By डॉ. वेदप्रताप वैदिक | Feb 10, 2022
हिजाब को लेकर कर्नाटक में जबर्दस्त खट-पट चल पड़ी है। यदि मुस्लिम लड़कियां हिजाब पहनने को लेकर प्रदर्शन कर रही हैं तो हिंदू लड़के भगवा दुपट्टा लगाकर नारे जड़ रहे हैं। उन्हें देख-देखकर दलित लड़के नीले गुलूबंद डटाकर नारे लगा रहे हैं। अच्छा है कि वहां समाजवादी नहीं हैं। वरना वे लाल टोपियां लगाकर शोर-शराबा मचाते। समझ में नहीं आता कि शिक्षा-संस्थाओं में सांप्रदायिकता का यह जहर क्यों फैलता जा रहा है? न हिजाब पहनना अपने आप में बुरा है, न भगवा दुपट्टा लपेटना और न ही लाल टोपी लगाना लेकिन यदि आपकी वेशभूषा, खान-पान और भाषा-बोली यदि आपस में बैर करना सिखाती है तो मेरा निवेदन है कि आप उसे तुरंत तज दीजिए।
दुनिया की सारी ईसाई कन्याओं को माता मरियम की तरह क्या अविवाहित ही रहना चाहिए? क्या भारत के लेाग अब भी राजा दशरथ की तरह तीन पत्नियां और द्रौपदी की तरह पांच पति रख सकते हैं? क्या आप भारत में किसी ऐसे मुसलमान पुरुष को जानते हैं, जिसकी चार-चार पत्नियां हों? क्या आप किसी ऐसे घोर ईश्वरभक्त को जानते हैं, जो कोई आकाशवाणी सुनकर संत इब्राहिम की तरह अपने प्यारे बेटे इजहाक को कुर्बान करने के लिए तैयार हो जाए? हिंदू पुराण-ग्रंथ तो गप्पों की दुकान ही मालूम पड़ते हैं। उनकी कहानियां सुन-सुनकर हम बचपन में आश्चर्यचकित हो जाते थे कि ये भी कोई धर्मग्रंथ हो सकते हैं? मनुष्य जाति का इतिहास बताता है कि मजहबों, पंथों या तथाकथित धर्मों ने जहां करोड़ों मनुष्यों को नैतिकता और मर्यादा का पाठ पढ़ाया है, वहीं उन्होंने राजनीति से भी ज्यादा गंदी भूमिका अदा की है। इसीलिए जरुरी है कि हम मजहब, पंथ, संप्रदाय और धर्म के नाम पर आपस में लड़ने से बाज आएं। जो लोग ईश्वर और अल्लाह के नाम पर खून बहाने को तैयार रहते हैं, वे उस परम शक्ति के अस्तित्व के प्रति अविश्वास पैदा कर देते हैं। वह ईश्वर ही क्या है, जो अपने भक्तों के बीच झगड़े करवाता है?
- डॉ. वेदप्रताप वैदिक