Explained | दुश्मन सावधान! भारत की संप्रभुता की रक्षा करेंगे स्वदेशी ड्रोन...'ड्रोन शक्ति' से सीमाओं को अभेद्य बनाने में जुटीं भारत की तीनों सेनाएँ

By रेनू तिवारी | Oct 30, 2026

भूटान के ऊंचाई वाले इलाके में एक बड़ी ग्लेशियल झील (GLOF) फटने से असम और उत्तर बंगाल में बाढ़ की चेतावनी; कई जिले हाई अलर्ट पर... इस तरह की भौगोलिक और प्राकृतिक आपदाओं के बीच आधुनिक युद्ध के तौर-तरीके भी तेजी से बदल रहे हैं। अब जंग के मैदान में केवल पारंपरिक हथियार ही नहीं, बल्कि आसमान में उड़ने वाले मानवरहित ड्रोन (UAV) सबसे बड़ी ताकत बनकर उभर रहे हैं। अक्टूबर के दौरान, यूक्रेन के साथ चल रहे चार साल के युद्ध के दौरान रूस ने अपनी एक नई तकनीकी उपलब्धि पेश की- 'फिलिन' (यूरेशियन ईगल-उल्लू)। यह ज़मीन से लॉन्च होने वाला, जेट इंजन से चलने वाला एक ड्रोन है, जो 800 किमी प्रति घंटे की रफ़्तार से दिल्ली-मुंबई के बीच की लगभग 1,200 किलोमीटर की हवाई दूरी तय कर सकता है।

भारतीय वायु सेना (IAF) जेट-संचालित ड्रोन्स की 'फोर्स-मल्टीप्लायर' (ताकत कई गुना बढ़ाने वाली) क्षमताओं से अच्छी तरह वाकिफ है। इसी को देखते हुए, अगस्त 2024 में वायु सेना ने 'वेदा एयरोनॉटिक्स' द्वारा बनाए गए 200 'सुरेशास्त्र स्मार्ट अनमैन्ड म्यूनिशन सिस्टम' (S-UMS) का ऑर्डर दिया। अब, आने वाले कुछ हफ़्तों में, भारतीय सेना एक दर्जन भारतीय कंपनियों के जेट-संचालित 'कामिकेज़' (आत्मघाती) ड्रोन्स का परीक्षण शुरू करेगी।

सेना की योजना ऐसे 540 हाई-स्पीड ड्रोन खरीदने की है, जो इस श्रेणी के हथियारों की अब तक की सबसे बड़ी खरीद होगी। पिछले साल हुए 'ऑपरेशन सिंदूर' के बाद से यह ड्रोन्स की सबसे बड़ी खरीद है। एयर चीफ मार्शल एपी सिंह के शब्दों में कहें तो, इस ऑपरेशन के दौरान ड्रोन केवल 'आसमान में आँखें' (निगरानी करने वाले) होने से बदलकर 'आसमान में पंजे' (हमला करने वाले) बन गए।

88 घंटे तक चले इस संघर्ष को दुनिया के उन पहले उदाहरणों में गिना जा सकता है, जहाँ बिना आमने-सामने की लड़ाई (non-contact kinetic warfare) के युद्ध लड़ा गया—यानी विरोधी पक्ष ने लड़ाई के लिए सीमा पार नहीं की। सेना के ड्रोन्स ने पाकिस्तान के आतंकी प्रशिक्षण शिविरों को निशाना बनाया, वायु सेना की ब्रह्मोस मिसाइलों ने रनवे को तबाह कर दिया और विमानों समेत हैंगरों को नष्ट कर दिया। वहीं, वायु सेना के 'हारोप' (Harop) वन-वे अटैक ड्रोन्स ने पाकिस्तान के रडार और कमांड पोस्ट्स पर हमला किया।

भारत का ड्रोन जखीरा तेज़ी से बढ़ रहा है। अगले पांच वर्षों में, तीनों सेनाएं कुल 1.5 लाख करोड़ रुपये (15 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक) मूल्य के ड्रोन हासिल करेंगी। यह रकम पारंपरिक हथियारों के लिए अब तक की सबसे बड़ी रक्षा डील—फ्रांस से 114 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद—की लागत का लगभग आधा है।

2010 के दशक में ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल के शामिल होने के बाद, जेट-पावर्ड ड्रोन तीनों सेनाओं की स्ट्राइक क्षमताओं में सबसे महत्वपूर्ण इजाफा हैं। अन्य खरीद में समुद्र तल से लेकर समताप मंडल (स्ट्रैटोस्फीयर) तक के सभी तरह के ऑपरेशन शामिल हैं। इनमें हाई एल्टीट्यूड स्यूडो सैटेलाइट्स (HAPS), हाई एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस (HALE) UAV, निगरानी मिशनों के लिए मीडियम एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस (MALE) UAV, कोलैबोरेटिव लॉन्ग रेंज डिस्ट्रक्टिव स्वार्म्स (CLRDS), और भारतीय वायु सेना (IAF) के कार्गो विमानों से लॉन्च किए जाने वाले जेट-पावर्ड कैनिस्टराइज्ड ड्रोन शामिल हैं। इनकी मदद से IAF तिब्बती पठार के भारी सुरक्षा वाले इलाकों के पार चीन में मौजूद लक्ष्यों को निशाना बना सकेगी। IAF अपने मानव-संचालित लड़ाकू विमानों के साथ मिलकर काम करने के लिए 60,000 करोड़ रुपये से अधिक की लागत वाले 100 से ज्यादा 'घातक' (Ghatak) स्टील्थ बॉम्बर ड्रोन हासिल करने की योजना बना रही है।

थल सेना की योजना 100,000 से अधिक ड्रोन ऑपरेटरों को प्रशिक्षित करने और तैनात करने की है, जो उसकी 385 इन्फैंट्री बटालियनों में शामिल किए गए निगरानी और स्ट्राइक ड्रोन को संचालित करेंगे। 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान, मिसाइल दागने वाली पहली सेना भारतीय नौसेना थी। अब नौसेना लंबी दूरी वाले जेट-पावर्ड ड्रोन की एक नई श्रेणी हासिल करने पर विचार कर रही है, जिनकी लागत जहाजों से दागी जाने वाली क्रूज मिसाइलों की तुलना में बहुत कम होगी। नौसेना अनमैन्ड सरफेस वेसल्स (USV) का एक बड़ा बेड़ा भी शामिल कर रही है, जो बारूदी सुरंगों को हटाने जैसे खतरनाक काम करेंगे और मिसाइलों तथा विस्फोटकों का इस्तेमाल करके दुश्मन के युद्धपोतों पर 'कामिकेज़' (आत्मघाती) हमले करेंगे।

ऐसा लगता है कि ड्रोन को सीधे बाजार से खरीद लेना तो आसान काम है। लेकिन असली ध्यान लॉजिस्टिक्स, कलपुर्जों, रणनीतियों और औद्योगिक क्षमता जैसे जटिल पहलुओं के बजाय, केवल युद्ध लड़ने की क्षमता (फाइटिंग एज) पर ही केंद्रित रहा है। गायब द्रव्यमान (मिसिंग मास)
28 फरवरी को शुरू हुए 40 दिनों के अमेरिका-ईरान संघर्ष के दौरान, ईरान ने सात खाड़ी अरब देशों में मौजूद अमेरिकी एयर बेस और बंदरगाहों पर कई हमले किए। अपनी वायु सेना और नौसेना की कमी को पूरा करने के लिए, उसने भूमिगत मिसाइल शहरों में जमा किए गए हजारों ड्रोन और मिसाइलों का इस्तेमाल किया। इस साल, रूस और यूक्रेन दोनों ही हर साल 60 लाख (6 मिलियन) से अधिक ड्रोन बनाने की तैयारी कर रहे हैं।

भारत के पास इतने बड़े औद्योगिक स्तर पर ड्रोन बनाने की क्षमता नहीं है, जिससे संघर्ष के समय उत्पादन को तेजी से बढ़ाया जा सके (जिसे 'सर्ज कैपेसिटी' कहते हैं)। भारत में रूस के तातारस्तान स्थित विशाल 'अलाबुगा कॉम्प्लेक्स' जैसी कोई फैक्ट्री नहीं है, जो हर साल 36,000 से अधिक 'शहेद' (Shahed) प्रकार के ड्रोन तैयार करती है।

ऐसा इसलिए है क्योंकि भारत को मिलने वाले ड्रोन के ऑर्डर बहुत छोटे होते हैं। उदाहरण के लिए, 540 ड्रोन का ऑर्डर मिलने पर निर्माता उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए निवेश नहीं कर सकते, क्योंकि आगे और ऑर्डर मिलने की कोई गारंटी नहीं होती। इन छोटे ऑर्डरों का एक कारण यह भी है कि सशस्त्र बल अभी भी ड्रोन को केवल एक 'खास क्षमता' (niche capability) के रूप में देखते हैं—यानी लक्ष्य पर हथियार गिराने का एक सस्ता तरीका—न कि एक ऐसी एकीकृत और नेटवर्क से जुड़ी प्रणाली के रूप में, जो पूरी सेना की ताकत को कई गुना बढ़ा सके।


अलग-अलग सेनाओं की अपनी-अपनी पहल ने घरेलू तकनीक के क्षेत्र में बेहतरीन प्रगति की है। 2018 में, भारतीय वायु सेना (IAF) की दूरदर्शी 'मेहर बाबा स्वार्म ड्रोन प्रतियोगिता' ने भारतीय उद्योगों के सामने 100 करोड़ रुपये के ऑर्डर का प्रस्ताव रखा। इससे कंपनियों का एक ऐसा समूह तैयार हुआ, जिसे अब तक 10,000 करोड़ रुपये से अधिक के ऑर्डर मिल चुके हैं।

रक्षा मंत्रालय की 'इनोवेशंस फॉर डिफेंस एक्सीलेंस' (IDEX) योजना, जिसे 2018 में शुरू किया गया था, ने भी इस इकोसिस्टम को बढ़ावा दिया है। इसी तरह, भारतीय नौसेना की 'SPRINT' और 'स्वावलंबन' जैसी पहलों ने भी स्वदेशी तकनीकी समाधान विकसित करने में मदद की है। लेकिन, ड्रोन हासिल करने और मानवरहित प्रणालियों (unmanned systems) को एक साथ जोड़ने के लिए एक एकीकृत (integrated) और व्यापक रणनीति के बिना, ये प्रयास नाकाफी हैं।

'ड्रोन फेडरेशन ऑफ इंडिया' के अध्यक्ष स्मित शाह कहते हैं, "समस्या यह है कि सैन्य ड्रोन की हर खरीद में केवल वर्तमान जरूरतों पर ध्यान दिया जाता है, भविष्य पर नहीं।" सरकार का ड्रोन पर जोर देखने में तो बड़ा लगता है, लेकिन यह अलग-अलग सेनाओं के अपने-अपने दायरे में बंटकर रह जाता है। हर सेना अपनी जरूरत के हिसाब से थोड़े-बहुत ड्रोन खरीदती है। केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPFs) और अर्धसैनिक बल भी अपने ड्रोन अलग से खरीदते हैं। सशस्त्र बलों के लिए ड्रोन के संयुक्त विकास का कोई रोडमैप नहीं है। चूंकि ऑर्डर बहुत कम संख्या में आते हैं और अक्सर 'आपातकालीन खरीद' (emergency procurement) के जरिए लिए जाते हैं, इसलिए कोई मजबूत औद्योगिक आधार नहीं बन पाता। पूर्व डायरेक्टर जनरल (आर्टिलरी) लेफ्टिनेंट जनरल पी.आर. शंकर कहते हैं, "छोटे-छोटे टुकड़ों में की गई खरीद से युद्ध के समय न तो मजबूती मिलती है और न ही तकनीक का विकास हो पाता है। इससे उद्योगों को वह निरंतर निवेश नहीं मिल पाता जिसकी उन्हें जरूरत होती है। न तो कोई मानक डिजाइन तैयार हो पाता है, न ही बड़े पैमाने पर उत्पादन हो पाता है और न ही अलग-अलग सेनाओं के ड्रोन आपस में तालमेल बिठाकर काम कर सकते हैं। नतीजा यह होता है कि आप किसी और की सप्लाई चेन में महज एक ग्राहक बनकर रह जाते हैं।"

एक ड्रोन डेवलपर इसे 'मुर्गी पहले आई या अंडा' वाली समस्या बताते हुए कहते हैं, "आप तभी बड़े पैमाने पर उत्पादन (scale-up) कर सकते हैं जब आप बड़े पैमाने पर बिक्री कर सकें। और अभी कोई भी बड़े पैमाने पर बिक्री करने की स्थिति में नहीं है।"

ऐसा लगता है कि जिन बड़े ऑर्डर्स से घरेलू औद्योगिक क्षमताएं विकसित हो सकती थीं, वे आयात (imports) के लिए आरक्षित कर दिए गए हैं। उदाहरण के लिए, 2024 में अमेरिका से 31 'MQ-9B' सशस्त्र UAV खरीदने के लिए 3.5 अरब डॉलर का सौदा किया गया—जो कि पिछले एक दशक में भारत द्वारा UAV खरीदने पर खर्च की गई कुल रकम से भी कहीं अधिक है। भारतीय सेना के 'हाई एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस' (HALE) और 'मीडियम एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस' (MALE) ड्रोन—ऐसे पायलट-रहित विमान जो हथियार और सेंसर लेकर लगभग 24 घंटे तक हवा में रह सकते हैं—पूरी तरह से इज़राइल और अमेरिका से आयात किए जाते हैं।

विशेषज्ञों का मानना ​​है कि भारत के विभिन्न ड्रोन कार्यक्रमों की समीक्षा करने की ज़रूरत है, ताकि युद्ध-स्तर पर इनके स्वदेशी विकल्प तैयार किए जा सकें। साथ ही, डेवलपर्स, उपयोगकर्ताओं और उत्पादन एजेंसियों को एक ही मंच पर लाने की आवश्यकता है।

रक्षा मंत्रालय के थिंक-टैंक 'मनोहर पर्रिकर-IDSA' के सीनियर फेलो, ग्रुप कैप्टन राजीव नारंग (रिटायर्ड) चेतावनी देते हैं, "HALE और MALE UAVs से जुड़े हमारे सभी बड़े ड्रोन कार्यक्रम अलग-अलग चल रहे हैं, जिनमें उपयोगकर्ताओं (सेना) की भागीदारी बहुत कम है। यही कारण है कि ये कार्यक्रम वर्षों से संघर्ष कर रहे हैं—सेना की ओर से केवल टेस्ट पायलट और तकनीकी ज़रूरतें (क्वालिटेटिव रिक्वायरमेंट्स) ही बताई जाती हैं, इसके अलावा कुछ नहीं। जिन बड़े ड्रोनों को वर्षों पहले सेना में शामिल हो जाना चाहिए था, वे अभी भी विकास के चरण में ही अटके हुए हैं। 'घातक' कार्यक्रम को अभी तक औपचारिक मंज़ूरी नहीं मिली है, और 'कावेरी' इंजन के संशोधित संस्करण को भी सेना में शामिल करने के लिए मंज़ूरी नहीं मिली है। इस तरह के अनिर्णय का हमारे ड्रोन कार्यक्रमों पर बुरा असर पड़ रहा है।"

पुर्जों पर निर्भरता
ड्रोन असल में उड़ने वाले कंप्यूटर होते हैं—ये एक फ्रेम, मोटर, प्रोपेलर और अलग-अलग सेंसर व ऑप्ट्रोनिक्स वाले फ्लाइट कंट्रोलर से मिलकर बने होते हैं। इन सभी पुर्जों पर चीन का दबदबा है; वह वैश्विक ड्रोन बाजार के 80 प्रतिशत से ज्यादा हिस्से को नियंत्रित करता है और अहम खनिजों व कच्चे माल की सप्लाई पर भी उसका ही कब्जा है। सुरक्षा चिंताओं के चलते, 2022 में भारत ने मिलिट्री-ग्रेड ड्रोन में चीनी पुर्जों के इस्तेमाल पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया था।

भारत के निजी क्षेत्र के ड्रोन इकोसिस्टम में 600 से ज्यादा ड्रोन और ड्रोन-पुर्जे बनाने वाली कंपनियां शामिल हैं, जो अब अहम पुर्जे अमेरिका और यूरोपीय सप्लायरों से मंगाती हैं।

जब कोई सेना ड्रोन के लिए टेंडर निकालती है, तो सबसे कम बोली लगाने वाला यानी 'L1' बनने की होड़ शुरू हो जाती है। इसके लिए डिजाइन और पुर्जे बाहर से मंगाए जाते हैं, उन्हें असेंबल किया जाता है और फिर सेना को सप्लाई कर दिया जाता है। प्रोपेलर, ब्रशलेस DC मोटर, कार्बन फाइबर, प्रिंटेड सर्किट बोर्ड और फ्रेम जैसे पुर्जों पर निर्भरता तो बस एक हिस्सा है।

इन पुर्जों के पीछे एक बड़ी समस्या 'चिप' की है—हमारे पास ऐसे स्वदेशी सेमीकंडक्टर नहीं हैं, जिनका डिजाइन और निर्माण पूरी तरह से अपनी तकनीक (IP) पर आधारित हो।

हर ड्रोन में 100 से ज्यादा चिप्स होती हैं, जो उड़ान, ऊंचाई को स्थिर रखने और मेमोरी जैसे कई कामों को नियंत्रित करती हैं। ड्रोन का आकार और उसकी जटिलता जितनी ज्यादा होती है, उसमें चिप्स की संख्या भी उतनी ही बढ़ जाती है।

हथेली के आकार वाले 'फर्स्ट-पर्सन व्यू' (FPV) ड्रोन में कम से कम 10 खास चिप्स होती हैं, जबकि विमान के आकार वाले MQ-9B ड्रोन में 1000 से ज्यादा चिप्स लगी होती हैं। भारत के लगभग सभी ड्रोन अमेरिका से आयातित चिप्स के सहारे उड़ते हैं, जो एक बहुत बड़ी कमजोरी है।

ड्रोन का दिमाग और केंद्रीय तंत्रिका तंत्र कहे जाने वाले 'फ्लाइट कंट्रोलर' भी या तो बाहर से मंगाए जाते हैं या फिर लाइसेंस के तहत बनाए जाते हैं—भारत की बहुत कम कंपनियां ही अपने खुद के फ्लाइट कंट्रोलर बनाती हैं।

ड्रोन के डिजाइन बाहर से मंगाने की वजह से उनके विकास (spiral development) में भी रुकावट आती है—जो कंपनियां ड्रोन को असेंबल करती हैं, वे इन प्लेटफॉर्म के बेहतर वर्जन तैयार नहीं कर पातीं। R&D (अनुसंधान और विकास) की कमी का मतलब है कि भारत इलेक्ट्रॉनिक्स के उन नए बदलावों से पीछे छूट सकता है, जो ज्यादा स्मार्ट ड्रोन बना रहे हैं। इनमें ऐसे स्वायत्त (autonomous) और AI-आधारित प्लेटफॉर्म शामिल हैं, जो टारगेट को लॉक करके हमला कर सकते हैं, या ऐसे ड्रोन जो रेडियो रिपीटर की मदद से क्षितिज के पार (over the horizon) भी काम कर सकते हैं।

 'माइक्रोचिप-आधारित हार्डवेयर का डिज़ाइन और निर्माण, साथ ही ड्रोन के लिए मोटर, फ्लाइट कंट्रोलर और कस्टमाइज़्ड, हैक न होने वाले पेलोड जैसे स्वदेशी पुर्ज़ों को तैयार करना बहुत ज़रूरी है। इस तरह के जटिल सिस्टम को बड़े पैमाने पर बनाने के लिए न केवल स्वदेशी चिप्स की ज़रूरत होगी, बल्कि अन्य स्वदेशी पुर्ज़ों के निर्माण की भी आवश्यकता होगी,' ऐसा मोबाइल एंड इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के कार्यकारी निदेशक और प्रधान सलाहकार, कर्नल अनुराग अवस्थी (रिटायर्ड) कहते हैं। 'इंडियन सेमीकंडक्टर मिशन' के तहत मंज़ूरी प्राप्त एकमात्र फैब (निर्माण इकाई) से पहले भारतीय सेमीकंडक्टर 2027 से 2029 के बीच ही बाहर आ पाएंगे। आने वाले वर्षों में ड्रोन इकोसिस्टम के लिए सेमीकंडक्टर चिप्स बनाने हेतु और अधिक निर्माण इकाइयों (फैब्रिकेशन फैसिलिटी) की ज़रूरत पड़ सकती है।

ऑर्डर बुक (ऑर्डरों की संख्या) को देखते हुए, सरकार की नीतिगत प्रतिक्रिया अपर्याप्त लगती है। अब तक केवल एक नीति में कुछ दम नज़र आता है—'डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर (DAP) 2026' का ड्राफ्ट, जिसमें ड्रोन इंजन के निर्माण को 'राष्ट्रीय महत्व की परियोजना' के रूप में वर्गीकृत करने का प्रस्ताव है। सरकार का एक स्वदेशी ड्रोन इकोसिस्टम बनाने का प्रयास, जिसे 'मिशन ड्रोन शक्ति' कहा जा रहा है, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के नेतृत्व में चलाया जा रहा है। लेकिन, इसका रक्षा मंत्रालय (MoD) के साथ कोई सीधा जुड़ाव नहीं है, जबकि रक्षा मंत्रालय ड्रोन के सबसे बड़े खरीदारों में से एक है।

सागर डिफेंस इंजीनियरिंग के संस्थापक और CEO, निकुंज पराशर कहते हैं, 'हमें 'L1 कल्चर' (सबसे कम बोली लगाने वाले को चुनने की प्रथा) से छुटकारा पाना होगा। सामान्य या मानक उत्पादों के लिए तो L1 ठीक हो सकता है, लेकिन जब बेहतरीन तकनीकें उपलब्ध हों और सरकार या सेना सबसे अच्छी तकनीक खरीदना चाहती हो, तो मौजूदा नीति उन्हें ऐसा करने की अनुमति नहीं देती।'

कुछ अहम कड़ियाँ जो गायब हैं
रूस-यूक्रेन युद्ध इतिहास में ड्रोन के इस्तेमाल का सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण बन गया, क्योंकि दोनों देशों ने अपने सैन्य अभियानों के केंद्र में 'अनमैन्ड सिस्टम' (मानवरहित प्रणालियों) को रखा। रूस ने 2025 में एक 'अनमैन्ड सिस्टम फोर्स' बनाई, जो आर्मर (बख्तरबंद इकाइयों) और आर्टिलरी (तोपखाने) की तरह ही सेना की एक अलग लड़ाकू शाखा है। यूक्रेन के पास एक प्रभावी नौसेना या वायु सेना नहीं थी, इसलिए उसने एक कदम आगे बढ़कर सेना की एक अलग शाखा—'अनमैन्ड सिस्टम फोर्स'—का गठन किया। कीव ने FPV ड्रोन का इस्तेमाल करके मॉस्को के ज़मीनी हमलों की रफ़्तार धीमी कर दी, और साथ ही रूस के भीतर 2,000 किलोमीटर से ज़्यादा गहराई तक लंबी दूरी के सटीक ड्रोन (लॉन्ग-रेंज प्रिसिजन ड्रोन) से हमले किए। युद्ध अपने आप में अनोखे होते हैं और शायद ही कहीं और बिल्कुल उसी तरह दोहराए जाएं, लेकिन वे भविष्य के संघर्षों के स्वरूप और आचरण के बारे में महत्वपूर्ण सबक देते हैं।


भारत में हथियारों की खरीद की प्रक्रिया अक्सर रणनीतिक और परिचालन संबंधी बदलावों से पीछे रह जाती है। ड्रोन की खरीद, उनसे जुड़ी रणनीतियों और ढांचे के निर्माण की गति से कहीं आगे निकल गई है।

एक ड्रोन निर्माता कहते हैं, "हमारे ड्रोन आपस में नेटवर्क से जुड़े नहीं हैं, वे एक-दूसरे से संवाद नहीं कर सकते, और उन्हें बहुत कम संख्या में खरीदा जा रहा है। न तो कोई केंद्रीकृत ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन है और न ही उपकरणों का कोई मानकीकरण (स्टैंडर्डाइजेशन) है। मुझे लगता है कि हम प्रथम विश्व युद्ध के दौरान टैंकों के शुरुआती दौर जैसी स्थिति में हैं-और याद रखें, द्वितीय विश्व युद्ध के समय तो फ्रांसीसी टैंकों में रेडियो तक नहीं होते थे।"

भारत ने रक्षात्मक मोर्चे पर एक बेहतरीन 'कमांड एंड कंट्रोल' (C2) प्रणाली विकसित की है। 'आकाशतीर' (Akashteer) प्रणाली एयर डिफेंस सेंसर, रडार और संचार नोड्स को एक नेटवर्क में जोड़ती है, जिसका इस्तेमाल 'सिंदूर' (Sindoor) अभ्यास के दौरान किया गया था। सेना की 'सक्षम' (SAKSHAM - Situational Awareness for Kinetic Soft and Hard Kill Assets Management) प्रणाली एक स्वदेशी, AI-आधारित 'काउंटर-अनमैन्ड एरियल सिस्टम' (C-UAS) और कमांड-एंड-कंट्रोल ग्रिड है, जिसे 'आर्मी डेटा नेटवर्क' के जरिए संचालित किया जाता है। हालांकि ड्रोन को ट्रैक करने और नष्ट करने में निवेश किया गया है, लेकिन विभिन्न सैन्य सेवाओं में हजारों ड्रोन को तैनात करने, उन्हें नेटवर्क से जोड़ने और उनके संचालन को बनाए रखने के लिए आवश्यक 'आक्रामक ढांचे' (offensive backbone) में निवेश काफी कम है।

यह आक्रामक ढांचा एक ऐसी 'अनमैन्ड सिस्टम्स डॉक्ट्रिन' (मानवरहित प्रणालियों से जुड़ी रणनीति) से तैयार होगा, जो ड्रोन को केवल अलग-थलग गैजेट्स के रूप में देखने के बजाय, सेना की 'समझने, निर्णय लेने और कार्रवाई करने' की प्रक्रिया का अभिन्न हिस्सा बनाएगी। इससे एक 'किल वेब' (kill web) का निर्माण होगा-जो कई सेंसर, प्लेटफॉर्म और शूटरों का एक विस्तृत नेटवर्क है, जिसका उद्देश्य सटीक और व्यापक प्रहार क्षमता (precision mass) हासिल करना है। 'किल वेब' मोज़ेक (mosaic) की टाइलों की तरह होता है-छोटी और आपस में बदली जा सकने वाली इकाइयां-जिसके कारण यह कहीं अधिक मजबूत होता है और दुश्मन के लिए इसे बाधित करना बहुत कठिन हो जाता है।

सेना प्रशिक्षण कमान (ARTRAC) के पूर्व GOC-in-C, लेफ्टिनेंट जनरल राज शुक्ला कहते हैं, "हमें एक सुसंगत 'ड्रोन डॉक्ट्रिन' की आवश्यकता है, जो 'एल्गोरिद्मिक युद्ध' (algorithmic warfare) में ड्रोन के लड़ाकू इस्तेमाल का मार्गदर्शन कर सके। साथ ही, हमें 'किल वेब' तैयार करने के लिए एक संगठन की जरूरत है—इसे आप 'किल वेब इंटीग्रेशन टास्क फोर्स' कह सकते हैं- जिसमें DRDO, शैक्षणिक संस्थानों, ISRO और उद्योग जगत के प्रतिनिधि शामिल हों।"

इस तरह के 'किल वेब' को सुचारू रूप से चलाने के लिए अंतरिक्ष-आधारित सेंसर, जैसे कि सैटेलाइट कॉन्स्टेलेशन (उपग्रहों का समूह) की आवश्यकता होती है, जो ड्रोन को सटीक दिशा-निर्देश दे सकें। उदाहरण के लिए, यूक्रेन का रक्षा ढांचा काफी हद तक एलन मस्क के 'स्टारशील्ड' पर निर्भर है, जो स्पेसएक्स के 'स्टारलिंक' सैटेलाइट नेटवर्क का सैन्य हिस्सा है। भारत के पास अभी तक ऐसा कोई 'लो-अर्थ' (पृथ्वी के करीब का) सैटेलाइट नेटवर्क नहीं है, जो उसके ड्रोन्स को लंबी दूरी तक हमला करने में मदद कर सके, या दुश्मनों द्वारा दागे गए ड्रोन्स और मिसाइलों से बचाव कर सके।

'आइडेंटिफिकेशन फ्रेंड एंड फो' (IFF) - यानी दोस्त और दुश्मन की पहचान करने - जैसे मुद्दे अभी भी अनसुलझे हैं। कम ऊंचाई पर उड़ने वाले ड्रोन्स की पहचान करना और उन्हें अलग करना बहुत जरूरी है। पृथ्वी की सतह से लगभग 3,000 मीटर की ऊंचाई तक के इस क्षेत्र को 'एयर लिटोरल' कहा जाता है-जहां ज़मीनी सेनाएं, कम ऊंचाई पर उड़ने वाले विमान और बिना पायलट वाले सिस्टम एक-दूसरे के संपर्क में आते हैं।

'ऑपरेशन सिंदूर' के चार महीने बाद, भारतीय सेना के एक कोर कमांडर ने एक सार्वजनिक मंच पर बताया कि 88 घंटे चले संघर्ष के दौरान, उनके 'कोर बैटल एरिया' (लगभग 600 किलोमीटर के दायरे) में 8,000 से ज़्यादा ड्रोन्स उड़ रहे थे। उन्होंने कहा, "आज छोटी लड़ाकू इकाइयों के पास 40 से 60 ड्रोन्स हैं, और बड़ी लड़ाकू इकाइयों के पास 100 से ज़्यादा ड्रोन्स हैं।" उन्होंने सवाल किया, "हम अपने ही ड्रोन्स को गलती से नष्ट होने (ड्रोन फ्रैट्रीसाइड) से कैसे बचाएं?" इसका जवाब है—हवाई क्षेत्र की स्थिति पर नज़र रखने वाला एक समर्पित सिस्टम; यानी एक ऐसा 'अनमैन्ड ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम' (मानवरहित यातायात प्रबंधन प्रणाली), जो ड्रोन्स और उनके खिलाफ इस्तेमाल होने वाले सिस्टम्स को खुद ही पहचान ले और उन्हें ट्रैक कर सके।

भारत के पास ड्रोन्स का एक प्रभावशाली जखीरा है। लेकिन, इस क्षेत्र में मौजूद कमियों का मतलब यह है कि भारत अभी तक एक 'ड्रोन पावर' (ड्रोन शक्ति) नहीं बन पाया है।

Read Latest National News in Hindi only on Prabhasakshi 

प्रमुख खबरें

Samudrik Shastra के अनुसार हथेली के पीछे बाल होना तय करता है आपका भविष्य और स्वभाव

Shinde Sena विवाद के बीच Devendra Fadnavis और Thackeray बंधु साथ, क्या महाराष्ट्र में बदलेंगे सियासी समीकरण?

बनासकांठा में PM Modi का Roadshow, गुजरात को मिलीं 14,000 करोड़ रुपये की योजनाएं

Muthuramalingam Thevar की प्रतिमा पर पसुम्पोन में पहनाया गया 13.5 किलो का स्वर्ण कवच