महिला सशक्तिकरण के दौर में 36 साल में इस देश को मिला पहला पुरुष प्रधानमंत्री, क्यों हारी जमात, रहमान की जीत की Inside Story

By अभिनय आकाश | Feb 13, 2026

"ये देश मुसलमानों का है, हिंदुओं का है, बौद्धों और ईसाइयों का भी है।" 58 साल का शख्त जब ढाका के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर अपने कदम रखता है तो हजरों लोगों की भीड़ के बीच अपनी मिट्टी को सिर से लगाते हुए कुछ अंदाज में अपनी वापसी का ऐलान करता नजर आता है। 17 साल का वनवास काट अपने देश में दाखिल होने के दो महीने से भी कम समय बाद अब उसी शख्स से सिर पर देश के प्रधानमंत्री का ताज सजने वाला है।  बांग्लादेश के इतिहास में 12 फरवरी 2026 का दिन एक बड़े बदलाव के रूप में दर्ज हो गया। साल 2024 के छात्र आंदोलन और शेख हसीना के देश छोड़ने के बाद यह पहला मौका था जब देश में लोकतांत्रिक तरीके से नई सरकार चुनने के लिए मतदान हुआ। इस चुनाव को केवल नई संसद चुनने तक सीमित नहीं माना जा रहा बल्कि इसे देश के संविधान और शासन व्यवस्था में बड़े बदलाव की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है। यह चुनाव अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार और नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस की निगरानी में संपन्न हुआ। इस चुनाव की सबसे ख़ास बात यह रही कि मतदाताओं ने केवल उम्मीदवारों को ही नहीं चुना बल्कि जुलाई चार्टर नाम के जनमत संग्रह पर भी अपनी मोहर लगाई। इसमें संविधान में व्यापक बदलावों का प्रस्ताव रखा गया है। जिनका मकसद राजनीति को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाना है। शेख हसीना की पार्टी आवामी लीग के चुनाव से बाहर रहने के कारण मुख्य मुकाबला बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी यानी बीएनपी और जमात इस्लामी के गठबंधन के बीच रहा। 

तारिक रहमान 2008 में तारिक रहमान इलाज के लिए लंदन गए थे। उस समय उनके खिलाफ कई आपराधिक और भ्रष्टाचार से जुड़े मामले चल रहे थे। राजनीतिक दबाव भी बढ़ा हुआ था। इसी वजह से वह लंबे समय तक ब्रिटेन में रहे। एक साल में उच्च अदालतो ने तारिक रहमान को बढ़े मामलों में बरी कर दिया, जिनमें 2004 का ग्रेनेड हमला और जिया ऑफेनेज ट्रस्ट मामला शामिल है। इसके बाद उनकी राजनीतिक वापसी के कानूनी रास्ते साफ हुए। उनकी वापसी और पार्टी की ऐतिहासिक जीत ने उन्हें देश के अगले प्रधानमंत्री पद का सबसे मजबूत दावेदार बना दिया है। समर्थकों का मानना है कि उनके नेतृत्व में बांग्लादेश में स्थिरता और विकास का नया दौर शुरू होगा। इस चुनाव के साथ हुए जनमत संग्रह में 72% से ज्यादा मतदाताओं ने जुलाई चार्टर के पक्ष में वोट किया। इसके तहत कई बड़े सुधार प्रस्तावित हैं। प्रधानमंत्री के कार्यकाल की सीमा तय करना, संसद में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना, न्यायपालिका और पुलिस व्यवस्था में सुधार। 

