1947 के पहले ही कुछ दिनों के लिए स्वतंत्र होने वाले नंदीग्राम की कहानी

By अभिनय आकाश | Mar 31, 2021

सिंगूर और नंदीग्राम ये दो ऐसे कंधे हैं जिनपर चढ़कर ममता बनर्जी ने 2011 में उस लाल दुर्ग को ध्वस्त कर दिया, जिसपर वाम मोर्चा 34 साल से काबिज था। टाटा मोटर्स एक प्लांट लगाना चाहती थी सिंगूर में और वहां उन्होंने भूमि अधिग्रहण भी कर लिया था। लेकिन फिर जिन लोगों की भूमि अधिग्रहित की गई थी उनके साथ मिलकर ममता बनर्जी ने आंदोलन छेड़ा, विरोध प्रदर्शन किया और अंतत: टाटा मोटर्स को वो जगह खाली करनी पड़ी। सिंगूर की तरह नंदीग्राम में ममता बनर्जी ने नंदीग्राम से कृषि भूमि अधिग्रहण के खिलाफ आंदोलन शुरू कर दिया था। जनवरी 2007 के महीने सीपीएम प्रदर्शनकारियों और टीएमसी कार्यकर्ताओं के बीच हिंसक झड़प हुई। 14 मार्च 2007 का दिन था जब नंदीग्राम में 14 लोग पुलिस फायरिंग के शिकार हो गए थे।  सिंगूर और नंदीग्राम ने ममता को गांव-गांव तक पहुंचा दिया जिसका असर 2009 के लोकसभा चुनाव में दिखा जब ममता को जबरदस्त कामयाबी हासिल हुई। 2011 के विस चुनाव में ममता ने मां,माटी और मानुष का नारा दिया और 34 सालों से चली आ रही वामपंथ सरकार को उखाड़ फेका। लेकिन जिस नंदीग्राम ने ममता को राजनीति के गलियारों तक पहुंचाया और सत्ता का स्वाद भी चखाया। उसी नंदीग्राम में तृणमूल बैकफुट पर नजर आ रही है। ममता बनर्जी के घनिष्ठ सहयोगी और नंदीग्राम आंदोलन के अगुवा शुभेंदु अधिकारी के टीएमसी छोड़कर बीजेपी में शामिल होने के बाद से लगातार नंदीग्राम में टीएमसी और बीजेपी में हिंसक संघर्ष भी बढ़ गए हैं और सियासी आरोप-प्रत्यारोप भी अपने चरम पर है। आज के इस विश्लेषण में बात नंदीग्राम की करेंगे, इसके इतिहास की करेंगे और 2007 में हुए पुलिस फायरिंग की करेंगे जिसमें हुई 14 लोगों की मौत ने अंतरराष्ट्रीय सुर्खियां बटोरी थी। 

नंदीग्राम महज एक गांव नहीं, बल्कि बंगाल की राजनीति में बदलाव का प्रतीक है। पश्चिम बंगाल के राजनीतिक इतिहास में भी इसका महत्वपूर्ण स्थान है। स्वतंत्रता के पहले भी नंदीग्राम ने अपने उग्र आंदोलन के कारण ब्रिटिश शासन को झुकाने में सफल रहा था। नंदीग्राम को अंग्रेजों से दो बार आजादी मिली। 1947 में देश की स्वतंत्रता से पहले तामलुक को अजय मुखर्जी, सुशील कुमार धारा, सतीश चंद्र सामंत और उनके मित्रों ने नंदीग्राम के निवासियों की सहायता से अंग्रेजों से कुछ दिनों के लिए मुक्त कराया था और ब्रिटिश शासन से इस क्षेत्र को मुक्त करा लिया था। 

