Gyan Ganga: रावण ने जब श्रीराम के बारे में गलत बात बोली, तब अंगद ने लंकेश को कैसे धोया था?

By सुखी भारती | Jul 06, 2023

वीर अंगद रावण की सभा में सिंह की भाँति, रावण को लताड़ रहे हैं। लेकिन रावण है कि उसे स्वयं के बल का बखान करने की ही धुन चढ़ी हुई है। उसकी मति इस स्तर पर विकृत हो चुकी है, कि उसे विधाता ने कितना समय पूर्व ही यह दिखा दिया था, कि उसकी मृत्यु मानव शरीर धारी से ही होगी। लेकिन रावण अहँकार में इतना मंदबुद्धि हो चुका है, कि उसे विधाता में ही खोट प्रतीत हो रहा है। तभी तो वह कह रहा है, कि बुढ़ापे में विधाता का दिमाग काम नहीं कर रहा। तभी वह मेरे बारे में कुछ भी अनाप-शनाप लिख गया। रावण वीर अंगद को भी अपशब्द बोलता हुआ कहता है, कि वीर अंगद को मेरे समक्ष, मेरे ही शत्रु की प्रशंसा करते हुए, क्या लज्जा नहीं आती?

इसे भी पढ़ें: Gyan Ganga: वीर अंगद के किन वचनों को सुनकर रावण आवेश में आ गया था?

रावण को यद्यपि अवगत ही था, कि वीर अंगद उस पर व्यंग्य कस रहे हैं। लेकिन वीर अंगद रावण को भला कहाँ कुछ बोलने का अवसर दे रहे थे। रावण, जो कि बार-बार यही ड़ीगें हाँक रहा था, कि उसने भगवान शिव को अपने सीस काट कर होम किए। और कैलास को अपने कँधों पर उठा कर नाचा। तो वीर अंगद ने रावण के इसी दावे की ऐसी छीछा लीदर की, कि रावण की बख्खियां उधड़ गई। जी हाँ, वीर अंगद दहाड़ते हुए बोले-

‘सुन मतिमंद देहि अब पूरा।

काटें सीस कि होइअ सूरा।।

इंद्रजालि कहुँ कहिअ न बीरा।

काटइ निज कर सकल सरीरा।।’

वीर अंगद बोले, कि अरे मंद बुद्धि! सुन अब बस कर। अपना सिर काटने से भी भला कोई शूरवीर बन जाता है? इंद्रजाल काटने वाला भी तो, स्वयं से ही, अपना सीस कई बार काट डालता है। लेकिन इसी से कोई उसे वीर की संज्ञा थोड़ी न दे देता है? रही बात तुम्हारे भुजाओं के बल की। तो तब तुम्हारी भुजाओं का बल उस समय किधर गया था, जब तुमने स्हस्त्रबाहु, बलि और बालि से दो-दो हाथ किए थे?

वीर अंगद तो मानों अपनी पूरी तरंग में आ चुके थे। तभी तो वे रावण के सीस पर अपने शब्दों के हलके-फुलके बाण नहीं, अपितु बड़े-बड़े लोहे के घण चला रहे थे। रावण जो बार-बार यह डींग हाँक रहा था, कि उसने कैलास पर्वत को अपने कँधों पर उठाया था, उस दावे का तो, वीर अंगद ने भयँकर ही उपहास बनाया। वे बोले-

‘जरहिं पतंग मोह बस भार बहहिं खर बृंद।

ते नहिं सूर कहावहिं समुझि देखु मतिमंद।।’

अर्थत अरे मंद बुद्धि! समझकर देख। पतंगे मोहवश आग में जल मरते हैं, गदहों के झुंड बोझ लादकर चलते हैं। पर इस कारण वे कोई शूरवीर नहीं बन जाते।

वीर अंगद ने रावण की तुलना एक क्षुद्र से पतंगे, एवं मूर्ख गधे से कर डाली। लेकिन मजाल है, कि रावण चूँ भी कर पाता?

रावण ने श्रीराम जी के संबंध में यह कहा था, कि क्या राम को लज्जा नहीं आती, कि बार-बार वह अपने दूतों को भेजता है? तो वीर अंगद ने इस बात पर भी रावण को खूब धोया। वीर अंगद बोले, कि अरे दुष्ट रावण! यह मत समझना, कि मैं दूत की भाँति तुम्हारे साथ कोई संधि करने आया हूँ। ऐसा विचार तो तुम, अपनी बुद्धि में भूल कर भी मत लाना। यह तो मैंने श्रीराम जी को बार-बार एक वाक्य कहते हुए सुना है, कि स्यार को मारने से सिंह की शोभा नहीं बढ़ती। तो प्रभु के उन्हीं शब्दों को याद करके ही मैं तेरे कठोर दुर्वचन सहन कर रहा हूँ। लेकिन अब मेरे मुख से भी कठोर वचनों का लावा फूट रहा है। जो तुमसे शायद न सुनें जायें।

वीर अंगद रावण के साथ हो रही इस वार्ता के सबसे कड़वे व कठोर शब्द कहते हैं। वीर अंगद रावण को कौन से कठोर शब्द कहते हैं, जानेंगे अगले अंक में---(क्रमशः)---जय श्रीराम।

-सुखी भारती

प्रमुख खबरें

ऑरेंज कैप नहीं, IPL ट्रॉफी चाहिए: KKR के खिलाफ जीत के बाद गरजे Captain Shubman Gill

संसद का Budget Session समाप्त, महिला आरक्षण बिल अटका, जानें क्या रहा सत्र का लेखा-जोखा

Women Reservation Bill पर Rekha Gupta का हमला, महिला विरोधी रुख पर Opposition को घेरा

दोस्त भारत के लिए ऑस्ट्रेलिया ने बनाई डिफेंस पॉलिसी, 887 अरब डॉलर का मेगा प्लान!