By कमलेश पांडे | Jun 24, 2026
यदि व्यक्तिगत खुन्नस या संस्थागत रंजिश के चले आपके खिलाफ कोई भी व्यक्ति झूठी यानी फेक केस या F.I.R. दर्ज करवाता है तो उससे से कैसे बचें? इस बारे में वर्ष 2026 में क्या क्या कानून हैं और इसके दृष्टिगत आपके क्या क्या अधिकार हैं, यह आपको अवश्य जानना, समझना चाहिए। आपको सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि कोई भी व्यक्ति पूरी तरह इस बात की गारंटी नहीं दे सकता कि उसके खिलाफ झूठी शिकायत या FIR दर्ज नहीं होगी। लेकिन कानून आपको ऐसे मामलों में कई महत्वपूर्ण सुरक्षा देता आया है।
यदि झूठी शिकायत की आशंका हो तो आप निम्नलिखित दो कदम उठाएं- (अ) सबूत पहले से सुरक्षित रखें: फोन कॉल रिकॉर्ड (जहां कानूनी रूप से अनुमत हो।) व्हाट्सऐप चैट, ईमेल, SMS, CCTV फुटेज, यात्रा, लोकेशन या उपस्थिति के रिकॉर्ड, बैंक लेन-देन के दस्तावेज आदि झूठे मामलों में अक्सर यही सबूत बाद में सबसे मजबूत रक्षा बनते हैं। और, (ब) विवाद को लिखित रूप में रखें: यदि किसी व्यक्ति से विवाद चल रहा है और वह झूठे मुकदमे की धमकी दे रहा है, तो उसके संदेश, ऑडियो, ईमेल आदि सुरक्षित रखें।
FIR दर्ज होना दोषी साबित होना नहीं है। भारत में अभियोजन पक्ष को अदालत में आरोप सिद्ध करने होते हैं। केवल FIR के आधार पर किसी को अपराधी नहीं माना जा सकता।
यदि आपको लगता है कि किसी गैर-जमानती अपराध में फंसाया जा सकता है, तो आप अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) के लिए आवेदन कर सकते हैं।
2026 में यह अधिकार भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 482 में है, जिसने पुराने CrPC की धारा 438 का स्थान लिया है। इसके तहत अदालत यह आदेश दे सकती है कि गिरफ्तारी होने पर आपको तुरंत जमानत पर छोड़ दिया जाए।
भारतीय संविधान के अनुसार: आपको अपने खिलाफ स्वयं गवाही देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। वकील की सहायता लेने का अधिकार है। गिरफ्तारी का कारण बताया जाना चाहिए। परिवार या मित्र को सूचना देने का अधिकार है। ये अधिकार व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े हैं।
यदि जांच या अदालत में मामला झूठा निकलता है, तो आप झूठी शिकायत करने वाले के खिलाफ कानूनी कार्रवाई कर सकते हैं। मानहानि (Defamation) का दावा कर सकते हैं। दुर्भावनापूर्ण अभियोजन (Malicious Prosecution) के आधार पर राहत मांग सकते हैं।
कुछ परिस्थितियों में पुलिस या न्यायालय के समक्ष प्रतिवाद प्रस्तुत कर सकते हैं।
यदि FIR में लगाए गए आरोप पहली नजर में ही अपराध नहीं बनाते, या मामला स्पष्ट रूप से दुर्भावनापूर्ण प्रतीत होता है, तो संबंधित उच्च न्यायालय से FIR रद्द कराने (quashing) की मांग की जा सकती है। कई मामलों में अदालतें ऐसी राहत देती रही हैं।
आज किसी भी थाने में Zero FIR दर्ज कराई जा सकती है, भले ही घटना उस थाने के क्षेत्राधिकार में न हुई हो। और बाद में मामला संबंधित थाने को भेजा जाता है। इसलिए केवल यह तर्क कि "घटना यहां नहीं हुई" FIR दर्ज होने से नहीं रोकता।
अनुभव बताता है कि निम्न प्रकार के मामलों में आरोप लगते ही कानूनी सलाह लेना उचित होता है: यथा- दहेज/वैवाहिक विवाद, यौन अपराध संबंधी आरोप, SC/ST अत्याचार अधिनियम, वित्तीय धोखाधड़ी, साइबर अपराध और राजनीतिक या सामाजिक प्रतिद्वंद्विता वाले मामले, आदि में गिरफ्तारी, जांच और जमानत के नियम अलग-अलग हो सकते हैं। लिहाजा, उन्हें समझकर अत्यावश्यक कदम उठाएं।
अंततोगत्वा यह कहा जा सकता है कि किसी भी प्रकार के फेक FIR से बचने का सबसे प्रभावी तरीका है कि अपने व्यवहार और लेन-देन का रिकॉर्ड रखें। साथ ही धमकियों या विवादों के सबूत सुरक्षित रखें। अपने विरुद्ध FIR दर्ज होते ही किसी अनुभवी वकील से संपर्क करें। और, आवश्यकता होने पर BNSS की धारा 482 के तहत अग्रिम जमानत लें। वहीं, यदि मामला झूठा है तो हाई कोर्ट में FIR रद्द कराने और झूठी शिकायतकर्ता के विरुद्ध कार्रवाई का विकल्प भी उपलब्ध है, इसका सहारा लें, ताकि अगले को सबक मिले। ध्यान रहे कि यह सामान्य कानूनी जानकारी है। इसलिए किसी विशिष्ट FIR या मामले में अधिकार और रणनीति अपने ऊपर लगे आरोपों, राज्यवार अलग-अलग कानूनों तथा तथ्यों पर निर्भर करेगी।
- कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार