समाज का दर्पण था मीडिया, अब इस पर पूरी तरह से व्यवसायिकता हावी है

By प्रियंका सौरभ | May 30, 2020

पूरी दुनिया ने पत्रकारिता को अपना एक अभिन्न और खास अंग मना है और साथ ही लोकतंत्र में इसको चौथा स्तंभ के रूप में माना गया है। वह 30 मई का ही दिन था, जब देश का पहला हिन्दी अखबार 'उदंत मार्तण्ड' प्रकाशित हुआ। इसी दिन को हिन्दी पत्रकारिता दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। हिन्दी के पहले अखबार के प्रकाशन को 194 वर्ष हो गए हैं।


30 मई 2020 यानि आज पूरे देश में पत्रकारों का सबसे खास दिन पत्रकारिता दिवस 2020 मनाया जा रहा है। सन 1826 में सबसे पहले हिंदी भाषा में समाचार पत्र उदंत मार्तंड जारी हुआ था। जिससे भारतीय पत्रकारिता की शुरुआत हुई थी। इस दिन को ही हर साल पत्रकारिता दिवस के रूप में मनाया जाता है, इस अवधि में कई समाचार-पत्र शुरू हुए, उनमें से कई बन्द भी हुए, लेकिन उस समय शुरू हुआ हिन्दी पत्रकारिता का यह सिलसिला बदस्तूर जारी है। लेकिन, अब उद्देश्य पत्रकारिता से ज्यादा व्यावसायिक हो गया है।

 

इसे भी पढ़ें: स्वदेशी को बढ़ावा देकर बापू के नक्शेकदम पर चल रहे हैं प्रधानमंत्री मोदी

देश की मीडिया अभी विश्वसनीयता के सबसे बड़े संकट से गुज़र रही है। अपवादों को छोड़ दें तो हमारी मीडिया की प्रतिबद्धता अब देश के आमजन के प्रति नहीं, राजनीतिक सत्ता और उससे जुड़े लोगों के प्रति है। कुछ मामलों में यह प्रतिबद्धता बेशर्मी की तमाम हदें पार करने लगी है। वह इलेक्ट्रॉनिक मीडिया हो या प्रिंट मीडिया, उस पर सत्ता और पैसों का दबाव इतना कभी नहीं रहा था जितना आज है। वज़ह साफ़ है। चैनल और अखबार चलाना अब कोई मिशन या आन्दोलन नहीं।


राष्ट्र के पास जब कोई मिशन, कोई आदर्श, कोई गंतव्य नहीं तो मीडिया के पास भी क्या होगा ? 'जो बिकता है, वही दिखता है' के इस दौर में पत्रकारिता अब खालिस व्यवसाय है जिस पर किसी लक्ष्य के लिए समर्पित लोगों का नहीं, बड़े-छोटे व्यावसायिक घरानों का लगभग एकछत्र कब्ज़ा है। उन्हें अपने न्यूज़ चैनल या अखबार चलाने और उससे मुनाफा कमाने के लिए विज्ञापनों से मिलने वाली भारी भरकम रकम चाहिए और यह रकम उन्हें सत्ता और उससे निकटता से जुड़े व्यावसायिक घराने ही उपलब्ध करा सकते हैं।


जो मुट्ठी भर लोग मीडिया को लोकचेतना का आईना और सामाजिक सरोकारों का वाहक बनाने की कोशिशों में लगे हैं, उनके आगे साधनों के अभाव में प्रचार-प्रसार और वितरण का गहरा संकट है। कुल मिलाकर मीडिया का जो वर्तमान परिदृश्य है, उसमें दूर तक कोई उम्मीद नज़र नहीं आती। दो ही तरह के जर्नलिज्म का दौर चल रहा है। एक दौर सुपारी जर्नलिज्म का है। जहां मुद्दे को ऐसे उछाला जाता है जैसे गांव की कोई झगड़ालू औरत छोटी-सी बात को लेकर महीनों सड़क पर निकल गाली गलौज करती रहती हो। नतीजा भारत की पत्रकारिता अपनी विश्वसनीयता को खो चुका है। ठीक उसी तरह जैसे भेड़िया आया, भेड़िया आया की कहानी में।


भारत के संदर्भ में पत्रकारिता कोई एक-आध दिन की बात नहीं है, बल्कि इसका एक दीर्घकालिक इतिहास रहा है। प्रेस के आविष्कार को पुर्नजागरण एवं नवजागरण के लिए एक सशक्त हथियार के रूप में प्रयुक्त किया गया था। भारत में प्रेस ने आजादी की लड़ाई में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन कर गुलामी के दिन दूर करने का भरसक प्रयत्न किया।

 

इसे भी पढ़ें: मीडिया के पवित्र मंच का इस्तेमाल भावनाएँ भड़काने, राजनीतिक हित साधने में हो रहा है

कई पत्रकार, लेखक, कवि एवं रचनाधर्मियों ने कलम और कागज के माध्यम से आजादी की आग को घी-तेल देने का काम किया। प्रेस की आजादी को लेकर आज कई सवाल उठ रहे हैं। पत्रकार और पत्रकारिता के बारे में आज आमजन की राय क्या है? क्या भारत में पत्रकारिता एक नया मोड़ ले रही है? क्या सरकार प्रेस की आजादी पर पहरा लगाने का प्रयास कर रही है? क्या बेखौफ होकर सच की आवाज को उठाना लोकतंत्र में 'आ बैल मुझे मार' अर्थात् खुद की मौत को सामने से आमंत्रित करना है? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो आज हर किसी के जेहन में उठ रहे हैं। 