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बैटल ऑफ द बेगम्स के बाद अब 

1971 से ही बांग्लादेश की नियति जीतने वाले के नक्शे कदम पर चलती रही है। जो जीतता है वह सब कुछ ले जाता है। जो हारता है उसे जेल की कोठरी देखनी पड़ सकती है। देश से भागना पड़ सकता है या फिर उसकी कब्र भी खोद सकती है। कहानी की शुरुआत 1975 से होती है। इसी बरस शेख हसीना के पिता मुजब उर रहमान की हत्या कर दी गई। उन्हें बंग बंधु के नाम से जाना जाता था। आजादी के बाद वह देश के पहले राष्ट्रपति बने थे। लेकिन उनके राज में हालात बिगड़ गए थे। युद्ध की वजह से खजाना खाली था। सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार फैल रहा था। 1972 में मुजीब ने विद्रोह रोकने के लिए रखी वाहिनी नाम की एक फोर्स बनाई। लेकिन उस फोर्स पर ही हत्या और रेप के इल्जाम लगे। जनता का मोह भंग उनसे होने लगा। फिर तारीख आई 14 अगस्त 1975 बांग्लादेश की फौज के कुछ बागी अफसरों ने मुजीब और उनके परिवार के 18 लोगों की हत्या कर दी। किस्मत से उनकी दो बेटियां शेख हसीना और शेख रिहाना उस वक्त जर्मनी में थी। इसके बाद सत्ता जियाउ रहमान के हाथ में आई। अगले दशक में देश ने एक और सैन्य शासक देखा हुसैन मोहम्मद इरशाद के हाथ में सत्ता गई। इन दोनों सैन्य शासकों ने एक ही एजेंडा चलाया। आवामी लीग का नामोनिशान मिटा दो। उन्होंने उन ताकतों को वापस जिंदा किया जो 1971 में आजादी के खिलाफ थी ताकि आवामी लीग की लोकप्रियता को टक्कर दी जा सके। 1990 के दशक के आखिर आखिर तक इरशाद के खिलाफ माहौल बनने लगा था। तब एक दिलचस्प वाकया हुआ। दो जानी दुश्मन एक साथ आ गई। शेख हसीना और खालिदा जिया दोनों ने मिलकर के इरशाद को गद्दी से उतार फेंका। लेकिन यह दोस्ती बस मतलब भर की थी। दोनों जब ताकतवर हुई तो 1991 से एक नया दौर शुरू हुआ जिसे बेगमों की जंग कहा जाता है। बैटल ऑफ द बेगम्स। एक ही ढर्रा था जो गद्दी पर बैठेगा वो सामने वाले का धंधा बंद करवा देगा। 1991 में खालिदा जीती। 1996 में हसीना जीती। 2001 में फिर खालिदा जिया जीत गई।  2006 आते-आते सड़कों पर खून खराबा शुरू हो गया था। जब नेताओं से बात नहीं संभली तो फौज ने कहा कि अब हम संभालेंगे। 2007 में इमरजेंसी लगा दी गई और हसीना खालिदा दोनों को जेल में डाल दिया गया। फिर 2008 में चुनाव हुए। शेख हसीना ने ऐसी वापसी की कि अगले 15 साल तक गद्दी पर बनी रहीं। इस दौरान जमात के नेताओं को फांसी हुई। 2018 में खालिदा जिया जेल गई। 

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अवामी लीग की दूरी 

देश के इतिहास में यह पहली बार है, जब शेख हसीना की पार्टी चुनाव में नहीं है। यह अवामी लीग का अपना फैसला नहीं था, बल्कि उस पर थोपा गया। जो पार्टी बांग्लादेश की मुक्ति से लेकर अभी तक, उसके हर राजनीतिक-सामाजिक बदलाव की साक्षी रही है, उसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया से दूर करना सही तो नहीं कहा जा सकता। बीएनपी या जमात सत्ता में जो भी आए, उसके ऊपर सबसे बड़ी जिम्मेदारी होगी देश की जनता की ख्वाहिशों को पूरा करने की। अंतरिम सरकार आम लोगों में भरोसा जगाने में असफल रही है। चुनाव में बीएनपी की जीत तय मानी जा रही है। अगर ऐसा होता है तो उसके सामने जनता की कसौटी पर खरा उतरने की चुनौती होगी।

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