By अंकित सिंह | Apr 02, 2026
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने प्रस्तावित विधेयक के माध्यम से केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (सीएपीएफ) के खिलाफ भेदभाव को कानूनी रूप से लागू करने का आरोप सरकार पर लगाया है। गांधी ने कहा कि सत्ता में आने पर उनकी पार्टी इस 'भेदभावपूर्ण कानून' को रद्द कर देगी। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सीएपीएफ कर्मियों को नेतृत्व के वे अवसर मिलने चाहिए जो पहले आईपीएस अधिकारियों के लिए आरक्षित थे।
राज्यसभा ने बुधवार को विधेयक को ध्वनिमत से पारित कर दिया। सरकार का कहना है कि यह कानून बनने के बाद इन बलों का बेहतर प्रबंधन होगा और कार्यकुशलता बढ़ेगी। राहुल गांधी ने पिछले दिनों सीआरपीएफ के एक घायल जवान से मुलाकात का उल्लेख करते हुए ‘एक्स’ पर पोस्ट किया कि असिस्टेंट कमांडेंट अजय मलिक जी ने नक्सली मुठभेड़ के दौरान आईईडी विस्फोट में अपना एक पैर खो दिया, देश की रक्षा में सब कुछ दांव पर लगा दिया। और इस बलिदान के बदले मिला क्या? उन्होंने कहा कि 15 साल से अधिक की निष्ठापूर्ण सेवा के बावजूद, पदोन्नति नहीं, अपनी ही बल का नेतृत्व करने का अधिकार नहीं, क्योंकि सभी शीर्ष पद आईपीएस अफसरों के लिए आरक्षित हैं। यह सिर्फ एक अफसर की पीड़ा नहीं, यह लाखों सीएपीएफ जवानों के साथ हो रहा संस्थागत अन्याय है।
कांग्रेस नेता ने कहा कि ये जवान सीमाओं पर तैनात रहते हैं, आतंक और नक्सलवाद से लोहा लेते हैं, लोकतंत्र के उत्सव चुनावों को सुरक्षित बनाते हैं। लेकिन जब इनके अधिकार और सम्मान की बात आती है, तो व्यवस्था मुंह फेर लेती है। उन्होंने दावा किया कि खुद सीएपीएफ के जवान इस भेदभाव के विरुद्ध हैं, उच्चतम न्यायालय तक ने इस व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं, फिर भी, वर्तमान सरकार इसी अन्याय को कानूनी रूप से स्थायी बनाने पर आमादा है। राहुल गांधी ने कहा कि यह विधेयक केवल एक करियर को अवरुद्ध करने का प्रयास नहीं, यह उन लोगों का मनोबल तोड़ने की कोशिश है जो देश की पहली रक्षा पंक्ति हैं। और जब उनका मनोबल टूटता है, तो राष्ट्रीय सुरक्षा की नींव हिलती है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘हम सीएपीएफ के जवानों का सम्मान सिर्फ शब्दों में नहीं, नीतियों में करते हैं। कांग्रेस का साफ वादा है कि हमारी सरकार आते ही यह भेदभावपूर्ण कानून समाप्त होगा, क्योंकि जो देश के लिए लड़ता है, उसे नेतृत्व का अधिकार मिलना ही चाहिए।