मीडिया में आम आदमी की समस्याओं से इतर होकर अनुपयोगी रियल्टी शो संचालित होने लग गए हैं। पत्रकारिता की जनहितकारी भावनाओं को आहत किया जा रहा है। यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि मीडिया की स्वतंत्रता का मतलब कदापि स्वच्छंदता नही है। खबरों के माध्यम से कुछ भी परोस कर देश की जनता का ध्यान गलत दिशा की ओर ले जाना कतई स्वीकार्य नहीं किया जा सकता। मीडिया की अति-सक्रियता लोकतंत्र के लिए घातक सिद्ध हो रही है। निष्पक्ष पत्रकार पार्टी के एजेंट बन रहे हैं। एक बड़ा पत्रकार तबका सत्ता की गोद में खेल रहा है। आदर्श और ध्येयवादी पत्रकारिता धूमिल होती जा रही है व पीत पत्रकार का पीला रंग तथाकथित पत्रकारों पर चढ़ने लग गया है।


हिंदी प्रिंट पत्रकारिता आज किस मोड़ पर खड़ी है, यह किसी से ‍छिपा हुआ नहीं है। उसे अपनी जमात के लोगों से तो लोहा लेना पड़ रहा है साथ ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की चुनौतियां भी उसके सामने हैं। ऐसे में यह काम और मुश्किल हो जाता है। एक बात और...हिंदी पत्रकारिता ने जिस 'शीर्ष' को स्पर्श किया था, वह बात अब कहीं नजर नहीं आती। इसकी तीन वजह हो सकती हैं, पहली अखबारों की अंधी दौड़, दूसरा व्यावसायिक दृष्टिकोण और तीसरी समर्पण की भावना का अभाव। पहले अखबार समाज का दर्पण माने जाते थे, पत्रकारिता मिशन होती थी, लेकिन अब इस पर पूरी तरह से व्यावसायिकता हावी है।


इसमें कोई दो मत नहीं कि हिंदी पत्रकारिता में कुछ संपादक और पत्रकार ऊँचे दर्जे के रहे हैं, जिन्होंने अपनी कलम से न केवल अपने अपने अखबारों को शीर्ष पर पहुंचाया, बल्कि अंग्रेजी के नामचीन अखबारों को भी कड़ी टक्कर दी। आज वे हमारे बीच में नहीं हैं, लेकिन उनके कार्यकाल में हिन्दी पत्रकारिता ने जिस सम्मान को स्पर्श किया, वह अब कहीं देखने को नहीं मिलता। दरअसल, अब के संपादकों की कलम मालिकों के हाथ से चलती। हिन्दी पत्रकारिता आज कहां है, इस पर ‍निश्चित ही गंभीरता से सोच-विचार करने की जरूरत है। यहां महाकवि मैथिलीशरण गुप्त की इन पंक्तियों को उद्धृत करना भी समीचीन होगा...


हम कौन थे, क्या हो गए हैं, और क्या होंगे अभी

आओ विचारें आज मिल कर, यह समस्याएं सभी।


वर्तमान दौर में खेमों में बंटी पत्रकारिता समाज को गलत दिशा में ले जा रही है, कुछ लोग पत्रकारिता/साहित्य में हैं क्योंकि उनको इसकी अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए जरूरत है जबकि कुछ लोग इसलिए हैं कि पत्रकारिता और साहित्य को उनकी जरूरत है, तभी आज समाज बचा हुआ है, ऐसे बहुत से लोग हैं जो सच और संतुलित लिखने की बजाय सालों से घिस रहे हैं बस.....उनको अपनी प्राथमिक इच्छा के साथ तो न्याय करना चाहिए बाकी देखा जायेगा, आने वाली पत्रकार पीढ़ी को संतुलित फैसला करके आगे बढ़ना होगा तभी हिंदुस्तान बचेगा।


पत्रकारिता जनता और नीति-निर्माताओं के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाती है। इस सन्दर्भ में महत्वपूर्ण भूमिका एक पत्रकार निभाता है। ये पत्रकार कुलीन वर्ग द्वारा बोले गये संदेश को सुनते हैं और उन्हें रिकॉर्ड करते हैं। तत्पश्चात सूचनाओं को संसाधित किया जाता है और जनता के हितार्थ सूचना के लिए प्रकाशित किया जाता है। पत्रकारों को सूचना के सन्दर्भ में देश की अखंडता, सूचना की तटस्थता, वैधता और सार्वजनिक जवाबदेही के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए। साथ ही पत्रकारिता के सिद्धांतों का पालन करना चाहिए ताकि जनता में स्वच्छ सूचना का न केवल प्रसारण हो सके वल्कि उससे जनता लाभान्वित हो सके।


-प्रियंका सौरभ   

(रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस)

(कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार)


All the updates here:

प्रमुख खबरें

D Gukesh ने Chess Cheating आरोपों पर तोड़ी चुप्पी, कहा- बिना सबूत के आरोप लगाना गलत

AFC Cup में भारत की बड़ी चुनौती, Japan से मुकाबले से पहले Anju Tamang के बाहर होने से लगा झटका

NFL में Tyreek Hill के एक बयान से हलचल, क्या Kansas City Chiefs में होगी घर वापसी?

T20 World Cup: सेमीफाइनल की जंग में South Africa-West Indies की भिड़ंत, दांव पर नॉकआउट का टिकट