By रेनू तिवारी | Jul 10, 2026
एक समय था जब बॉलीवुड सस्पेंस से भरी मर्डर मिस्ट्री बनाने में माहिर था। चाहे अब्बास-मस्तान की ज़बरदस्त थ्रिलर हों या 'गुप्त' और 'इत्तेफ़ाक' जैसी फ़िल्में, दर्शक न सिर्फ़ यह जानने में दिलचस्पी रखते थे कि कातिल कौन है, बल्कि यह भी कि घटनाक्रम कैसे आगे बढ़ता है। ऐसी फ़िल्में दर्शकों को आखिर तक उलझाए रखती थीं। लेकिन सिनेमा बदल गया है और आज के दर्शक कहीं ज़्यादा पेचीदा लीगल ड्रामा और बेहतरीन क्राइम थ्रिलर देख चुके हैं। इस वजह से सिद्धार्थ पी. मल्होत्रा की 'इक्का' ऐसी फ़िल्म लगती है जो कम से कम दो दशक देर से आई है।
फिल्म रिव्यू: 'इक्का' (Ikka)
कलाकार: सनी देओल, अक्षय खन्ना, आकांक्षा रंजन कपूर और अन्य
निर्देशक: सिद्धार्थ पी मल्होत्रा
रेटिंग: 2.5/5
क्या है फिल्म की कहानी?
फिल्म की शुरुआत काफी सस्पेंस के साथ होती है। सोमा (आकांक्षा रंजन कपूर) को शौर्यमान (अक्षय खन्ना) के साथ नाइट आउट एन्जॉय करते देखा जाता है, लेकिन कुछ ही पलों बाद उसे एक तेज रफ्तार लग्जरी कार से बाहर फेंक दिया जाता है। सड़क किनारे गंभीर रूप से घायल मिली सोमा का यह मामला देखते ही देखते रसूख, राजनीति और सत्ता के खेल में बदल जाता है।
तभी एंट्री होती है अर्जुन (सनी देओल) की, जो एक मशहूर डिफेंस लॉयर (बचाव पक्ष के वकील) हैं। अर्जुन अदालत में उसी नैतिक दृढ़ता के साथ कदम रखते हैं, जिसने कभी फिल्म 'दामिनी' में उनके किरदार को आइकॉनिक बनाया था। अपने शुरुआती तर्कों में वे बात करते हैं कि कैसे ताकत और क्लास अक्सर न्याय को प्रभावित करते हैं। वे वकीलों की उस छवि पर भी प्रहार करते हैं जिसमें माना जाता है कि वकील सिर्फ पैसे के पीछे भागते हैं। फिल्म का एक डायलॉग ध्यान खींचता है— "कानून और न्याय हमेशा एक जैसे नहीं होते।"
इसके समानांतर अर्जुन की निजी जिंदगी की कहानी चलती है। उनकी बेटी, जो एक होनहार तैराक (Swimmer) है, एक महत्वपूर्ण सिलेक्शन ट्रायल के दौरान अचानक उसकी नाक से खून बहने लगता है। अगर आपने 90 के दशक की बॉलीवुड फिल्में देखी हैं, तो डॉक्टर के यह कहते ही कि उसे एक जानलेवा बीमारी है और इलाज के लिए माता-पिता में से किसी एक के स्टेम सेल्स की जरूरत होगी, आप अगली पूरी कहानी का अंदाजा आसानी से लगा लेंगे।
पुराना मिजाज और किरदारों का टकराव
फिल्म में यह देखना काफी अजीब और थोड़ा हास्यास्पद है कि इस उम्र में अक्षय खन्ना एक शक्तिशाली राजनेता के बिगड़ैल बेटे का किरदार निभा रहे हैं। वह एक ऐसा प्रिविलेज्ड मैन-चाइल्ड है जो रातों को दूसरी महिलाओं के साथ पार्टियां करता है, जबकि उसकी पत्नी घर पर उसका इंतजार करती है। जब उसका केस अर्जुन के पास आता है, तो अतीत के कुछ कड़वे अनुभवों के कारण अर्जुन पहले तो मना कर देते हैं, लेकिन बेटी के इलाज के हालात उन्हें यह केस लड़ने पर मजबूर कर देते हैं। इसके बाद शुरू होती है व्यक्तिगत इतिहास और सबूतों के बीच की कोर्टरूम जंग।
