टीआरपी की यह कैसी होड़ है ? (व्यंग्य)

By विजय कुमार | Sep 21, 2020

पिछले एक हफ्ते से शर्माजी से भेंट नहीं हुई। मैंने फोन किया तो पता लगा उनकी तबीयत कुछ ढीली है। यह सूचना कोरोना काल में बड़ी खतरनाक-सी लगती है; पर उन्होंने बताया कि कोई खास बात नहीं, बस पेट कुछ खराब है। मेरे पास शुद्ध हींगवटी रखी थी। मैंने किसी के हाथ वह भेज दी। उससे उन्हें काफी आराम मिला और कल वे सदेह मेरे घर पधार गये।

-बस कुछ अंट-संट खा लिया पिछले दिनों; पर हींगवटी से काफी लाभ हुआ।

-जी हां, वह चीज ही ऐसी है।

चाय का समय था, तो मैंने चाय बनवा ली। इससे वे सामयिक चर्चा की ओर मुड़ गये, ‘‘वर्माजी, इन दिनों टी.वी. पर सुशांत और रिया का किस्सा बहुत आ रहा है।

-अखबारों में तो यह मामला अब पिछले पन्नों पर चला गया है। लगता है आप टी.वी. बहुत देखते हैं ?

-इन दिनों बाहर आना-जाना बंद-सा है। इसलिए दूरदर्शन के सामने ही बैठा रहता हूं। जिस चैनल पर जाओ, वहां सुशांत और रिया की कहानी चल रही है। हर चैनल का अपना दृष्टिकोण है। पुलिस और सी.बी.आई से पहले चैनल वालों ने अपने निष्कर्ष निकाल लिये हैं। टी.वी. स्टूडियो न हुए, न्यायालय के कमरे हो गये।

-शर्माजी, ये टी.वी. वालों की आपसी प्रतियोगिता का परिणाम है।

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-पर वर्मा, ये अभी तक साफ नहीं हुआ कि सुशांत ने आत्महत्या की या उसकी हत्या हुई ? कई लोग इस चक्कर में गिरफ्तार भी हो चुके हैं। सुशांत बिहार का रहने वाला था और मृत्यु उसकी मुंबई में हुई। इसलिए कुछ लोगों ने इसे राज्यों की लड़ाई बना दिया है। चुनाव में भी इसे भुनाने की तैयारी है। केन्द्र और महाराष्ट्र सरकार में आजकल टकराव है। इसीलिए केन्द्र सरकार ने यह केस सी.बी.आई को सौंप दिया। ऐसा लगता है कि बिहार के अगले चुनाव में विकास का मुद्दा पीछे छूट जाएगा।

-हो सकता है।

-कुछ लोगों ने इसमें जातीय कोण ढूंढ़ लिया है। फिल्म जगत में भाई-भतीजावाद से शुरू हुई यह लड़ाई अब नशीले पदार्थों तक पहुंच गयी है। एक लड़ाई टी.वी. पर हो रही है, तो दूसरी सोशल मीडिया पर। अब इसमें फिल्म अभिनेत्री कंगना रनौत भी आ गयी है। उससे नाराज होकर बी.एम.सी. ने उसका दफ्तर तोड़ दिया है। उसे हिमालय की बेटी बताकर उसके समर्थन में हिमाचल प्रदेश में लोग प्रदर्शन कर रहे हैं। कुछ जातीय संस्थाएं भी उसके समर्थन में कूद पड़ी हैं। कुछ लोगों का कहना है कि उसका रुझान राजनीति में है। कोई उसे ‘झांसी की रानी’ कह रहा है तो कुछ लोग ‘खूब लड़ो मर्दानी’ कह कर आग में घी डाल रहे हैं। ऐसे लोगों को न्याय से नहीं, बस अपने मजे से मतलब है।

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शर्माजी लगभग आधे घंटे तक इसी विषय पर बोलते रहे। मैं बस हां-हूं कर रहा था। जब झेलना कठिन हो गया, तो मैंने अंदर से लाकर उन्हें दो हींगवटी की गोली दी, ‘‘लीजिए शर्माजी, आपको आज फिर इसकी जरूरत है। बहुत अधिक टी.वी. देखने से आपके दिमाग में सुशांत केस की गरमी चढ़ गयी है। वह इससे कम होगी। आप इसे मुंह में डाल लें। इन दिनों कृपया टी.वी. कम देखें। कुछ अच्छा साहित्य पढ़ें। आपकी उम्र ऐसी है कि धार्मिक ग्रंथ पढ़ने से भी लाभ होगा। पेट की गरमी तो आसानी से ठीक हो जाती है; पर दिमाग की गरमी बिगड़ जाए तो फिर डॉक्टर को ही बुलाना पड़ता है।’’

शर्माजी ने हींगवटी मुंह में डाली और मेरा इशारा समझकर तुरंत घर के लिए प्रस्थान कर गये।

-विजय कुमार

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