World Hindi Day 2026: विश्व संवाद की नई धुरी बनती हिन्दी

By योगेश कुमार गोयल | Jan 10, 2026

भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी की ताकत वैश्विक स्तर पर लगातार बढ़ रही है और हिन्दी की इस बढ़ती ताकत का सकारात्मक पक्ष यही है कि आज विश्वभर में करोड़ों लोग हिन्दी बोलते हैं और दुनियाभर के सैंकड़ों विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ाई जाती है। आधुनिकता की ओर तेजी से अग्रसर कुछ भारतीय भले ही आज अंग्रेजी बोलने में अपनी आन, बान और शान समझते हों किन्तु सच यही है कि हिन्दी ऐसी भाषा है, जो प्रत्येक भारतवासी को वैश्विक स्तर पर मान-सम्मान दिलाती है। सही मायनों में विश्व की प्राचीन, समृद्ध एवं सरल भाषा है भारत की राजभाषा हिन्दी, जो न केवल भारत में बल्कि अब दुनिया के अनेक देशों में बोली जाती है। दुनियाभर में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए वातावरण निर्मित करने तथा हिन्दी को अंतर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में प्रस्तुत करने के उद्देश्य से पिछले कई वर्षों से 10 जनवरी को ‘विश्व हिन्दी दिवस’ मनाया जाता है। यह दिवस वास्तव में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी की महानता के प्रचार-प्रसार का एक सशक्त माध्यम है। पहली बार नागपुर में 10 जनवरी 1975 को विश्व हिन्दी सम्मेलन का आयोजन किया गया था, जिसमें 30 देशों के 122 प्रतिनिधि शामिल हुए थे। तत्पश्चात् भारत के बाहर मॉरीशस, यूनाइटेड किंगडम, त्रिनिदाद, अमेरिका इत्यादि देशों में भी विश्व हिन्दी सम्मेलन का आयोजन किया गया।

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तकनीकी रूप से हिन्दी को और ज्यादा उन्नत, समृद्ध तथा आसान बनाने के लिए अब कई सॉफ्टवेयर भी हिन्दी के लिए बन रहे हैं। यह हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी की ताकत ही कही जाएगी कि इसके इतने ज्यादा उपयोगकर्ताओं के कारण ही अब भारत में बहुत सारी बहुराष्ट्रीय कम्पनियां हिन्दी का भी उपयोग करने लगी हैं। हिन्दी की बढ़ती ताकत को महसूस करते हुए भारत में ई-कॉमर्स साइटें भी ज्यादा से ज्यादा ग्राहकों तक अपनी पहुंच बनाने के लिए हिन्दी में ही अपनी ‘एप’ लेकर आ रही हैं। हिन्दी इस समय देश की सबसे तेजी से बढ़ती भाषा है। अगर 2011 की जनगणना के आंकड़े देखें तो 2001 से 2011 के बीच हिन्दी बोलने वालों की संख्या में हमारे देश में करीब 10 करोड़ लोगों की बढ़ोतरी हुई। वर्ष 2001 में जहां 41.03 फीसदी लोगों ने हिन्दी को अपनी मातृभाषा बताया था, वहीं 2011 में ऐसे लोगों की संख्या करीब 42 करोड़ के साथ 43.63 फीसदी दर्ज की गई और जिस प्रकार हिन्दी का चलन लगातार बढ़ रहा है, माना जाना चाहिए कि उसके बाद के करीब एक दशक में हिन्दी बोलने वालों की संख्या में कई करोड़ लोगों की बढ़ोतरी अवश्य हुई होगी।

भारत लंबे समय तक अंग्रेजों का गुलाम रहा और उस दौरान हमारे यहां की भाषाओं पर भी अंग्रेजी दासता का बुरा प्रभाव पड़ा। इसी कारण राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने हिन्दी को ‘जनमानस की भाषा’ बताते हुए वर्ष 1918 में आयोजित ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ में इसे भारत की राष्ट्रभाषा बनाने को कहा था। सही मायने में तभी से हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने के प्रयास शुरू हो गए थे और गर्व का विषय यह है कि अब सैंकड़ों देशों में हिन्दी का प्रयोग धीरे-धीरे बढ़ रहा है। अगर भारतीय परिवेश में हिन्दी के प्रचलन को लेकर बात की जाए तो यह चिंता की बात है कि भारतीय समाज में बहुत से लोगों की मानसिकता ऐसी हो गई है कि हिन्दी बोलने वालों को वे पिछड़ा और अंग्रेजी में अपनी बात कहने वालों को आधुनिक का दर्जा देते हैं। हिन्दी का करीब 1.2 लाख शब्दों का समृद्ध भाषा कोष होने के बावजूद अधिकांश लोग हिन्दी लिखते और बोलते समय अंग्रेजी भाषा के शब्दों का दिल खोलकर इस्तेमाल करते हैं।

ऐसे में विश्व हिन्दी दिवस के अवसर पर यह अत्यंत आवश्यक हो जाता है कि समाज के प्रत्येक वर्ग को हिन्दी भाषा के विकास, उसके व्यापक उपयोग के लाभ तथा उपेक्षा के दुष्परिणामों के प्रति जागरूक किया जाए। हिन्दी केवल संवाद का माध्यम नहीं बल्कि हमारी सांस्कृतिक चेतना, ऐतिहासिक विरासत और राष्ट्रीय आत्मसम्मान की संवाहक है। जब हम अपनी ही भाषा के प्रयोग से संकोच करते हैं तो अनजाने में अपनी पहचान को भी कमजोर करते हैं। हिन्दी का अधिकाधिक उपयोग न केवल भाषा को समृद्ध बनाता है बल्कि समाज में सहजता, समानता और भावनात्मक जुड़ाव को भी मजबूत करता है। लोगों को यह समझाया जाना चाहिए कि हिन्दी हमारी राजभाषा है और उसका सम्मान व प्रचार-प्रसार करना केवल सरकारी दायित्व नहीं बल्कि प्रत्येक नागरिक का नैतिक कर्त्तव्य है।

जब तक हम स्वयं अपने दैनिक जीवन, शिक्षा, प्रशासन, तकनीक और डिजिटल मंचों पर हिन्दी को अपनाने का साहस नहीं करेंगे, तब तक इसके विकास की अपेक्षा अधूरी ही रहेगी। साथ ही यह अहसास कराना भी जरूरी है कि भले ही वैश्विक स्तर पर अंग्रेजी का प्रभाव लंबे समय से बना हुआ है परन्तु हिन्दी आज किसी भी दृष्टि से पीछे नहीं है। इंटरनेट, तकनीक, शिक्षा, व्यापार और अंतर्राष्ट्रीय संवाद के क्षेत्र में हिन्दी की स्वीकार्यता तेजी से बढ़ रही है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम भाषायी हीनभावना से बाहर निकलकर हिन्दी को गर्व के साथ अपनाएं और उसे विश्व मंच पर उसका उचित स्थान दिलाने में सक्रिय भूमिका निभाएं।

- योगेश कुमार गोयल

(लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में निरंतर सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार तथा कई हिन्दी भाषी चर्चित पुस्तकों के लेखक हैं)

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