Jaishankar और Marco Rubio ने Critical Minerals तथा Rare Earths पर India-US Framework की घोषणा की, सकते में आया चीन

By नीरज कुमार दुबे | May 26, 2026

क्वॉड विदेश मंत्रियों की बैठक ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि हिंद प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन, आपूर्ति श्रृंखला सुरक्षा और सामरिक सहयोग को लेकर भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के बीच अभूतपूर्व सामंजस्य बन रहा है। हालांकि बैठक का केंद्र मुक्त और खुला हिंद प्रशांत रहा, लेकिन इसके इतर भारत के अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ द्विपक्षीय संबंधों में जो नई प्रगति हुई, उसने इस मंच को और अधिक रणनीतिक महत्व प्रदान किया है।

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द्विपक्षीय बैठकों का जिक्र करें तो आपको बता दें कि भारत और अमेरिका के बीच सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि महत्वपूर्ण खनिजों और दुर्लभ धातुओं की आपूर्ति तथा प्रसंस्करण को सुरक्षित बनाने के लिए नए ढांचे पर हस्ताक्षर रही। विदेश मंत्री एस जयशंकर और अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो द्वारा नई दिल्ली में हुए इस समझौते का उद्देश्य खनन, प्रसंस्करण, पुनर्चक्रण और निवेश के क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाना है। यह समझौता केवल आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि उभरती प्रौद्योगिकियों, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रक्षा उत्पादन और उन्नत विनिर्माण के लिए आवश्यक आपूर्ति श्रृंखला को सुरक्षित बनाने की व्यापक रणनीति का हिस्सा है। अमेरिका लंबे समय से चीन पर निर्भर दुर्लभ धातु आपूर्ति श्रृंखला के विकल्प तलाश रहा है और भारत इस दिशा में एक विश्वसनीय साझेदार के रूप में उभरा है। इस समझौते से भारत को तकनीकी निवेश, खनन क्षमता और वैश्विक विनिर्माण नेटवर्क में बड़ी भूमिका मिल सकती है।

जयशंकर और रुबियो की मुलाकात ने यह भी संकेत दिया कि भारत-अमेरिका संबंध अब केवल रक्षा सहयोग तक सीमित नहीं रहे। दोनों देशों ने अपने रिश्ते को व्यापक वैश्विक सामरिक साझेदारी बताया, जिसका प्रभाव दुनिया के अन्य क्षेत्रों तक दिखाई देता है। ऐसे समय में जब पश्चिम एशिया, यूक्रेन और हिंद प्रशांत में भू राजनीतिक तनाव बढ़ रहे हैं, भारत और अमेरिका का यह निकट सहयोग वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित करने वाला माना जा रहा है। भारत का अमेरिका नेतृत्व वाली पैक्स सिलिका पहल से जुड़ना और कृत्रिम बुद्धिमत्ता अवसर साझेदारी पर सहमति भी यह दर्शाती है कि दोनों देश भविष्य की प्रौद्योगिकियों और डिजिटल सुरक्षा के क्षेत्र में दीर्घकालिक सहयोग की दिशा में बढ़ रहे हैं।

भारत और जापान के संबंधों में भी नई मजबूती दिखाई दी। जापानी विदेश मंत्री तोशिमित्सु मोतेगी के साथ बैठक में जयशंकर ने विशेष सामरिक और वैश्विक साझेदारी का उल्लेख करते हुए कहा कि दोनों देशों के रिश्तों का प्रभाव क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक व्यवस्था तक जाता है। हिंद प्रशांत में मुक्त और खुली व्यवस्था को बनाए रखने के लिए दोनों देशों का सहयोग लगातार गहरा हो रहा है। जापान और भारत दोनों ऊर्जा आयातक और बड़े व्यापारिक देश हैं, इसलिए पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और समुद्री मार्गों की सुरक्षा उनके लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। आर्थिक सुरक्षा, समुद्री हित और आपूर्ति श्रृंखला की स्थिरता को लेकर दोनों देशों के बीच बढ़ती समझ यह दर्शाती है कि यह संबंध केवल आर्थिक निवेश या आधारभूत ढांचे तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सामरिक समन्वय का रूप ले चुका है।

ऑस्ट्रेलिया के साथ भारत के रिश्तों में भी उल्लेखनीय प्रगति दिखाई दी। ऑस्ट्रेलियाई विदेश मंत्री पेनी वोंग ने नई दिल्ली में कहा कि हिंद प्रशांत क्षेत्र में देशों की संप्रभु पसंद और स्वतंत्र निर्णय क्षमता की रक्षा करना क्वॉड की मूल भावना है। उन्होंने भारत को हिंद प्रशांत की दिशा तय करने वाली महत्वपूर्ण शक्ति बताया। ऑस्ट्रेलिया ने यह भी दोहराया कि वह समुद्री सुरक्षा, महत्वपूर्ण आधारभूत ढांचे, समुद्र के भीतर बिछी संचार केबलों और महत्वपूर्ण खनिजों के क्षेत्र में भारत के साथ सहयोग बढ़ाना चाहता है। यह सहयोग चीन के बढ़ते प्रभाव और समुद्री विस्तारवाद के बीच विशेष महत्व रखता है।

देखा जाये तो क्वॉड के भीतर महत्वपूर्ण खनिजों, समुद्री सुरक्षा और आपूर्ति श्रृंखला पर बढ़ता सहयोग इस बात का संकेत है कि यह समूह अब केवल संवाद मंच नहीं रह गया है, बल्कि व्यावहारिक रणनीतिक साझेदारी में बदल रहा है। भारत की भूमिका यहां विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो गई है क्योंकि वह एक ओर पश्चिमी देशों के साथ तकनीकी और सामरिक सहयोग बढ़ा रहा है, वहीं दूसरी ओर अपनी रणनीतिक स्वायत्तता भी बनाए हुए है। ऑस्ट्रेलिया द्वारा जयशंकर के उस विचार का उल्लेख, जिसमें उन्होंने देशों की स्वतंत्र पसंद की बात कही थी, यह दर्शाता है कि भारत अब हिंद प्रशांत की शक्ति राजनीति में संतुलनकारी भूमिका निभा रहा है।

इन सभी घटनाक्रमों का सामरिक महत्व बहुत व्यापक है। महत्वपूर्ण खनिजों की सुरक्षित आपूर्ति से लेकर समुद्री मार्गों की सुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता सहयोग, आर्थिक सुरक्षा और आधारभूत ढांचे के विकास तक, भारत अब हिंद प्रशांत रणनीति का केंद्रीय स्तंभ बनता दिखाई दे रहा है। अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ गहरे होते संबंध यह संकेत देते हैं कि आने वाले वर्षों में भारत न केवल क्षेत्रीय स्थिरता का प्रमुख आधार होगा, बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और तकनीकी शक्ति संतुलन में भी निर्णायक भूमिका निभाएगा।

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