फिल्म एक दिलचस्प मोड़ तब लेती है जब सनी देओल का किरदार एक कथित बलात्कारी का केस लड़ रहा होता है। लेकिन 'दामिनी' की ही तरह, अर्जुन अपनी टीम को पीड़िता के चरित्र हनन की इजाजत नहीं देते। जब एक गवाह ऐसा करने की कोशिश करता है, तो सनी देओल अपने सिग्नेचर 'एंग्री यंग मैन' मोड में आ जाते हैं और अदालत में उनका चिल्लाना दर्शकों को सीधे 90 के दशक के सिनेमा की याद दिला देता है।
दूसरी तरफ, अक्षय खन्ना को देखकर ऐसा लगता है कि मानो उनके पुराने 'रहमान डकैत' वाले किरदार को ही इस फिल्म में डाल दिया गया हो। वही डार्क वार्डरोब, बात करने के बीच में ठहराव, तिरछी नजरें, थोड़ा झुककर चलना और हर वक्त का अहंकार। एक सीन में तो बैकग्राउंड डांसर उनका वही पुराना वायरल डांस स्टेप करता दिखता है, जिससे साफ है कि मेकर्स उनके पुराने स्क्रीन स्वैग को भुनाना चाहते थे।
निर्देशन और स्क्रीनप्ले में कहां रह गई कमी?
फिल्म अपने आखिरी घंटे में कई ट्विस्ट और टर्न्स लाती है और दर्शकों को हर देखे हुए सीन पर शक करने को मजबूर करती है। लेकिन स्क्रीनप्ले इन खुलासों को जितना मास्टरस्ट्रोक दिखाना चाहता है, दर्शक उन्हें बहुत पहले ही भांप लेते हैं। यहां तक कि क्लाइमेक्स, जिसे बेहद चौंकाने वाला बनाने की कोशिश की गई थी, पूरी तरह प्रेडिक्टेबल (अनुमानित) साबित होता है।
डायरेक्टर सिद्धार्थ पी. मल्होत्रा एक ही फिल्म में बहुत कुछ भरने की कोशिश करते हैं। इसमें कोर्टरूम ड्रामा, मर्डर मिस्ट्री, परिवार का इमोशनल पहलू और यहाँ तक कि विशेषाधिकार और न्याय पर टिप्पणी भी है। अलग-अलग तौर पर देखें तो हर आइडिया अच्छा है, लेकिन एक साथ वे ध्यान खींचने के लिए होड़ करते हैं। फिल्म यह तय किए बिना कि वह असल में क्या बनना चाहती है, बार-बार अपनी दिशा बदलती रहती है, जिससे कहानी दिलचस्प लगने के बजाय बिखरी-बिखरी सी लगती है।
जैसा कि इसके टाइटल से पता चलता है, फिल्म को लगता है कि उसके पास आखिर तक 'इक्का' (सबसे मज़बूत पत्ता) है। बदकिस्मती से, जब तक वह पत्ता टेबल पर आता है, दर्शक पहले ही बाज़ी समझ चुके होते हैं। शानदार कास्ट और दिलचस्प कहानी के बावजूद, मल्होत्रा की थ्रिलर कभी भी जीत दिलाने वाला दांव नहीं चल पाती। जो फिल्म एक दिलचस्प लीगल थ्रिलर बन सकती थी, वह आखिर में एक जानी-पहचानी कहानी और बहुत आसानी से अंदाज़ा लगाने लायक अंत वाली फिल्म बनकर रह जाती है।
क्यों देखें: अगर आप सनी देओल के पुराने 'दामिनी' वाले अंदाज और अक्षय खन्ना के विलेन वाले तेवर के शौकीन हैं, तो इसे एक बार देख सकते हैं।