‘कमल’गढ़ की चुनावी अदालत में हिंदू आतंकवाद पर होगी सुनवाई

By अभिनय आकाश | Apr 19, 2019

गुजरात के बाद मध्यप्रदेश ही ऐसी भूमि है जो भाजपा के हिंदुत्व की प्रयोगशाला रही है। भोपाल की सियासत में भगवा रंग चढ़ाने के लिए भाजपा ने साध्वी प्रज्ञा को मैदान में उतारा है। रुद्राक्ष की अनेक मालाएं, भगवा वस्त्र और गेरुए टीके के साथ साध्वी प्रज्ञा भाजपा में शामिल हुईं तो विरोधियों पर बरस रही थी। सियासी मैदान में आने के साथ ही साध्वी ने चुनावी घमासान को धर्मयुद्ध का चोला पहना दिया। मकसद साफ है दिग्विजय सिंह की कथित हिन्दू विरोधी छवि का फायदा उठाया जाए और हिन्दू वोटरों को एकजुट कर भोपाल के किले पर भगवा पताका फहराया जाए। साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को यूपीए की सरकार के वक्त कथित हिन्दू आतंकवाद का चेहरा बना कर कुख्यात किया गया था। मालेगांव ब्लास्ट केस की आरोपी रही प्रज्ञा राजग सरकार में जेल से बाहर निकली और अब संसद बनने के लिए निकल पड़ी हैं। 

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पुरानी अदावत को भुनाने के लिए भाजपा साध्वी को सामने लाई है। वैसे तो भोपाल सीट पर भाजपा का पिछले 30 सालों से कब्जा है लेकिन जब से कांग्रेस ने दिग्विजय सिंह को मैदान में उतारा था भाजपा अपने उम्मीदवार तय नहीं कर पा रही थी। कमलनाथ ने कांग्रेस के दिग्गज नेताओं को कठिन सीटों से लड़ने की बात करते हुए दिग्विजय से भोपाल से चुनाव लड़ने की बात की। भोपाल दिग्विजय सिंह की परंपरागत सीट कभी नहीं रही। वो हमेशा राजगढ़ से लड़ते थे, वहां से वो सांसद रहे, उनके भाई सांसद रहे। सियासी जानकार बताते हैं कि दिग्विजय जब कमलनाथ के पास लोकसभा चुनाव लड़ने की मंशा के साथ जाते हैं तो कमलनाथ उनसे भाजपा के मजबूत किले भोपाल में सेंध लगाने की चुनौती देते हैं। अपने बेबाक बयान, जवाब और चुटकियों से खबरों में रहने वाले दिग्विजय इस चुनौती को स्वीकार कर लेते हैं। दूसरी तरफ़ भाजपा आजीब से असमंजस में फंसी हुई थी क्योंकि सारे दिग्गज नेता एक दूसरे पर ठीकरा फोड़ना चाहते थे। कभी इस सीट से शिवराज सिंह के चुनाव लड़ने की खबर आती है तो कभी उमा भारती तो कभी वर्तमान सांसद आलोक संजर की। लेकिन इन सबके बावजूद ऐसा लगा कि कोई भी दिग्विजय सिंह के सामने आना नहीं चाहता था।

 

राहुल गांधी के राजनीतिक गुरु कहे जाने वाले दिग्विजय सिहं 22 साल की उम्र में ही राजनीति में उतर गए थे। सिधिंया राजघराने की राजमाता विजराजे ने दिग्विजय सिंह से संपर्क किया और उनको जनसंघ में आने के लिए कहा था लेकिन राजगढ़ के दिग्विजय ने तो ये ठान लिया था कि जैसे राजगढ़ जिंदगी भर ग्वालियर के सिंधिया घराने की दावेदारी करता रहा उस राह पर वो नहीं चलेंगे। कांग्रेस में शामिल होकर विधायक बने, सांसद रहे, मध्य प्रदेश सराकर में कैबिनेट मिनिस्टर रहे। लेकिन 1993 में बाबरी मस्जिद गिरने के बाद नरसिम्हा राव की सरकार भाजपा शासित तीन राज्य मध्य प्रदेश, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश की सरकार को बर्खास्त कर देती है। जिसके बाद दिग्विजय सिंह को मध्य प्रदेश की कमान मिलती है। विकास से नहीं मैनेजमेंट से चुनाव जीते जाते है जैसे दावों के साथ दिगविजय 1998 में भी दोबारा विजयी होते हैं। लेकिन अति आत्मविश्वास के साथ साल 2003 में दिग्विजय ने ऐलान किया था कि अगर वो चुनाव हार गए तो दस साल तक कोई चुनाव नहीं लडेंगे। नतीजे सामने आते हैं और कांग्रेस बुरी तरह पराजित होती है और 15 सालों तक मध्य प्रदेश के परिदृश्य से गायब ही हो जाती है। वक्त बदला और बदलते वक्त के साथ कांग्रेस मध्य प्रदेश की सत्ता में दम-खम से कमबैक करती है और 1993 से 2003 तक मप्र के मुख्यमंत्री रहे दिग्विजय 10 साल की प्रतिज्ञा की मियाद खत्म हो जाने के बाद लोकसभा के चुनावी मैदान में उतरने की मंशा जताते हैं। कमलनाथ की तरफ से पेश की गई कठिन चुनौती को स्वीकार कर भोपाल के चुनावी समर में उतरते हैं।

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कांग्रेस नेता दिग्विजय अक्सर अपने बयानों की वजह से चर्चा में रहते हैं। दिग्विजय सिंह ने 2009 में कहा था कि 26/11 से पहले मुंबई में मेरे एटीएस चीफ हेमंत करकरे से बात होती है और उन्होंने कहा था कि हिन्दूवादी संगठन का मेरे उपर प्रेश है। सिमी से जुड़े संदिग्धों को आजमगढ़ और उसके आसपास से जुड़े इलाकों से गिरफ्तार किया जाता है तो दिग्विजय उनके घर सांत्वना देने पहुंच जाते हैं। दिल्ली में चर्चित बाटला हाउस एनकांउटर होता है लेकिन दिग्विजय उसको फर्जी बताने पर उतर जाते हैं। कथित हिन्दू आतंकवाद जैसी थ्योरी धीरे-धीरे दिग्विजय के लिए बोझ बन जाते हैं। जिससे उनका राजनीतिक ग्राफ धीरे-धीरे गिरता जाता है। लेकिन दिग्विजय के फिर से मैदान में उतरने के बाद भाजपा ने भोपाल के चुनाव को धर्म के धरातल में लड़ने की मंशा के साथ साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को मैदान में उतार दिया। मालेगांव मामले में जमानत पर रिहा साध्वी 9 साल तक जेल में अपने पर हुए अत्याचार को आधार बनाकर जनता के सामने उतरी हैं वहीं कार्यकर्ता दिग्विजय की सबसे बड़ी ताकत है और आज भी वो 230 विधानसभाओं में कई कार्यकर्ताओं को नाम लेकर पुकार सकते हैं। लेकिन छवि उनकी सबसे बड़ी कमजोरी है।

 

इस चुनाव के समय ध्रुवीकरण की जो स्थिति बनेगी उसमें यहां के क़रीब 5 लाख 10 हज़ार मुसलमान एक बड़ा फैक्टर साबित होंगे और भाजपा भी हिन्दू सेंटीमेंट को कैश कराने की कोशिश करेगी।

 

- अभिनय आकाश

 

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