हैं," "संवेदनशील नहीं," "हमारे ऑफिस का माहौल बहुत टॉक्सिक हो गया है।” एक ‘सेंसिटिव बॉस’ चाहिए — ऐसा जो पहले तिलचट्टे से पूछे कि "तुम्हें कोई समस्या है?" फिर उसे कॉफी ऑफर करे, उसकी काउंसलिंग कराए, और फिर उसे हंसते-हंसते बाहर भेजे। मैनेजर साहब को मेमो मिला, “आपने पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता नहीं दिखाई।” अगली मीटिंग में तय हुआ — अगली बार तिलचट्टा आए, तो एक ‘इन्क्लूसिव स्पेस’ बनाया जाएगा — जिसमें वो “कम्फर्टेबल” महसूस करे।

दफ्तर में एक दीवार पर पोस्टर लगाया गया — "हर जीवन है अनमोल। फिर चाहे वह तिलचट्टे का ही क्यों न हो" और नीचे छोटा सा कैप्शन: “आचार से नहीं विचार से काम लें” पोस्टर के नीचे वही लोग सेल्फी ले रहे थे जो दो दिन पहले तिलचट्टे के खात्मे पर ‘थैंक यू मैनेजर सर’ वाला स्टेटस डाले थे। और मैनेजर? वही पुराने डेस्क पर बैठे, ग्रीन टी पीते, किसी इनकम टैक्स फाइल को घूरते रहे — जैसे उसमें भी कोई कॉकरोच छुपा हो।

असल में तिलचट्टा कभी समस्या नहीं था। समस्या तो इंसानी दिमाग है — जो डरते वक्त चिल्लाता है, और सुरक्षित होने पर इल्ज़ाम लगाता है। आदमी को राहत चाहिए, लेकिन उसका तरीका नहीं पसंद। सब चाहते हैं कोई आगे बढ़े, लेकिन जैसे ही कोई बढ़ता है, सबकी उँगली उसी की पीठ पर होती है — “तू क्यों बढ़ा?” और नेतृत्व का बोझ वही समझ सकता है, जिसने कभी सच्चे मन से झाड़ू पकड़ी हो।

- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’,

(हिंदी अकादमी, मुंबई से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

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