By राकेश सैन | Jun 22, 2020
रूस में साम्यवाद के अंत के बाद दुनिया ने कितनी राहत की सांस ली उसकी कल्पना वही पीढ़ी कर सकती है जिसने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया में चार दशकों तक चले शीतयुद्ध में रूसी खेमे और अमेरिकी खेमे की तनातनी को झेला। रूसी साम्यवाद के पतन में आंतरिक परिस्थितियां तो जिम्मेवार थी हीं परंतु वहां इस फासिस्ट विचारधारा के उन्मूलन में विश्व समुदाय ने जो भूमिका निभाई उसको भी विस्मृत नहीं किया जा सकता। लेकिन दुर्भाग्य कि आधुनिकता व लोकतांत्रिक व्यवस्था की ओर बढ़ रहा आधुनिक समाज चीन में ऐसा करने में चूक गया और उसी की विभीषीका झेलने को विवश हो रहा है। अगर चीन में उठी लोकतंत्र की आवाज को विश्व समुदाय जिसमें सबसे बड़ी जिम्मेवारी हम भारतीयों की थी, नजरअंदाज न करता तो शायद आज दुनिया ड्रैगन जनित वर्तमान खतरों से मुक्त होती। न तो भारत को घेरने की 'स्टिंग आफ पर्ल्स' की रणनीति होती और न ही बेल्ट ऐंड रोड योजना के जरिये वैश्विक संसाधनों पर नियंत्रण का अभियान चलता। वैश्विक विरोध के बावजूद चीन सागर पर चीनी सेना का वर्चस्व कायम न हो पाता। हमने देखा है कि साम्यवादी सोवियत रूस के विखंडन के बाद दुनिया एक बेहतरी की ओर बढ़ी है। चीन का लोकतंत्र की दिशा में बढ़ने को बाध्य होना विश्व के लिए एक शुभ समाचार होता। चीन यदि लोकतांत्रिक देश होता तो आज तिब्बत की यह दशा न होती। भारत के साथ गढ़े गए सीमा विवाद न होते। 'पंचशील' समझौते का सम्मान होता। जिस तरह चीन अपनी भौगोलिक विस्तरवादी नीति के चलते भारत समेत अपने पड़ोसी देशों और हड़पने वाली आर्थिक नीतियों के चलते गरीब देशों के लिए खतरा बनता जा रहा है उससे निपटने के लिए माओ जेत्सुंग की कंटीली जमीन पर लोकतंत्र के पुष्प पल्लवित होने जरूरी हैं। लोकतंत्र की बसंत चीन को उसकी नीतियों की अमानवीयता से अवश्य मुक्त कर देगी।
प्रसन्नता की बात है कि चीन में साम्यवादी कंस अभी तक लोकतंत्र रूपी कृष्ण के वध में सफल नहीं हो पाया है। थियानमेन चौक, 2014 के छात्र आंदोलन और हांगकांग के लोकतंत्र के संघर्ष से जगी भावना अभी जिंदा है, मरी नहीं। आंदोलनकारी आज भी लिबरेट हांगकांग के प्लेकार्ड लिए कहीं-कहीं दिख जाते हैं जो दुनिया को यह कहते हुए महसूस होते हैं कि उनकी आवाज भी विश्व मंचों पर उठाई जाए। लोकतांत्रिक चीन अभी बहुत दूर की परिकल्पना है, लेकिन विचारों की शक्तियों को एक सीमा से अधिक नियंत्रित कर पाना संभव नहीं होता। जनांदोलन अपनी विराटता में बहुत कुछ समेट लेते हैं। हमारे सामने वह घट जाता है जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की होती। चीन जैसे गैर-जिम्मेदार साम्यवादी देश का आर्थिक व सामरिक रूप से शक्तिशाली होना मानवता के लिए अशुभ है लेकिन कोई ये भी कामना नहीं कर सकता कि दुनिया का कोई देश गरीबी से मुक्त न हो। इसके लिए यही प्रयास किए जा सकते हैं कि उस देश का नेतृत्व वैश्विक शांति व सह-अस्तित्व के लोकतांत्रिक सिद्धांतों को मानने वाला हो जो केवल एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में ही संभव है। मानव भक्षी साम्यवादी विचारधारा से मुक्त लोकतांत्रिक चीन केवल एशिया या हमारे लिए ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए भी कल्याणकारी साबित होगा।
-राकेश सैन