वामपंथियों के उद्योग विरोधी छवि बदलने की कोशिश बुद्धदेव भट्टाचार्य ने की

2007 में जब नंदीग्राम में हिंसा हुई तब राज्य में वाम मोर्चे की सरकार थी और मुख्यमंत्री थे बुद्धदेव भट्टाचार्य। उन्होंने वर्ष 2000 में तब वाम मोर्चे की सत्ता की  बागडोर संभाली जब 1977 से मुख्यमंत्री रहे ज्योति बसु ने 86 साल की उम्र में जिम्मेदारी से हटने का फैसला किया। बुद्धदेव भट्टाचार्य ने वामपंथियों के उद्योग विरोधी होने की छवि को बदलने की कोशिश की। इसी के तहत 2005 में जब भारत सरकार ने देश भर में केमिकल हब बनाने का विचार किया तो नंदीग्राम का भी नाम आया। जिसके बाद ये तय किया गया कि बंदरगाह वाले औद्योगिक शहर हल्दिया के पास स्थित नंदीग्राम को एक पेट्रोलियम, केमिकल और पेट्रोकेमिकल क्षेत्र तथा एक विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईजेड) के रूप में विकसित किया जाएगा। बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार 14 हजार एकड़ में विकसित होने वाले केमिकल हब के लिए बुद्धदेव भट्टाचार्य की सरकार ने इंडोनेशिया की दिग्गज औद्योगिक कंपनी सलीम ग्रुप से निवेश हासिल किया। मगर इस प्रोजेक्ट को लेकर नंदीग्राम के किसानों के मन में आशंकाएं पैदा होने लगी। उन्हें लगने लगा कि सरकार पुलिस और अपने समर्थकों के जोर पर जबरन उनकी जमीन ले लेगी। जिसके बाद कांग्रेस का दामन थाम गठबंधन कर 2004 का लोकसभा और 2006 का विधानसभा चुनाव लड़ने वाली ममता चुनाव में मिल रही असफलता के बाद किसानों के विरोध को एक आंदोलन की शक्ल दी। नंदीग्राम में पार्टी के समर्थकों नेताओँ ने विरोधी किसानों का एक संगठन खड़ा कर दिया जिसका नाम रखा गया- भूमि उच्छेद प्रतिरोध समिति। जनवरी 2007 से बात बढ़ने लगी और जनवरी से मार्च के बीच कई बार पुलिस और सत्ताधारी दल के सदस्यों और ग्रामीणों के बीच संघर्ष हुआ। 

पुलिस फायरिंग में गई 14 लोगों की जान

सत्तारूढ़ पार्टी के वरिष्ट नेताओं ने सभी विपक्षियों की उपेक्षा करते हुए इस आंदोलन को औद्योगीकरण के खिलाफ करार घोषित किया और हालात तब और बिगड़े जब समीप के हल्दिया के तात्कालीन एमपी लक्ष्मण सेठ के नेतृत्व में हल्दिया डेवलपमेंट अथॉरिटी ने भूमि अधिग्रहण के लिए नोटिस जारी कर दिया। इसके परिणाम स्वरूप सीपीआईएम और बीयूपीसी दोनों के समर्थकों के बीच हिंसात्मक संघर्ष की घटना घटी। सत्तारूढ़ पार्टी ने अपना पिछला प्रभुत्व जमाने की कोशिश की तो उसने नाकेबंदी को हटाने और परिस्थिति को सामान्य बनाने के बहाने अपने प्रशासन को कार्यप्रवृत्त किया। बंगाल के सीएम ने नंदीग्राम से प्रदर्शनकारियों को हटाने के लिए ढाई हजार पुलिसकर्मियों के दस्ते को नंदीग्राम भेजा। 14 मार्च 2007 की रात को पार्टी के कार्यकर्ताओं ने अपराधियों की सहायता से राज्य पुलिस के साथ मिलकर एक जॉइंट ऑपरेशन किया और 14 लोगों पुलिस फायरिंग का शिकार बन गए। 

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लेफ्ट ने गंवाई कुर्सी और सत्ता के शिखर पर पहुंची ममता

ममता बनर्जी के नेतृत्व में कई लेखकों, कलाकारों, कवियों और शिक्षा-शास्त्रियों ने पुलिस फायरिंग का कड़ा विरोध किया, जिससे परिस्थिति पर अन्य देशों का ध्यान आकर्षित हुआ। कलकत्ता उच्छ नायालय ने स्वत: संज्ञान लेते हुए घटना की सीबीआई जांच का आदेश दिया। परिणामस्वरूप सरकार को अपना फैसला बदलना पड़ा। बड़े पैमाने पर चले इस आंदोलन की वजह से ममता बनर्जी जनमानस में अपनी छवि बनाने में सफल रही और फिर पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज होने में भी सफल रहीं। 

नंदीग्राम में हर वोट कुछ कहता है

  • यहां 2,75,000 वोटर हैं 
  • नंदीग्राम विधानसभा पूर्व मेदिनीपुर जिले में आती है
  • विधानसभा दो भागों नंदीग्राम 1 और 2 में बंटी है
  • नंदीग्राम 1 में अल्पसंख्यकों की आबादी करीब 35 फीसदी है
  • नंदीग्राम 2 में अल्पसंख्य आबादी करीब 15 फीसदी है
  • पूरे विधानसभा में 70 प्रतिशत हिन्दू और 30 प्रतिशत मुस्लिम रहते है
  • 2011 में 60.2 % वोट के साथ टीएमसी की फिरोज बीबी जीती थीं
  • 2016 में टीएमसी के शुभेंदु अधिकारी 67.8 % वोट से जीते
  • नंदीग्राम वामपंथियों का और उससे पहले कांग्रेस का गढ़ था

नंदीग्राम आंदोलन के नायक शुभेंदु बने ममता विरोधी

जिस नंदीग्राम ने ममता को सत्ता की गलियारों तक पहुंचाया उसी नंदीग्राम आंदोलन के नायक शुभेंदु अधिकारी ने 2021 के विधानसभा चुनाव के पहले ममता बनर्जी का साथ छोड़ बीजेपी में शामिल हो गए। शुभेंदु अधिकारी नंदीग्राम से ममता बनर्जी को चुनौती दे रहे हैं। वैसे तो बड़े नेता को उसी के पारंपरिक क्षेत्र से हराने की चाह सभी दलों की होती है। 2014 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में नई नवेली आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की दिग्गज नेता और सीएम शीला दीक्षित को नई दिल्ली सीट से चुनौती देने का फैसला किया। उस वक्त बहुतों ने इसे केजरीवाल की बेवकूफी कहा, पर केजरीवाल जीत गए और दिल्ली का राजनीतिक इतिहास ही पूरी तरह से बदल गया। वहीं कांग्रेस पार्टी का अस्तित्व दिल्ली में खतरे में आ गया है। ऐसा ही कुछ बीजेपी की तरफ से गांधी परिवार का गढ़ माने जाने वाले अमेठी में किया। हालांकि अपने पहले प्रयोग में बीजेपी सफल नहीं रही पर 2019 के चुनाव में राहुल अमेठी से चुनाव हार गए। वैसे एक बात और है कि राहुल गांधी की तरह ममता बनर्जी भी दो जगहों से चुनाव लड़ सकती थीं लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। बहरहाल, नंदीग्राम के सियासी संग्राम का परिणाम क्या होगा ये तो पता नहीं लेकिन बंगाल में पहले लोगों की नजर कोलकाता में रहती थी कि राजनीतिक दल क्या कर रहे हैं। लेकिन इस बार के पूरे बंगाल चुनाव का ऐपिसेंटर नंदीग्राम हो गया। ऐसे में कयास ये लगाए जा रहे है कि क्या एक बार फिर से नंदीग्राम पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन का कारण बनेगा।- अभिनय आकाश

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